अंजना ओम कश्यप बनाम YOUTUBE टीचर्स, Khan Sir, NEET, CBSE और पेपर लीक पर छात्रों के भविष्य के लिए सवाल उठाने वालो से गोदी मीडिया के एंकर्स को इतनी चिढ़ क्यों?
अंजना ओम कश्यप बनाम YOUTUBE टीचर्स: NEET, CBSE और पेपर लीक पर छात्रों के भविष्य के लिए सवाल उठाने वालो से गोदी मीडिया के एंकर्स को इतनी चिढ़ क्यों? पेपर लीक पर सरकार से सवाल पूछने वाले शिक्षकों से मीडिया को क्या परेशानी है? पत्रकारिता का गिरता स्तर, पेपर लीक जैसे गंभीर मुद्दे पर भी एंकर्स का प्रो-गवर्नमेंट (Pro-Govt) रवैया क्यों?

पत्रकारिता का काम सत्ता से सवाल पूछना है, लेकिन यहाँ एंकर्स उन शिक्षकों से भिड़ रहे हैं जो पेपर लीक के खिलाफ लड़ रहे हैं!
अंजना ओम कश्यप और YouTube टीचर्स विवाद की शुरुआत-
हाल के दिनों में आज तक टीवी पत्रकार अंजना ओम कश्यप ने अपने एक शो में आपको समय पर ऑनलाइन पढ़ने वाले कोचिंग टीचर पर अपने शो में एक विवाद बयान दिया जिसमें उन्होंने कहा ये यूट्यूब वाले स्टार टीचर्स... जिनको कुछ जानना ना कौड़ी... खाली व्यूज बटोरते हैं, ड्रामा करते हैं... दो कौड़ी का ज्ञान नहीं है... ये बच्चों की गाढ़ी कमाई पर अपनी दुकान सजाते हैं।
इस टिप्पणी के बाद सोशल मीडिया पर बहस शुरू हो गई और कई लोगों ने इसे ऑनलाइन शिक्षकों के प्रति अपमानजनक माना। देखते ही देखते यह मुद्दा इंटरनेट पर ट्रेंड करने लगा और हजारों छात्रों ने अपनी प्रतिक्रियाएं देनी शुरू कर दीं।
अंजना ओम कश्यप की यह टिप्पणी उस समय आई, जब कई YouTube शिक्षक अपने चैनलों और YouTube पॉडकास्ट और पर छात्रों के समर्थन में खुलकर बोल रहे थे। वे इस पूरे मामले को सरकार की नाकामी बता रहे थे और साथ ही मुख्यधारा के मीडिया की भी आलोचना कर रहे थे। उनका आरोप था कि मीडिया ने इस मुद्दे पर सरकार से कोई कड़ा सवाल नहीं पूछा और न ही छात्रों की समस्याओं को पर्याप्त महत्व दिया।
आज लाखों छात्र अपनी पढ़ाई, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी और करियर निर्माण के लिए YouTube पर निर्भर हैं
इंटरनेट और स्मार्टफोन की बढ़ती पहुंच ने शिक्षा को लाखों छात्रों तक पहुंचाया है। खासकर छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों के विद्यार्थियों के लिए YouTube एक ऐसा मंच बन गया है जहां वे कम खर्च में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त कर सकते हैं। आज अनेक छात्र प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी ऑनलाइन माध्यम से कर रहे हैं। ऐसे में YouTube शिक्षक केवल कंटेंट क्रिएटर नहीं, बल्कि लाखों विद्यार्थियों के लिए मार्गदर्शक की भूमिका निभा रहे हैं।
विवाद बढ़ने के बाद कई प्रसिद्ध ऑनलाइन शिक्षकों ने अपनी प्रतिक्रिया दी। उनका कहना था कि ऑनलाइन शिक्षा ने उन छात्रों तक भी ज्ञान पहुंचाया है जो महंगी कोचिंग संस्थाओं तक नहीं पहुंच सकते।
शिक्षकों का तर्क था कि यदि लाखों छात्र उनकी कक्षाओं से लाभान्वित हो रहे हैं और विभिन्न परीक्षाओं में सफलता प्राप्त कर रहे हैं, तो पूरे समुदाय को नकारात्मक रूप में प्रस्तुत करना सही नहीं है। उनका मानना है कि डिजिटल शिक्षा ने शिक्षा के क्षेत्र में एक सकारात्मक बदलाव लाया है।
छात्रों ने क्यों किया YouTube Teachers का समर्थन?
हाल ही में हुए NEET-UG पेपर लीक मामले ने देशभर के छात्रों में भारी नाराज़गी पैदा कर दी थी। इसके बाद CBSE परीक्षा परिणामों और मूल्यांकन प्रक्रिया में सामने आई गड़बड़ियों ने छात्रों के गुस्से को और बढ़ा दिया। इन घटनाओं के खिलाफ सबसे मुखर आवाज़ें YouTube पर पढ़ाने वाले शिक्षकों की ओर से आईं, जिन्होंने छात्रों के समर्थन में खुलकर अभियान चलाया और पूरे मामले पर सरकार से जवाबदेही की मांग की।
CBSE परीक्षा मूल्यांकन से जुड़ी लापरवाही तब और विवादित हो गई जब यह सामने आया कि जिस कंपनी, कॉम्प्ट एडुटेक प्राइवेट लिमिटेड (Coempt Edu Teck), को परीक्षा मूल्यांकन का ठेका दिया गया था, उसका पुराना नाम ग्लोबारेना टेक्नोलॉजीज (Globarena Technologies) था। आरोप यह भी लगे कि इस कंपनी को ठेका देने के लिए टेंडर की सुरक्षा और तकनीकी शर्तों में बदलाव किए गए थे। आलोचकों का कहना था कि गंभीर सवालों और विवादों के बावजूद इसी कंपनी को CBSE जैसी महत्वपूर्ण परीक्षा के मूल्यांकन का जिम्मा सौंपा गया।
साल 2019 में तेलंगाना बोर्ड परीक्षा के सॉफ्टवेयर में तकनीकी खामी आई थी। इ। इस लापरवाही के बाद राज्य सरकार ने इस पर रोक लगा दी थी।
13 मई 2026 को परिणाम घोषित होने के बाद जब छात्रों ने अपनी कॉपियों की डिजिटल कॉपी डाउनलोड की, तो उसमें कई चौंकाने वाली कमियाँ मिलीं कई छात्रों ने सोशल मीडिया पर सुबूत साझा किए कि उनकी डिजिटल कॉपी में लिखावट (handwriting) किसी और की थी। बोर्ड ने माना कि स्कैनिंग की गलती से लगभग 20 छात्रों की कॉपियाँ आपस में बदल गईं। हजारों कॉपियों के कई पन्ने ठीक से स्कैन नहीं होने के कारण बेहद धुंधले थे या पूरी तरह गायब थे। आरोप है कि जांचने वाले शिक्षकों ने इन पन्नों को बिना पढ़े ही 'शून्य' अंक दे दिए।
छात्रों का मानना था कि सरकार से जवाबदेही मांगने की जिम्मेदारी मुख्यधारा के मीडिया और समाचार चैनलों की थी, लेकिन उनकी नजर में मीडिया ने इस मुद्दे पर सरकार से पर्याप्त और कड़े सवाल नहीं पूछे। यही कारण था कि बड़ी संख्या में छात्र मीडिया के रवैये से भी नाराज़ दिखाई दिए।
साल 2019 में तेलंगाना बोर्ड परीक्षा के सॉफ्टवेयर में तकनीकी खामी आई थी। इ। इस लापरवाही के बाद राज्य सरकार ने इस पर रोक लगा दी थी।
13 मई 2026 को परिणाम घोषित होने के बाद जब छात्रों ने अपनी कॉपियों की डिजिटल कॉपी डाउनलोड की, तो उसमें कई चौंकाने वाली कमियाँ मिलीं कई छात्रों ने सोशल मीडिया पर सुबूत साझा किए कि उनकी डिजिटल कॉपी में लिखावट (handwriting) किसी और की थी। बोर्ड ने माना कि स्कैनिंग की गलती से लगभग 20 छात्रों की कॉपियाँ आपस में बदल गईं। हजारों कॉपियों के कई पन्ने ठीक से स्कैन नहीं होने के कारण बेहद धुंधले थे या पूरी तरह गायब थे। आरोप है कि जांचने वाले शिक्षकों ने इन पन्नों को बिना पढ़े ही 'शून्य' अंक दे दिए।
छात्रों द्वारा इन YouTube शिक्षकों का समर्थन करने का एक बड़ा कारण यह भी था कि हाल के वर्षों में ही नहीं, बल्कि पिछले 10-15 वर्षों के दौरान भी सरकारी नौकरियों और प्रतियोगी परीक्षाओं के कई पेपर लीक होने के मामले सामने आए हैं। बार-बार होने वाली इन घटनाओं ने छात्रों के बीच व्यवस्था के प्रति अविश्वास और नाराज़गी पैदा की है।
छात्रों का मानना था कि सरकार से जवाबदेही मांगने की जिम्मेदारी मुख्यधारा के मीडिया और समाचार चैनलों की थी, लेकिन उनकी नजर में मीडिया ने इस मुद्दे पर सरकार से पर्याप्त और कड़े सवाल नहीं पूछे। यही कारण था कि बड़ी संख्या में छात्र मीडिया के रवैये से भी नाराज़ दिखाई दिए।
विभिन्न मीडिया रिपोर्टों और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, पिछले सात वर्षों में देशभर में लगभग 70 से अधिक भर्ती परीक्षाओं और प्रतियोगी परीक्षाओं से जुड़े पेपर लीक या परीक्षा अनियमितताओं के मामले सामने आए हैं। इन घटनाओं ने लाखों छात्रों की मेहनत, समय और भविष्य को प्रभावित किया है।
ऐसे माहौल में ऑनलाइन शिक्षा देने वाले कई YouTube शिक्षक छात्रों के समर्थन में खुलकर सामने आए। उन्होंने अपने प्लेटफॉर्म पर लगातार इस मुद्दे को उठाया, विरोध प्रदर्शन का समर्थन किया और सरकार से जवाब मांगा। इन शिक्षकों का तर्क था कि बार-बार होने वाले पेपर लीक केवल एक प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि व्यवस्था की गंभीर विफलता हैं, जिनका सबसे बड़ा नुकसान उन छात्रों को उठाना पड़ता है जो वर्षों तक मेहनत करके प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं। उन्होंने सीधे तौर पर सवाल उठाया कि यदि हर कुछ महीनों में किसी न किसी परीक्षा में गड़बड़ी या पेपर लीक की खबर सामने आती है, तो इसकी जिम्मेदारी आखिर किसकी तय की जाएगी।
इस विवाद में सबसे अधिक सक्रिय छात्र दिखाई दिए। सोशल मीडिया पर अनेक विद्यार्थियों ने अपने अनुभव साझा किए और बताया कि ऑनलाइन शिक्षकों की मदद से उन्होंने प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी की और अपने लक्ष्यों को हासिल किया।
कई छात्रों ने कहा कि आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए YouTube शिक्षा का एक महत्वपूर्ण साधन है। ऐसे में जब ऑनलाइन शिक्षकों पर सवाल उठाए गए तो छात्रों ने इसे अपने संघर्ष और मेहनत से भी जोड़कर देखा।
आज ऑनलाइन शिक्षा लाखों छात्रों के जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है। शिक्षा का उद्देश्य छात्रों तक ज्ञान पहुंचाना है, चाहे वह किसी कक्षा में मिले या किसी डिजिटल स्क्रीन के माध्यम से।
Online youtube Teacher ka reply-
खान सर (Khan Sir) का जवाब ,हमें तो कौड़ी भर का ज्ञान नहीं है, लेकिन आप ही बता दीजिए कि 2000 रुपये के नोट में चिप कहाँ लगी हुई थी?
गणित के मशहूर शिक्षक अभिनय शर्मा ने एंकर की योग्यता पर ही सवाल उठाते हुए कहा अंजना जी कहती हैं कि यूट्यूब टीचर्स को दो कौड़ी का ज्ञान नहीं है। मैं अपनी बात करूँ तो 5 बार सरकारी नौकरी निकाल कर यूट्यूब पर बच्चों को मुफ्त पढ़ाने आया हूँ। हमें पढ़ाने के लिए आपकी तरह सामने टेलीप्रॉम्प्टर (Teleprompter) की स्क्रिप्ट नहीं देखनी पड़ती। जब आपकी आँखें भी नहीं खुलतीं, तब हम सुबह लाइव खड़े होकर बच्चों का भविष्य बना रहे होते हैं। कोरोना में जब स्कूल बंद थे, तब यूट्यूब टीचर्स ने ही शिक्षा संभाली थी.
एसएससी (SSC) और गणित के जाने-माने शिक्षक गगन प्रताप ने मीडिया के ध्यान भटकाने वाले रवैये पर तीखा हमला किया:
जब देश के करोड़ों नीट और सीबीएसई के छात्रों का भविष्य पेपर लीक माफिया बर्बाद कर रहा हो, तब शिक्षकों का चुप रहना अपराध है। नेशनल मीडिया सरकार और एनटीए (NTA) से जवाबदेही तय करने में पूरी तरह नाकाम रहा है। जब शिक्षक छात्रों के हक के लिए आवाज उठा रहे हैं, तो टीवी एंकर्स पूरे मुद्दे को 'पेपर लीक' से भटकाकर 'कोचिंग माफिया बनाम मीडिया' की तरफ मोड़ने की कोशिश कर रहे हैं।
'Physics Wallah' के संस्थापक अलख पांडे की कम्युनिटी और छात्रों ने मीडिया को उसकी असल साख याद दिलाई .जो भारतीय मीडिया वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में लगातार नीचे लुढ़क रहा है, वह आज उन शिक्षकों पर सवाल उठा रहा है जो गरीब बच्चों को किफायती शिक्षा दे रहे हैं। हमारा ज्ञान भले ही आपकी नजर में 'दो कौड़ी' का हो, लेकिन हमें कम से कम यह भली-भांति पता है कि देश की करेंसी नोटों में कोई गुप्त इलेक्ट्रॉनिक 'चिप' नहीं लगी होती। हम इन छात्रों की ढाल हैं और हमेशा रहेंगे।"
पिछले 15 वर्षों में हुए बड़े पेपर लीक-
वर्ष 2011 से 2018 के बीच की अलग-अलग सरकारों के दौरान 12 प्रमुख परीक्षाएं सूचकांक में आईं, जिन्हें लीक या धांधली के कारण रद्द करना पड़ा:
• असिस्टेंट पब्लिक प्रोसक्यूटर (APP) - 2011: आरपीएससी की इस विधिक भर्ती का गोपनीय प्रश्नपत्र परीक्षा से पूर्व ही लीक हो गया था।
• आरएएस (RAS Pre) - 2013-14: राजस्थान प्रशासनिक सेवा की इस प्रारंभिक परीक्षा में व्यापक पैमाने पर सेंधमारी उजागर होने के बाद जुलाई 2014 में इसे निरस्त किया गया।
• लिपिक ग्रेड-द्वितीय (LDC) - 2013-14: आरपीएससी की लगभग 7,000 पदों की इस बड़ी लिपिकीय परीक्षा को अनियमितताओं के चलते रद्द करना पड़ा।
• राजस्थान प्री-मेडिकल टेस्ट (RPMT) - 2014: चिकित्सा क्षेत्र की इस प्रवेश परीक्षा में भारी सुरक्षा चूक और लीक के कारण परिणाम शून्य घोषित कर नए सिरे से परीक्षा हुई।
• कांस्टेबल भर्ती - 2018: पुलिस महकमे की इस परीक्षा में आधुनिक तकनीकी उपकरणों से नकल कराने वाले एक बड़े गिरोह का पर्दाफाश हुआ और परीक्षा निरस्त की गई

वर्ष 2019 से 2023 के बीच नकल माफिया ने सबसे बड़ा नेटवर्क खड़ा किया। इस दौरान 14 से ज्यादा प्रमुख भर्तियों में सेंध लगी, जिससे करीब 40 लाख युवाओं की मेहनत पर पानी फिरा
• पुस्तकालयाध्यक्ष (Librarian) - 2019: दिसंबर माह में आयोजित इस परीक्षा का प्रश्नपत्र लीक होने से 55 हजार से अधिक अभ्यर्थियों की मेहनत बेकार गई।
• कनिष्ठ अभियंता (JEN Civil) - 2020: तकनीकी शिक्षा वर्ग की इस परीक्षा का प्रश्नपत्र सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर परीक्षा शुरू होने से पहले ही प्रसारित हो गया था।
• रीट (REET Level-2) - 2021: प्रदेश के इतिहास की सबसे बड़ी परीक्षा धांधली। सुरक्षा घेरा तोड़कर स्ट्रॉन्ग रूम से पेपर निकाला गया और ब्लूटूथ लगी चप्पलों का उपयोग हुआ। अंततः सरकार ने इसे पूरी तरह रद्द किया।
• उपनिरीक्षक (SI) भर्ती - 2021: इस पुलिस भर्ती परीक्षा में नकली परीक्षार्थियों (डमी कैंडिडेट्स) और पेपर लीक गिरोहों की गहरी संलिप्तता पाई गई।जांच एजेंसियों ने कार्रवाई करते हुए 2021 की एसआई भर्ती के फर्जी टॉपर्स, आरपीएससी के पूर्व पदाधिकारियों और बड़े दलालों को सलाखों के पीछे डाला है।
• उच्च न्यायालय LDC व वनरक्षक - 2022: मार्च 2022 में हाईकोर्ट क्लर्क और नवंबर 2022 में वनरक्षक परीक्षा के प्रश्नपत्र इंटरनेट पर वायरल होने के बाद संबंधित पारियां निरस्त की गईं।
• द्वितीय श्रेणी शिक्षक (2nd Grade Teacher) - 2022: उदयपुर में एक चलती बस के भीतर अभ्यर्थियों को सामान्य ज्ञान (GK) का पर्चा हल करवाते हुए रंगे हाथों पकड़ा गया, जिसके तुरंत बाद परीक्षा रोकी गई।
भारतीय मीडिया की प्रेस फ्रीडम रैंकिंग क्यों गिरती जा रही है? यहां पर भारतीय मीडिया की विश्वसनीयता पर भी सवाल करेंगे.
एक मजबूत लोकतंत्र की नींव चार स्तंभों पर टिकी होती है: विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और पत्रकारिता (मीडिया)। पत्रकारिता को 'चौथा स्तंभ' इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसका मूल काम सत्ता में बैठे लोगों से तीखे सवाल पूछना और जनता की आवाज को सरकार तक पहुंचाना है। लेकिन आज भारत में यह तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। निष्पक्ष पत्रकारिता करने के बजाय आज का मुख्यधारा मीडिया (Mainstream Media) खुद सत्ता का एक हिस्सा या उसका 'चीयरलीडर' बनता जा रहा है।
अंतरराष्ट्रीय संस्था 'रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स' द्वारा जारी विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक (World Press Freedom Index 2026) के ताजा आंकड़ों के अनुसार, 180 देशों की सूची में भारत खिसककर 157वें स्थान पर आ गया है. पिछले साल भारत 151वें स्थान पर था। यह लगातार गिरावट केवल एक सरकारी आंकड़ा नहीं है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस बात का सुबूत है कि हमारे देश में निष्पक्ष और स्वतंत्र पत्रकारिता का दम घुट रहा है। हम इस रैंकिंग में अपने कई पड़ोसी देशों से भी पीछे छूट चुके हैं।
1. हिंदू-मुस्लिम एंगल और नफरत का नैरेटिव
आज टीवी चैनलों के प्राइम-टाइम डिबेट्स को देखकर ऐसा लगता है कि देश की सबसे बड़ी समस्या विकास नहीं, बल्कि सामाजिक बिखराव है। मीडिया का एक बड़ा हिस्सा हर मुद्दे को 'हिंदू बनाम मुस्लिम' के चश्मे से देखने और दिखाने का आदी हो चुका है:
सांप्रदायिक ध्रुवीकरण: चाहे कोई त्योहार हो, कोई आपराधिक घटना हो या फिर कोई सरकारी नीति—उसे इस तरह पेश किया जाता है जिससे दो समुदायों के बीच खाई और गहरी हो।
आज मीडिया बिना किसी ठोस जांच-पड़ताल (Fact-check) के खबरें चलाने लगा है। राजनीतिक एजेंडे के तहत फेक प्रोपेगैंडा और डॉक्टर्ड (छेड़छाड़ किए गए) वीडियो को मुख्यधारा के चैनलों पर असली खबर बनाकर परोस दिया जाता है। सोशल मीडिया और तथाकथित 'व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी' से निकलने वाली अफवाहों को टीवी स्क्रीन पर इस तरह दिखाया जाता है जिससे समाज में अशांति और भ्रम फैले। जब तक उस खबर का झूठ सामने आता है, तब तक प्रोपेगैंडा फैलाने वाले अपना काम कर चुके होते हैं।
भारतीय मीडिया ने एक नई कला सीखी है—"नागरिकों का ध्यान असली समस्याओं से भटकाना।" जब देश में गंभीर संकट होते हैं, तो मीडिया जानबूझकर किसी फिल्मी सितारे, किसी प्रैंक या किसी काल्पनिक विवाद को 24 घंटे दिखाना शुरू कर देता है। आज मीडिया इन असली मुद्दों पर बात करने से पूरी तरह बचता है:
जवाबदेही से बचाव: सरकार की आर्थिक नीतियों या जनता से जुड़े बुनियादी अधिकारों पर चर्चा करने के बजाय, मीडिया अपनी पूरी ऊर्जा विपक्षी दलों से सवाल पूछने और सरकार का बचाव करने में लगा देता है।
5. टीआरपी और कॉर्पोरेट का खेल
इस झुकाव के पीछे एक पूरा बिजनेस मॉडल काम कर रहा है। मीडिया घरानों को चलाने के लिए भारी-भरकम फंड की जरूरत होती है, जिसका एक बड़ा हिस्सा सरकारी विज्ञापनों और बड़े कॉर्पोरेट घरानों से आता है। जिन उद्योगपतियों के व्यावसायिक हित सीधे तौर पर सरकार की नीतियों से जुड़े होते हैं, वे ही इन चैनलों के मालिक हैं। परिणाम यह होता है कि जनता के हितों की जगह व्यापारिक और राजनीतिक हितों को प्राथमिकता दी जाती है।
मीडिया के इस झुकाव के पीछे कोई एक कारण नहीं है। इसके पीछे एक पूरा बिजनेस मॉडल काम कर रहा है:
2 भड़काऊ डिबेट्स:
स्टूडियो में बैठकर चिल्लाने वाले एंकर और पैनलिस्ट देश की धर्मनिरपेक्ष साख को नुकसान पहुंचा रहे हैं। टीआरपी (TRP) बटोरने के लिए नफरत को एक मुनाफे का सौदा बना दिया गया है।
3. फेक प्रोपेगैंडा और 'व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी' का सच
आज मीडिया बिना किसी ठोस जांच-पड़ताल (Fact-check) के खबरें चलाने लगा है। राजनीतिक एजेंडे के तहत फेक प्रोपेगैंडा और डॉक्टर्ड (छेड़छाड़ किए गए) वीडियो को मुख्यधारा के चैनलों पर असली खबर बनाकर परोस दिया जाता है। सोशल मीडिया और तथाकथित 'व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी' से निकलने वाली अफवाहों को टीवी स्क्रीन पर इस तरह दिखाया जाता है जिससे समाज में अशांति और भ्रम फैले। जब तक उस खबर का झूठ सामने आता है, तब तक प्रोपेगैंडा फैलाने वाले अपना काम कर चुके होते हैं।
4. असली मुद्दों से ध्यान भटकाने (Diversion) की कला
भारतीय मीडिया ने एक नई कला सीखी है—"नागरिकों का ध्यान असली समस्याओं से भटकाना।" जब देश में गंभीर संकट होते हैं, तो मीडिया जानबूझकर किसी फिल्मी सितारे, किसी प्रैंक या किसी काल्पनिक विवाद को 24 घंटे दिखाना शुरू कर देता है। आज मीडिया इन असली मुद्दों पर बात करने से पूरी तरह बचता है:
बढ़ती बेरोजगारी और महंगाई: युवाओं के पास नौकरियां क्यों नहीं हैं और आम आदमी की थाली महंगी क्यों हो रही है, इस पर कोई भी बड़ा चैनल गंभीर विश्लेषण नहीं करता।
शिक्षा और स्वास्थ्य का गिरता स्तर: हाल ही में हुए विभिन्न पेपर लीक विवाद और ऑन-स्क्रीन मार्किंग (OSM) जैसी शिक्षा व्यवस्था की कमियों पर सवाल उठाने के बजाय मीडिया ध्यान भटकाने वाले नैरेटिव गढ़ने में व्यस्त रहता है।
जवाबदेही से बचाव: सरकार की आर्थिक नीतियों या जनता से जुड़े बुनियादी अधिकारों पर चर्चा करने के बजाय, मीडिया अपनी पूरी ऊर्जा विपक्षी दलों से सवाल पूछने और सरकार का बचाव करने में लगा देता है।
5. टीआरपी और कॉर्पोरेट का खेल
इस झुकाव के पीछे एक पूरा बिजनेस मॉडल काम कर रहा है। मीडिया घरानों को चलाने के लिए भारी-भरकम फंड की जरूरत होती है, जिसका एक बड़ा हिस्सा सरकारी विज्ञापनों और बड़े कॉर्पोरेट घरानों से आता है। जिन उद्योगपतियों के व्यावसायिक हित सीधे तौर पर सरकार की नीतियों से जुड़े होते हैं, वे ही इन चैनलों के मालिक हैं। परिणाम यह होता है कि जनता के हितों की जगह व्यापारिक और राजनीतिक हितों को प्राथमिकता दी जाती है।
क्यू मीडिया चैनल सरकार से सवाल नहीं पूछते
मीडिया के इस झुकाव के पीछे कोई एक कारण नहीं है। इसके पीछे एक पूरा बिजनेस मॉडल काम कर रहा है:
देश के लगभग 40 से ज्यादा बड़े समाचार चैनलों का संचालन और मालिकाना हक सीधे तौर पर राजनेताओं, उनके करीबियों या राजनीतिक संगठनों के हाथों में है।
1 मीडिया घरानों को चलाने के लिए भारी-भरकम फंड की जरूरत होती है, जिसका एक बड़ा हिस्सा सरकारी विज्ञापनों से आता है। ऐसे में सरकार के खिलाफ बोलना आर्थिक रूप से उनके लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है।
2 देश के बड़े मीडिया चैनलों का नियंत्रण कुछ गिने-चुने बड़े उद्योगपतियों के हाथों में है। इन उद्योगपतियों के व्यावसायिक हित सीधे तौर पर सरकार की नीतियों से जुड़े होते हैं। परिणाम यह होता है कि निष्पक्षता की जगह व्यापारिक हितों को प्राथमिकता दी जाती है।
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A नेटवर्क18 समूह (News18 Network, CNBC): मुकेश अंबानी की अगुवाई वाली रिलायंस इंडस्ट्रीज के पास इस विशाल नेटवर्क का स्वामित्व है। आलोचकों के अनुसार, इस नेटवर्क की नीतियां आमतौर पर सत्तारूढ़ दल के अनुकूल रहती हैं।
B NDTV (न्यूज़ २४x7): साल 2022 के अंत में अडानी समूह (गौतम अडानी) ने इस चैनल का अधिग्रहण कर लिया। इसके बाद चैनल की संपादकीय टीम और कवरेज के तरीके में व्यापक बदलाव देखा गया। पहले इसमें रवीश कुमार लंबे समय तक NDTV इंडिया के सबसे प्रमुख चेहरा और देश के बेहद लोकप्रिय पत्रकार रहे हैं। उनके शो 'प्राइम टाइम' को भारतीय टीवी पत्रकारिता में एक मिसाल माना जाता था, जहाँ वे सीधे सरकार की नीतियों, बेरोजगारी, स्वास्थ्य, शिक्षा और आम जनता से जुड़े गंभीर मुद्दों पर तीखे सवाल पूछते थे।
B रिपब्लिक टीवी: इसके प्रबंध संपादक अर्णव गोस्वामी हैं। इस चैनल की शुरुआत के समय BJP के राज्यसभा सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री राजीव चंद्रशेखर की कंपनी (एशियानेट न्यूज़) ने इसमें बड़ा निवेश किया था।
3 टीआरपी (TRP) की दौड़ ने गंभीर पत्रकारिता को एक 'इश्यू-बेस्ड एंटरटेनमेंट' बना दिया है, जहाँ चिल्लाने और विवाद पैदा करने को ही पत्रकारिता मान लिया गया है।
4 इसके अलावा मीडिया मालिक सरकार जाँच एजेंसी के डर से भी सरकार के खिलाफ कुछ नहीं बोलते हैं
4. स्वतंत्र पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया की उम्मीद
मुख्यधारा की इस गिरावट के बीच, एक सकारात्मक बदलाव भी देखने को मिल रहा है। यूट्यूब, स्वतंत्र वेबसाइट्स और पॉडकास्ट जैसे डिजिटल माध्यमों ने जनता के सामने एक नया विकल्प रखा है। कई स्वतंत्र पत्रकार (Independent Journalists) बिना किसी कॉर्पोरेट या सरकारी दबाव के सीधे जमीन पर जाकर असल मुद्दों को उठा रहे हैं। हालांकि, इन स्वतंत्र आवाजों को भी अक्सर कानूनी और वित्तीय चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।
एक ऐसे मीडिया की जरूरत है जो सत्ता के सामने निडर होकर खड़ा हो सके और आंखें मूंदने के बजाय आंखें खोलने का काम करे।



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