Devyani Khobragade Case देवयानी खोबरागड़े, When India teach a lesson to America जब भारत और अमेरिका आमने-सामने आ गए
Devyani Khobragade Case (देवयानी खोबरागड़े ) When India teach a lesson to America जब भारत और अमेरिका आमने-सामने आ गए. एक गिरफ्तारी जिसने हिला दिए भारत-अमेरिका संबंध.
इस ब्लॉग में हम जानेंगे कि हाल ही में एक तेल टैंकर पर अमेरिकी कार्रवाई में तीन भारतीय नागरिकों की मौत के बाद भारत सरकार द्वारा अमेरिका का नाम लिए बिना जारी की गई प्रतिक्रिया ने किस प्रकार नई बहस को जन्म दिया। इस घटना के बाद कई लोगों ने वर्तमान सरकार और UPA सरकार की विदेश नीति की तुलना करनी शुरू कर दी है।
आलोचकों और सोशल मीडिया पर चर्चा करने वाले कुछ लोगों का सवाल है कि जब अमेरिकी कार्रवाई में भारतीय नागरिकों की मौत हुई, तब भी वर्तमान सरकार आधिकारिक बयानों में अमेरिका का नाम लेने से बचती हुई क्यों दिखाई दी।
हम यह भी समझने की कोशिश करेंगे कि आखिर क्यों 2013 के देवयानी खोबरागड़े प्रकरण को एक बार फिर याद किया जा रहा है। उस समय एक भारतीय राजनयिक के साथ अमेरिका में हुए व्यवहार को लेकर भारत और अमेरिका के संबंधों में अभूतपूर्व तनाव पैदा हो गया था। भारत ने अमेरिका के खिलाफ कड़ा रुख अपनाते हुए सार्वजनिक रूप से विरोध दर्ज कराया था और कई कूटनीतिक कदम उठाए थे।
हाल ही में अमेरिका और ईरान के बीच starit of hormuz में बढ़ते तनाव के कारण 11 जून 2026 में हुई एक घटना ने भारत में गहरी चिंता पैदा कर दी.
रिपोर्टों के अनुसार, 11 जून 2026 में ओमान के निकट समुद्री क्षेत्र में एक तेल टैंकर पर हुई अमेरिकी सैन्य कार्रवाई में 3 भारतीय जहाज़ कर्मचारी की मौत हो गई। बताया गया कि टैंकर पर कुल 24 भारतीय नाविक मौजूद थे। इनमें से 21 लोगों कोओमान की मदद से सुरक्षित निकाल लिया गया.
अमेरिका का दावा था कि यह जहाज प्रतिबंधों के उल्लंघन कर रहा था और सुरक्षा संबंधी निर्देशों का पालन नहीं कर रहा था। अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, जहाज को कई बार चेतावनी दी गई थी और सुरक्षा संबंधी निर्देशों का पालन करने के लिए कहा गया था।
कंपनी का कहना था कि उसे या जहाज के चालक दल को अमेरिकी पक्ष की ओर से किसी प्रकार की पूर्व चेतावनी प्राप्त नहीं हुई थी
भारत सरकार की प्रतिक्रिया
घटना के बाद भारत सरकार ने गहरी संवेदना व्यक्त की और प्रभावित परिवारों से संपर्क स्थापित किया। विदेश मंत्रालय ने संबंधित देशों से विस्तृत जानकारी मांगी तथा भारतीय नागरिकों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देने की बात कही।
नई दिल्ली ने घटना पर चिंता और शोक व्यक्त किया, परंतु आधिकारिक बयान में अमेरिका का नाम लेने से परहेज किया।
दिलचस्प बात यह है कि यह पहली बार नहीं था जब भारत ने अमेरिकी कार्रवाई की आलोचना करते हुए भी आधिकारिक बयान में अमेरिका का नाम लेने से परहेज किया.
इससे पहले मार्च 2026 में, जब ईरानी नौसेना का युद्धपोत IRIS Dena हिंद महासागर में अमेरिकी हमले का शिकार हुआ था, तब भी भारत ने अपने शुरुआती आधिकारिक बयानों में अमेरिका का नाम सीधे तौर पर नहीं लिया था।
इस घटना का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि IRIS Dena भारत में आयोजित International Fleet Review 2026 और MILAN 2026 मैत्रीपूर्ण नौसैनिक अभ्यास में भाग लेने के बाद ईरान लौट रहा था.
इस घटना का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि IRIS Dena भारत में आयोजित International Fleet Review 2026 और MILAN 2026 मैत्रीपूर्ण नौसैनिक अभ्यास में भाग लेने के बाद ईरान लौट रहा था.
हमले के समय ईरानी नौसेना के युद्धपोत IRIS Dena पर कुल 136 नौसैनिक सवार थे। रिपोर्टों के अनुसार, इस हमले में 104 नौसैनिकों की मौत हो गई, जबकि 32 लोगों को जीवित बचाया जा सका। सबसे दुखद तथ्य यह रहा कि मृतकों में से 20 नौसैनिकों के शव भी बरामद नहीं किए जा सके.
भारत के हालिया प्रेस नोट के बाद दिसंबर 2013 का देवयानी खोबरागड़े प्रकरण एक बार फिर चर्चा में आ गया है। सोशल मीडिया पर कई लोग इस घटना को याद कर रहे हैं और भारत की अमेरिका के प्रति कूटनीतिक प्रतिक्रिया की तुलना कर रहे हैं।
यह घटना उस समय की है जब केंद्र में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (UPA) की सरकार सत्ता में थी और डॉ. मनमोहन सिंह भारत के प्रधानमंत्री थे
घटना दिसंबर 2013 में हुई थी और यह भारत-अमेरिका संबंधों में सबसे बड़े राजनयिक विवादों में से एक बन गई थी।
क्या हुआ था?
Devyani Khobragade उस समय न्यूयॉर्क में भारतीय वाणिज्य दूतावास में Deputy Consul General थीं।
12 दिसंबर 2013 को अमेरिकी अधिकारियों ने उन्हें वीज़ा धोखाधड़ी (visa fraud) और झूठे दस्तावेज़ जमा करने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया। अमेरिकी अभियोजन पक्ष का आरोप था कि उन्होंने अपनी घरेलू सहायिका Sangeeta Richard के वीज़ा आवेदन में यह दिखाया कि उसे अमेरिकी कानून के अनुसार वेतन दिया जाएगा, जबकि वास्तविक भुगतान इससे कम था।
विवाद क्यों बढ़ गया?
गिरफ्तारी के बाद देवयानी खोबरागड़े को हथकड़ी लगाई गई, strip search (कपड़े उतरवाकर तलाशी ली ) अन्य आरोपियों के साथ हिरासत में रखा गया।
गिरफ्तारी के उसी दिन 2.5 लाख अमेरिकी डॉलर (लगभग 1.5 करोड़ रुपये) के निजी मुचलके पर उन्हें रिहा कर दिया गया। यह जमानत राशि भारत सरकार द्वारा उपलब्ध कराई गई थी
देवयानी खोबरागड़े की गिरफ्तारी और उनके साथ किए गए व्यवहार (हथकड़ी लगाना और स्ट्रिप सर्च) को भारत में राष्ट्रीय सम्मान के मुद्दे के रूप में देखा गया। भारत सरकार ने इसे "अस्वीकार्य" और "अपमानजनक" बताया। उस समय के प्रधानमंत्री Manmohan Singh ने इस घटना को "deplorable" (निंदनीय) कहा।
देवयानी खोबरागड़े प्रकरण (2013) में भारत ने आधिकारिक तौर पर अमेरिका का नाम लेते हुए कड़ी आपत्ति और निंदा व्यक्त की थी। उस समय केंद्र में UPA सरकार थी और डॉ. मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे.
देवयानी खोबरागड़े प्रकरण में भारत ने आधिकारिक तौर पर अमेरिका से स्पष्ट और बिना शर्त माफी मांगने की मांग की थी।
भारत की कड़ी कूटनीतिक प्रतिक्रिया
भारत सरकार ने अमेरिका के खिलाफ कई कड़े कदम उठाए जैसे:
नई दिल्ली स्थित अमेरिकी दूतावास के बाहर लगी अतिरिक्त सुरक्षा बैरिकेड्स को बुलडोज़र की मदद से हटवा दिया था।
अमेरिकी राजनयिकों को मिली कुछ विशेष सुविधाओं की समीक्षा की गई।
अमेरिकी दूतावास के कर्मचारियों के वेतन और कर संबंधी दस्तावेज़ों की जांच शुरू की गई।
अमेरिकी राजनयिकों के पहचान पत्रों की जानकारी मांगी गई।
इस मुद्दे पर सत्ता पक्ष और विपक्ष लगभग एकमत दिखाई दिए।
दिसंबर 2013 में भारत दौरे पर आए एक अमेरिकी संसदीय प्रतिनिधिमंडल से मिलने से कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने इनकार कर दिया। उसी समय, भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने भी अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात करने से मना कर दिया।
मोदी ने उस समय ट्वीट करते हुए कहा कि उन्होंने "अमेरिका में भारतीय महिला राजनयिक के साथ किए गए दुर्व्यवहार के विरोध में और राष्ट्र के साथ एकजुटता दिखाने के लिए" यह फैसला लिया है।
अमेरिका का पक्ष
अमेरिकी अधिकारियों का कहना था कि:
देवयानी को पूर्ण राजनयिक प्रतिरक्षा (full diplomatic immunity) प्राप्त नहीं थी,
उन पर अमेरिकी श्रम और वीज़ा कानूनों के उल्लंघन का आरोप था,
उनके साथ वही प्रक्रिया अपनाई गई जो सामान्य मामलों में की जाती है।
बाद में क्या हुआ?
भारत ने देवयानी को न्यूयॉर्क स्थित United Nations में भारतीय मिशन में स्थानांतरित कर दिया, जिससे उन्हें उच्च स्तर की राजनयिक प्रतिरक्षा मिल गई।
भारत ने उन्हें वापस बुला लिया, अमेरिका में मामला तकनीकी कारणों से खारिज हुआ, लेकिन अमेरिकी अभियोजकों ने बाद में फिर आरोप दायर किए।
भारत ने यह संकेत दिया कि
यदि भारतीय राजनयिकों के साथ विदेशों में सम्मानजनक व्यवहार नहीं होगा, तो भारत भी उसी आधार पर प्रतिक्रिया देगा.
इसने भारतीय विदेश सेवा के भीतर भी यह विश्वास मजबूत किया कि सरकार उनके अधिकारों और सम्मान की रक्षा करेगी।
4. रणनीतिक साझेदारी पर सीमित प्रभाव
हालांकि तत्काल तनाव बहुत अधिक था, लेकिन दोनों देशों ने जल्द ही यह समझ लिया कि:
रक्षा सहयोग, आतंकवाद विरोधी साझेदारी, व्यापार, परमाणु सहयोग, और चीन के बढ़ते प्रभाव जैसी रणनीतिक चुनौतियाँ, इन सबके कारण उनके दीर्घकालिक हित जुड़े हुए हैं।
इसी कारण, कुछ महीनों बाद दोनों देशों ने संबंधों को सामान्य करने की कोशिश शुरू कर दी।
5. अमेरिका के लिए भी एक सीख
अमेरिका के भीतर भी इस मामले की आलोचना हुई। कई पूर्व अमेरिकी अधिकारियों और विशेषज्ञों का मानना था कि इस मामले को अधिक संवेदनशील तरीके से संभाला जा सकता था।
पूर्व अमेरिकी राजदूत Robert D. Blackwill ने बाद में कहा कि इस घटना ने भारत-अमेरिका संबंधों को नुकसान पहुंचाया और इसे उन्होंने "stupid" निर्णय बताया।

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