ताइवान पर ड्रैगन की नज़र, चीन-ताइवान विवाद का सच , क्या दुनिया फिर से एक नए युद्ध की ओर बढ़ रही है ?

 

ताइवान पर ड्रैगन की नज़र: क्या एशिया में महायुद्ध का खतरा ?? क्या दुनिया फिर से एक नए युद्ध की ओर बढ़ रही है ? चीन-ताइवान विवाद का सच





इस ब्लॉग में हम जानेंगे कि चीन-ताइवान विवाद क्या है। चीन ताइवान पर अपना दावा क्यों करता है और ताइवान चीन के इस दावे को क्यों खारिज करता है।
China लगातार ताइवान पर अपनी संप्रभुता का दावा करता रहा है। वह ताइवान को अपने क्षेत्र का हिस्सा मानता है और आवश्यकता पड़ने पर बल प्रयोग के माध्यम से भी उसके साथ पुनःएकीकरण (Reunification) पर ज़ोर देता है United States ने ताइवान को समर्थन और उसकी रक्षा के लिए अपनी बढ़ती तत्परता दिखाई है।



ताइवान का परिचय -


ताइवान पूर्वी और दक्षिणी चीन सागर में स्थित एक छोटा सा द्वीपीय देश है, जो ईस्ट चाइना (EAST CHINA SEA )सी और साउथ चाइना सी (SOUTH CHINA SEA) के बीच स्थित है। यह चीन से लगभग 160 किलोमीटर दूर है। ताइवान, चीन से ताइवान स्ट्रेट द्वारा अलग होता है।

इसके पड़ोसी देशों में चीन, उत्तर में जापान और दक्षिण में फिलीपींस शामिल हैं।

ताइवान की राजधानी ताइपेई सिटी है, जो इसके उत्तरी भाग में स्थित है। इसकी आबादी लगभग 2.39 करोड़ के आसपास है।

ताइवान का क्षेत्रफल लगभग 35,808 वर्ग किलोमीटर (13,826 वर्ग मील) है। इसका लगभग दो-तिहाई हिस्सा पहाड़ों से घिरा हुआ है। ताइवान में समतल जमीन कम होने की वजह से अधिकांश आबादी थोड़े से क्षेत्र में ही केंद्रित है, जिसकी वजह से यह एक अत्यधिक शहरीकृत देश बन गया है।


ताइवान किस लिए दुनिया में जाना जाता है —


ताइवान पूरी दुनिया में अपनी अत्याधुनिक और हाई-टेक सेमीकंडक्टर चिप मैन्युफैक्चरिंग के लिए जाना जाता है। आज दुनिया की लगभग 90% हाई-टेक सेमीकंडक्टर चिप्स अकेले ताइवान बनाता है।

ताइवान Apple, Inc., NVIDIA और Qualcomm जैसी दुनिया की दिग्गज कंपनियों के लिए चिप्स बनाता है। ताइवान की सबसे बड़ी सेमीकंडक्टर बनाने वाली कंपनी Taiwan Semiconductor Manufacturing Company है

सेमीकंडक्टर क्या है —






सेमीकंडक्टर एक छोटी सी चिप होती है, जो आज के समय के लगभग हर इलेक्ट्रॉनिक उपकरण में लगी होती है। यह अंतरिक्ष यान से लेकर रक्षा उपकरण, कार, कंप्यूटर, मोबाइल, टीवी, एसी, रेफ्रिजरेटर, माइक्रोवेव, मेडिकल उपकरण, MRI मशीन और रोबोट समेत लगभग हर इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस में इस्तेमाल होती है।
आज के समय में सेमीकंडक्टर चिप्स के बिना किसी भी इलेक्ट्रॉनिक उपकरण या गैजेट का निर्माण करना लगभग नामुमकिन है।



ताइवान का इतिहास

ताइवान में हज़ारों सालों से वहीं के मूल निवासी रहते आ रहे हैं। लेकिन 16 वीं और 17 वीं सदी में जब यूरोपीय देशों में दुनिया को खोजने का दौर चला, तब पुर्तगाली खोजकर्ताओं ने 16वीं सदी में इस द्वीप को देखा और इसका नाम “फॉर्मोसा” रखा। उसके बाद 1624 में डचों ने इस पर कब्जा कर लिया और अपनी कॉलोनी बसाई। साथ ही उन्होंने चीन से लोगों को यहां काम करने के लिए बुलाना शुरू किया।

फिर 1683 में चीन के किंग राजवंश (Qing dynasty) ने डचों को हराकर ताइवान पर कब्ज़ा कर लिया और मुख्य भूमि (MAIN LAND CHINA) से हान चीनी लोगों का यहाँ प्रवास तेज़ी से बढ़ा। बाद में 1885 ताइवान को आधिकारिक रूप से किंग साम्राज्य का एक प्रांत घोषित किया गया।




 लेकिन 1895 में हुए चीन-जापान युद्ध में किंग राजवंश Qing dynasty की हार हुई, जिसके बाद किंग सरकार ने ताइवान जापान को सौंप दिया।

उस समय तक जापान तेज़ी से औद्योगिक विकास कर चुका था, जबकि चीन ऐसा नहीं कर पाया था। परिणामस्वरूप चीन हार गया. इसके बाद अगले 50 वर्षों तक ताइवान जापानी उपनिवेश बना रहा। अर्थात 1945 में द्वितीय विश्व युद्ध के अंत और जापानी साम्राज्य के पतन तक ताइवान मूलतः जापान का उपनिवेश था, ठीक वैसे ही जैसे भारत ब्रिटिश उपनिवेश था। जिसके दौरान द्वीप पर बुनियादी ढाँचे (रेलवे, शिक्षा, और उद्योग) का तेज़ी से विकास हुआ।

द्वितीय विश्व युद्ध में जापान की हार के बाद Republic of China सरकार के प्रतिनिधियों ने ताइवान में जापानी सेना का आत्मसमर्पण स्वीकार किया और ताइवान फिर से चीन के नियंत्रण में आ गया।




चीन-ताइवान संघर्ष की शुरुआत का मुख्य कारण और इस संघर्ष की जड़ -


Chinese Civil War को चीन-ताइवान विवाद की शुरुआत और मुख्य कारण माना जाता है।


चीनी गृहयुद्ध (1927-1949) का मुख्य कारण राष्ट्रवादी पार्टी (केएमटी - KMT) और चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (सीसीपी - CCP) के बीच विचारधारा की गहरी लड़ाई थी। दोनों दल इस बात पर अड़े थे कि चीन पर राज कौन करेगा, और चीन में किस प्रकार की विचारधारा रहेगी। यह संघर्ष मुख्यतः दो पार्टियों के बीच था। एक ओर माओत्से तुंग के नेतृत्व वाली कम्युनिस्ट पार्टी (People's Republic of China) थी और दूसरी ओर राष्ट्रवादी सरकार (कुओमिन्तांग/KMT पार्टी थी।





उस समय चीन की अधिकांश आबादी गांवों में रहती थी और बड़ी संख्या में किसान बेहद गरीब थे। बहुत कम ज़मीन अमीर जमींदारों के पास थी, जबकि करोड़ों किसान दूसरों की जमीन पर काम करते थे और भारी कर तथा कर्ज के बोझ में दबे रहते थे।

इसी स्थिति का फायदा Chinese Communist Party ने उठाया। पार्टी ने किसानों से वादा किया कि अगर वे उनका समर्थन करेंगे तो जमींदारों की अतिरिक्त जमीन गरीब किसानों में बांटी जाएगी। इसे “भूमि सुधार” (Land Reform) कहा गया। कम्युनिस्टों ने कई इलाकों में सच में जमीन बांटना भी शुरू कर दिया। इससे गरीब किसानों को पहली बार लगा कि कोई राजनीतिक ताकत सीधे उनके हित की बात कर रही है। दूसरी तरफ Kuomintang की सरकार पर भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी और अमीर वर्ग का पक्ष लेने के आरोप लग रहे थे।

गांवों में रहने वाले लाखों किसानों ने इसलिए कम्युनिस्ट पार्टी को भोजन, सैनिक और स्थानीय समर्थन देना शुरू कर दिया। यही ग्रामीण समर्थन आगे चलकर गृहयुद्ध में कम्युनिस्टों की सबसे बड़ी ताकत बना।

जिस वजह से चीन में कम्युनिस्ट पार्टी की जीत हुई।

1949 में कम्युनिस्टों की जीत के बाद राष्ट्रवादी सरकार ताइवान चली गई और वहाँ Republic of China (ROC) की स्थापना की, जबकि CPC ने मुख्यभूमि चीन में People's Republic of China (PRC) की घोषणा की। ध्यान रहे कि Republic of China (ROC) ने ताइवान में अपनी सरकार बनाई, जबकि चीन में People's Republic of China (PRC) की स्थापना हुई। दोनों अलग-अलग हैं।

जब Mao Zedong ने मुख्यभूमि चीन पर सत्ता संभाली, तब लगभग 20 लाख चीनी राष्ट्रवादी, जो कम्युनिज्म के विरोधी थे ताइवान भाग गए।

इसी के साथ “व्हाइट टेरर” का दौर शुरू हुआ, जो 1991 तक चला. इस दौरान ताइवान में 1949 से 1987 तक चले  इस दमनकारी दौर ME जब मार्शल लॉ लागू था हजारों लोगों को कम्युनिस्ट होने या सरकार का विरोध करने के शक में गिरफ्तार, जेल या फांसी दी गई. 23 अगस्त 1958 को को किनमेन में तैनात TAIWAN सेना और चीनी बलों के बीच भारी तोपखाने की लड़ाई शुरू हुई, जो 40 दिनों से अधिक समय तक चली।

आज की विवादित स्थिति सीधे चीनी गृहयुद्ध का परिणाम है, जिसमें पराजित राष्ट्रवादी सरकार (कुओमिन्तांग/KMT) 1949 में मुख्यभूमि चीन छोड़कर ताइवान चली गई थी। उस समय उसने PRC की “एक चीन” नीति को स्वीकार तो किया, लेकिन उसका समर्थन नहीं किया।

 

चीन के ताइवान पर अपना दावा करने के कारण-


आज ताइवान द्वीप को चीन द्वारा पारंपरिक चीनी क्षेत्र का अभिन्न हिस्सा बताया जाता है। क्योंकि यह किंग राजवंश Qing dynasty के अधीन आता था। इसके विपरीत, Taiwan की जनता और नेतृत्व का कहना है कि वे अपनी स्वायत्त व्यवस्था के तहत कार्य करते हैं। चीन ताइवान को अपना एक 'विद्रोही प्रांत' मानता है और इस पर अपना दावा करता है, जबकि ताइवान खुद को एक संप्रभु राष्ट्र के रूप में संचालित करता है।


इसके अलावा कुछ और कारण हैं, जिनकी वजह से चीन ताइवान को अपना हिस्सा बताता है।


China के ताइवान पर दावा करने के पीछे कई ऐतिहासिक, राजनीतिक, सैन्य और आर्थिक कारण हैं। केवल “ज़मीन कब्ज़ा” इसका पूरा कारण नहीं है। मुख्य वजहें ये हैं:

1. ऐतिहासिक और राष्ट्रवादी कारण


चीन की कम्युनिस्ट सरकार Taiwan को चीन का हिस्सा मानती है।
1949 के चीनी गृहयुद्ध के बाद राष्ट्रवादी सरकार ताइवान चली गई थी, जबकि Communist Party of China ने मुख्यभूमि चीन पर नियंत्रण स्थापित किया।

चीन के अनुसार चीन का पुनःएकीकरण अधूरा है। ताइवान का अलग रहना चीन की राष्ट्रीय एकता के खिलाफ माना जाता है। राष्ट्रपति Xi Jinping इसे “Chinese Rejuvenation” यानी चीन के पुनरुत्थान का हिस्सा बताते हैं।


2. कम्युनिस्ट पार्टी की वैधता और सत्ता


चीनी सरकार के लिए ताइवान केवल विदेश नीति का मुद्दा नहीं, बल्कि घरेलू राजनीति का भी सवाल है।

अगर ताइवान हमेशा अलग रहता है:
तो यह चीन के राष्ट्रवादी नैरेटिव को कमजोर कर सकता है।
इससे चीन के अंदर भी लोग पूछ सकते हैं कि “एक चीन” की नीति पूरी क्यों नहीं हुई।

इसलिए CPC ताइवान मुद्दे को अपनी राजनीतिक वैधता और राष्ट्रीय गर्व से जोड़ती है।


3. रणनीतिक और सैन्य महत्व


ताइवान की स्थिति प्रशांत महासागर में बेहद महत्वपूर्ण है। अगर चीन ताइवान पर नियंत्रण पा ले तो उसकी नौसेना सीधे पश्चिमी प्रशांत में आसानी से प्रवेश कर सकेगी।अमेरिका और उसके सहयोगियों की रणनीति कमजोर हो जाएगी. इसी कारण United States और Japan ताइवान को बहुत महत्वपूर्ण मानते हैं।


4. टेक्नोलॉजी और सेमीकंडक्टर


ताइवान दुनिया का सबसे बड़ा उन्नत चिप निर्माता है। Taiwan दुनिया के सबसे एडवांस सेमीकंडक्टर बनाती है, जिनका उपयोग AI,स्मार्टफोन,सुपरकंप्यूटर,मिसाइल,फाइटर जेट,और आधुनिक हथियारों में होता है। ताइवान पर नियंत्रण चीन को टेक्नोलॉजी और सप्लाई चेन में भारी बढ़त दे सकता है।


5. लोकतंत्र बनाम एकदलीय शासन

ताइवान एक सफल लोकतंत्र है, जबकि चीन एकदलीय कम्युनिस्ट शासन है।
बीजिंग को डर रहता है कि चीनी भाषा और संस्कृति वाला एक लोकतांत्रिक, समृद्ध समाज
चीन की जनता के लिए वैकल्पिक मॉडल बन सकता है। इसलिए ताइवान का अलग और लोकतांत्रिक बने रहना चीन के राजनीतिक मॉडल के लिए वैचारिक चुनौती भी माना जाता है।


6. अमेरिका-चीन शक्ति संघर्ष
ताइवान आज अमेरिका और चीन की वैश्विक प्रतिस्पर्धा का केंद्र बन चुका है।
चीन मानता है कि अमेरिका ताइवान का इस्तेमाल चीन को रोकने के लिए कर रहा है।
ताइवान पर अमेरिकी समर्थन चीन की सुरक्षा के लिए खतरा है।



 चीन काफी समय से जानबूझकर अपने विमान, युद्धपोत और मिसाइलें ताइवानी क्षेत्र के आसपास भेजता रहता है।

हालांकि CHINA ने कभी ताइवान पर वास्तविक नियंत्रण नहीं किया, फिर भी वह ताइवान को चीन का अभिन्न हिस्सा मानता है, जिसका “पुनःएकीकरण” मुख्यभूमि चीन के साथ होना चाहिए। चीन शांतिपूर्ण एकीकरण को प्राथमिकता देने की बात करता है, लेकिन अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए बल प्रयोग से पीछे नहीं रहेगा।


अगर चीन-ताइवान युद्ध होता है, तो क्या होगा?



ताइवान दुनिया के लगभग 65% सेमीकंडक्टर और 90% सबसे उन्नत चिप्स का उत्पादन करती है। यदि चीन और ताइवान के बीच संघर्ष हुआ, तो वैश्विक सप्लाई चेन बुरी तरह प्रभावित होगी। युद्ध से वैश्विक अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान होगा,चीन पर बड़े प्रतिबंध लग सकते हैं,

चीन की बढ़ती आक्रामकता के जवाब में Joe Biden प्रशासन ने ट्रंप प्रशासन की कई नीतियों को जारी रखा। मई 2022 में राष्ट्रपति बाइडेन ने कहा कि आवश्यकता पड़ने पर अमेरिका ताइवान की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है।


भारत के ताइवान के साथ संबंध और ताइवान पर भारत का रुख।







India और Taiwan के बीच औपचारिक राजनयिक संबंध नहीं हैं, क्योंकि भारत आधिकारिक रूप से “One China Policy” को मान्यता देता है। इसी कारण दोनों देशों के बीच दूतावास नहीं हैं। लेकिन “ट्रेड एंड कल्चरल ऑफिस” के माध्यम से अनौपचारिक संबंध चलाए जाते हैं।

भारत और ताइवान के बीच औपचारिक राजनयिक संबंध न होने के बावजूद, प्रौद्योगिकी, व्यापार और रणनीतिक हितों पर आधारित एक बहुआयामी साझेदारी विकसित हो रही है। ताइवान की नई दक्षिणमुखी नीति और भारत की "मेक इन इंडिया" पहल के चलते द्विपक्षीय व्यापार लगभग एक अरब डॉलर के ऐतिहासिक उच्च स्तर पर पहुंच गया है।

Taiwan ने कुल स्टॉक मार्केट कैपिटलाइजेशन के मामले में हाल ही में India को पीछे छोड़ दिया है। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण दुनिया की दिग्गज सेमीकंडक्टर कंपनी Taiwan Semiconductor Manufacturing Company (TSMC) के शेयरों में आई जबरदस्त तेजी है।

आर्थिक और तकनीकी तालमेल-


भारत के वैश्विक इलेक्ट्रॉनिक्स और सेमीकंडक्टर हब बनने के लक्ष्य में ताइवान एक महत्वपूर्ण भागीदार के रूप में कार्य कर रहा है, और इस दौरान आर्थिक संबंध तेजी से विस्तार कर रहे हैं। फॉक्सकॉन, विस्ट्रॉन और पेगाट्रॉन जैसी ताइवान की प्रमुख इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनियों ने भारत में भारी निवेश किया है।
वेफर उत्पादन, सेमीकंडक्टर पैकेजिंग और हार्डवेयर में सहयोग बढ़ रहा है। इससे भारत को मुख्य भूमि चीन पर अपनी व्यापारिक निर्भरता को कम करने में मदद मिलती है।

ताइवान की कई कंपनियाँ भारत में निवेश कर रही हैं, खासकर इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग
चिप सप्लाई चेन मोबाइल उत्पादन सेमीकंडक्टर और टेक्नोलॉजी सहयोग.
पिछले कुछ वर्षों में दोनों के बीच आर्थिक, तकनीकी, शैक्षिक और रणनीतिक सहयोग तेजी से बढ़ा है। ताइवान भारतीय छात्रों को स्कॉलरशिप देता है,

भारत आधिकारिक रूप से ताइवान स्ट्रेट में शांति का समर्थन करता है। जब भी भारत और ताइवान के संबंध मजबूत होते हैं, चीन अक्सर आपत्ति जताता है। CHINA KAHTA HAI KI दूसरे देश ताइवान के साथ आधिकारिक संपर्क सीमित रखें। ताइवान को अलग राजनीतिक पहचान न मिले।




European Union और यूरोप के अधिकांश देशों का ताइवान को लेकर रुख “संतुलित लेकिन सतर्क” माना जाता है। यूरोप आधिकारिक रूप से People's Republic of China की “One China Policy” को मानता है, यानी ताइवान को अलग संप्रभु देश के रूप में औपचारिक मान्यता नहीं देता। लेकिन इसके साथ ही यूरोपीय देश Taiwan के साथ आर्थिक, तकनीकी और राजनीतिक संबंध लगातार मजबूत कर रहे हैं।




अमेरिका-ताइवान संबंध






1. “One China Policy” और अमेरिकी रुख


1979 में अमेरिका ने आधिकारिक राजनयिक संबंध People's Republic of China के साथ स्थापित किए और बीजिंग को चीन की वैध सरकार माना। लेकिन अमेरिका ताइवान को पूरी तरह चीन का हिस्सा भी नहीं मानता और ताइवान की स्थिति को अनिर्धारित (Undetermined) मानता है। अमेरिका ताइवान को हथियार बेच सकता है,
उसकी आत्मरक्षा क्षमता बनाए रखने में मदद करेगा और किसी भी जबरदस्ती या बल प्रयोग का विरोध करेगा। हालांकि यह कानून अमेरिका को सीधे युद्ध में शामिल होने के लिए बाध्य नहीं करता।


2. अमेरिका ताइवान का समर्थन क्यों करता है?


ताइवान प्रशांत महासागर में बेहद महत्वपूर्ण स्थान पर है। अगर चीन ताइवान पर नियंत्रण पा ले तो उसकी नौसेना पश्चिमी प्रशांत में ज्यादा ताकतवर हो जाएगी और अमेरिकी प्रभाव कमजोर हो सकता है। अमेरिका ताइवान को चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने
का महत्वपूर्ण हिस्सा मानता है।अमेरिका ताइवान को आधुनिक हथियार बेचता है सैन्य प्रशिक्षण देता है और नौसैनिक उपस्थिति बनाए रखता है। जरूरत पड़ने पर अमेरिका ताइवान की रक्षा करेगा।

3. सेमीकंडक्टर और टेक्नोलॉजी


Taiwan दुनिया के सबसे एडवांस चिप्स बनाती है।

ये चिप्स AI,iPhone,सुपरकंप्यूटर,मिसाइल,फाइटर जेट और अमेरिकी रक्षा तकनीक में उपयोग होते हैं इसीलिए ताइवान की सुरक्षा अमेरिका की टेक्नोलॉजी और आर्थिक सुरक्षा से भी जुड़ी है।



जब भी अमेरिकी नेता ताइवान जाते हैं तो चीन अक्सर सैन्य अभ्यास, युद्धपोत,और लड़ाकू विमान ताइवान के आसपास भेजता है।


चीन-ताइवान युद्ध का भारत पर प्रभाव।


यदि China और Taiwan के बीच युद्ध होता है, तो उसका प्रभाव केवल एशिया तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरी दुनिया की राजनीति, अर्थव्यवस्था और सुरक्षा पर पड़ेगा। भारत भी इससे अछूता नहीं रहेगा।

1. व्यापार और अर्थव्यवस्था पर असर

ताइवान दुनिया में सेमीकंडक्टर (चिप) उत्पादन का सबसे बड़ा केंद्र है। मोबाइल, कंप्यूटर, कार और आधुनिक हथियारों में इस्तेमाल होने वाली चिप्स का बड़ा हिस्सा ताइवान से आता है। युद्ध की स्थिति में सप्लाई चेन बाधित हो सकती है, जिससे भारत समेत दुनिया भर में इलेक्ट्रॉनिक सामान महंगे हो सकते हैं।

2. भारत-चीन संबंधों में तनाव

भारत और चीन के बीच पहले से ही सीमा विवाद मौजूद हैं। यदि चीन ताइवान पर हमला करता है, तो एशिया में उसका आक्रामक रवैया और बढ़ सकता है। इससे भारत को अपनी सीमाओं, विशेषकर लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश क्षेत्र में अतिरिक्त सतर्कता रखनी पड़ सकती है।

3. हिंद-प्रशांत क्षेत्र में रणनीतिक बदलाव

भारत Quadrilateral Security Dialogue (QUAD) का सदस्य है, जिसमें अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया भी शामिल हैं। चीन-ताइवान युद्ध की स्थिति में भारत पर अपने सहयोगियों के साथ रणनीतिक सहयोग बढ़ाने का दबाव आ सकता है।

4. वैश्विक बाजार और तेल कीमतों पर प्रभाव

युद्ध के कारण वैश्विक बाजारों में अस्थिरता बढ़ सकती है। समुद्री व्यापार मार्ग प्रभावित होने से तेल और गैस की कीमतें बढ़ सकती हैं, जिसका सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था और महंगाई पर पड़ेगा।

5. सुरक्षा और सैन्य तैयारी

यदि एशिया में बड़ा युद्ध होता है, तो भारत को अपनी नौसेना और वायुसेना की गतिविधियाँ बढ़ानी पड़ सकती हैं। हिंद महासागर क्षेत्र में चीन की सैन्य गतिविधियों पर भी भारत को अधिक नजर रखनी होगी।

6. कूटनीतिक संतुलन

भारत आधिकारिक रूप से “वन चाइना पॉलिसी” का सम्मान करता है, लेकिन ताइवान के साथ व्यापार, तकनीक और शिक्षा के क्षेत्र में संबंध बनाए हुए है। युद्ध की स्थिति में भारत को अमेरिका और चीन के बीच संतुलन बनाकर चलना पड़ सकता है।



AMERICAN PRESEDENT TRUMP KI CHINA VISIT-


बदलती दुनिया में geopolitical relations लगातार बदलते रहते हैं। हाल ही में Donald Trump की चीन यात्रा और अमेरिका–चीन बातचीत के बाद कई experts यह सवाल उठा रहे हैं कि क्या अमेरिका की Taiwan policy में बदलाव आ रहा है।

हालांकि अभी तक अमेरिका ने आधिकारिक रूप से अपनी “One China Policy” नहीं बदली है, लेकिन हाल की घटनाओं ने Taiwan की सबसे बड़ी चिंता जरूर बढ़ा दी है। एक तरफ Trump प्रशासन Taiwan को हथियार बेचने और strategic support की बात करता है, वहीं दूसरी तरफ चीन के साथ trade deals और diplomatic understanding पर भी जोर देता दिखाई देता है।

हाल ही में अमेरिका और Iran के बीच तनाव, तथा Strait of Hormuz की सुरक्षा को लेकर बढ़ती चिंता ने भी अमेरिकी रणनीति को प्रभावित किया है। Middle East में व्यस्तता के कारण कुछ analysts मानते हैं कि भविष्य में Indo-Pacific पर अमेरिका का पूरा focus कमजोर पड़ सकता है। इसी वजह से experts यह संभावना जताते हैं कि चीन भविष्य में Taiwan पर कब्जे की रणनीति को और बड़ा सकता है।



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