Iran–America Rivalry दुश्मनी कैसे शुरू हुई - आखिर क्यों बने दुश्मन ?? दोस्ती से दुश्मनी तक friendship to enemy

Iran–America Rivalry दुश्मनी कैसे शुरू हुई - आखिर क्यों बने दुश्मन ?? दोस्ती से दुश्मनी तक friendship to enemy





Iran में America के आने से पहले का इतिहास-


हमें यह समझने के लिए इतिहास में थोड़ा पीछे जाना पड़ेगा कि अमेरिका और ईरान के बीच दुश्मनी कैसे शुरू हुई।

20वीं सदी की शुरुआत में पूरी दुनिया में कच्चे तेल (Crude Oil) की खोज चल रही थी। इसी दौरान 1908 में ईरान में भी तेल के बड़े भंडार मिले। यह खोज ब्रिटिश भूवैज्ञानिक George Reynolds ने की थी। इस खोज ने पूरी दुनिया का ध्यान ईरान की ओर खींच लिया। इसके बाद 1909 में Anglo-Persian Oil Company (APOC) की स्थापना हुई।

उस समय United Kingdom एक वैश्विक महाशक्ति था और ईरान में भी ब्रिटेन का काफी प्रभाव था। इसलिए तेल निकालने का काम APOC को दे दिया गया। चूंकि इस कंपनी के अधिकांश शेयर ब्रिटिश सरकार और ब्रिटिश निवेशकों के पास थे, इसलिए इसका पूरा नियंत्रण भी ब्रिटेन के हाथों में था। अगले लगभग 37 वर्षों तक ईरान के तेल उद्योग पर ब्रिटेन का ही नियंत्रण बना रहा।

इसका परिणाम यह हुआ कि तेल से होने वाले मुनाफे का बहुत छोटा हिस्सा ही ईरान और उसके लोगों को मिल पाता था। यहां तक कि ईरान का अपने ही तेल संसाधनों पर पूरा अधिकार भी नहीं था। यानी तेल ईरान का था, लेकिन उसका असली फायदा विदेशी ताकतों को मिल रहा था।


ईरान के तेल उद्योग का राष्ट्रीयकरण (Nationalization of the Iranian oil industry)-




1950 तक सब कुछ इसी तरह चलता रहा, लेकिन 1951 में चुने गए ईरानी प्रधानमंत्री Mohammad Mosaddegh ने ईरान के तेल उद्योग का राष्ट्रीयकरण (Nationalization) शुरू कर दिया। इसका सीधा अर्थ था कि अब ईरान अपने तेल पर पूरा नियंत्रण चाहता था और वह अपनी शर्तों पर अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल बेच सकता था। इससे तेल से होने वाला लाभ सीधे ईरान और उसकी जनता को मिलने वाला था।

ईरान के इस कदम से United Kingdom नाराज़ हो गया। इसके बाद ब्रिटेन और United States की गुप्त एजेंसियों ने मिलकर एक गुप्त अभियान चलाया और 1953 में प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसद्देक की सरकार का तख्तापलट कर दिया। उनकी जगह अमेरिका और ब्रिटेन ने ईरान के शाह Mohammad Reza Pahlavi को फिर से सत्ता में मजबूत किया, जो पश्चिम समर्थक माने जाते थे।

यही वह पहला बड़ा मौका था जब अमेरिका ने सीधे तौर पर ईरान की राजनीति में हस्तक्षेप किया और वहां अपने हितों को स्थापित करना शुरू किया।

अमेरिका और ब्रिटेन के दबाव में शाह ने 1954 के तेल समझौते (1954 Agreement) पर हस्ताक्षर किए। इस समझौते के तहत अमेरिकी, ब्रिटिश और फ्रांसीसी तेल कंपनियों को अगले 25 वर्षों के लिए ईरान के तेल उद्योग में लगभग 40 प्रतिशत स्वामित्व और तेल निकालने का अधिकार मिल गया।  हालाँकिशाहदेश की बड़ी आबादी के बीच बेहद अलोकप्रिय थे और सत्ता में बने रहने के लिए उन्हें अमेरिका के समर्थन पर निर्भर रहना पड़ raha tha.


ईरान के परमाणु  कार्यक्रम (Nuclear Program) की शुरुआत-



साल
1957 में “Atoms for Peace” कार्यक्रम के तहत अमेरिका और उसके पश्चिमी सहयोगियों ने परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण और नागरिक उपयोग के लिए एक परमाणु समझौते पर हस्ताक्षर किए। इस पहल के अंतर्गत अमेरिका विकासशील देशों को परमाणु शिक्षा और तकनीक प्रदान करता था।

ईरान के परमाणु कार्यक्रम का उद्देश्य परमाणु ऊर्जा का उपयोग शांति और विकास के लिए करना था, जैसे:

 1 बिजली उत्पादन
 2 वैज्ञानिक अनुसंधान
3  चिकित्सा क्षेत्र


और बाद में अमेरिका ने ईरान को एक परमाणु रिएक्टर तथा यूरेनियम ईंधन भी उपलब्ध कराया।इस समझौते ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम की नींव रखी. जिसे उस समय खुद अमेरिका ही समर्थन दे रहा था। लगभग एक दशक तक अमेरिका ने ईरान को एक परमाणु रिएक्टर और उसे चलाने के लिए यूरेनियम भी उपलब्ध कराया।

यही परमाणु सहयोग आगे चलकर आज के ईरान परमाणु विवाद की बुनियाद बना.

 

शाह के खिलाफ बगावत की शुरुआत-



शाह Mohammad Reza Pahlavi ईरान का तेल बेचकर मिलने वाले पैसों से देश को पश्चिमी शैली (Westernize) में बदलने की कोशिश कर रहे थे।  इससे वहां के कट्टर धार्मिक नेता नाराज़ हो गए। इसके साथ ही शाह ने जनता पर कई प्रतिबंध भी लगा रखे थे, जिससे आम लोग भी उनसे काफी नाराज़ थे। ईरान की जनता मोहम्मद रज़ा पहलवी की तानाशाही और देश की राजनीति तथा कारोबार में पश्चिमी देशों, खासकर United States, के बढ़ते हस्तक्षेप से परेशान थी। इसी वजह से लोग उन्हेंअमेरिका की कठपुतलीतक कहने लगे थे।  1978 के अंत में देशभर में क्रांतिकारी विरोध प्रदर्शन शुरू हुए, जिन्होंने पूरे ईरान को हिला दिया।1979 की इस्लामिक क्रांति में उनकी सरकार को उखाड़ फेंका गया। जनविद्रोह और अशांति के बीच जनवरी 1979 में शाह देश छोड़कर भाग गए और बाद में कैंसर के इलाज के लिए अमेरिका चले गए.

 

इस्लामिक धर्मगुरु Ayatollah Ruhollah Khomeini की  ईरान में वापसी-



निर्वासन
में रह रहे इस्लामिक धर्मगुरु Ayatollah Ruhollah Khomeini वापस चौदह वर्षों के निर्वासन के बाद ईरान लौटे। और नए इस्लामिक गणराज्य के सर्वोच्च नेता बने जो ईरान के पश्चिमीकरण का विरोध करते थे

दिसंबर 1979 में खोमैनी ने सर्वोच्च नेता के रूप में सत्ता संभाली और ईरान को एक पश्चिम समर्थक राजशाही से बदलकर कट्टर पश्चिम विरोधी इस्लामी धर्मतंत्र में परिवर्तित कर दिया।

यह अमेरिका और ब्रिटेन के लिए एक बड़ा झटका था।

1985 में Hezbollah नामक उग्रवादी संगठन लेबनान में उभरा और उसने खोमैनी के प्रति निष्ठा की शपथ ली।

 


Iran hostage crisis (ईरान बंधक संकट)-




निर्वासन के बाद जब अमेरिका ने शाह को कैंसर के इलाज के लिए अपने देश में प्रवेश दिया, तो 4 नवंबर 1979 को ईरानी क्रांतिकारी छात्रों ने तेहरान स्थित अमेरिकी दूतावास पर कब्जा कर लिया और 52 अमेरिकियों को बंधक बना लिया और मांग की कि अमेरिका शाह को ईरान प्रत्यर्पित करे  और उन्होंने उन लोगों को 444 दिनों तक बंधक बनाकर रखा।  444 दिनों बाद, बंधकों को Algiers Accords के तहत रिहा किया गया। समझौते के तहत अमेरिका ने यह वादा भी किया कि वह ईरान की राजनीति में हस्तक्षेप नहीं करेगा। इसके बाद वॉशिंगटन ने 1980 में ईरान के साथ अपने कूटनीतिक संबंध समाप्त कर दिए और ईरान पर प्रतिबंध लगा दिए। इसी दौरान शाह की निर्वासन में ही मृत्यु हो गई।

इसी घटना के बाद Iran और United States के संबंधों में दूरियां बढ़ने लगीं और दोनों देशों के रिश्ते लगातार खराब होते चले गए



इराकी आक्रमण में अमेरिका का समर्थन-


सितंबर 1980 me इराक के शासक Saddam Hussein ने Ayatollah Ruhollah Khomeini की विचारधारा को रोकने के उद्देश्य से ईरान पर हमला कर दिया। इराक को डर था कि Ruhollah Khomeini की इस्लामी क्रांति का प्रभाव इराक तक फैल सकता है।
इस युद्ध में अमेरिका ने इराक का समर्थन किया,  आर्थिक सहायता सैन्य खुफिया जानकारी (Intelligence}तकनीकी मदद जैसी सहायता दी।  जिससे अमेरिका और ईरान के बीच तनाव और गहरा गया।
यह युद्ध 1988 तक चला और दोनों देशों में हजारों लोगों की जान गई। युद्ध के दौरान इराक ने ईरान के खिलाफ रासायनिक हथियारों का भी इस्तेमाल किया।

 

Beirut में  अमेरिकी और फ्रांसीसी सैन्य बैरकों पर ट्रक बम से आत्मघाती हमला-
 


23 अक्टूबर 1983 को हुए Beirut Barracks Bombing में लेबनान की राजधानी बेरूत में अमेरिकी और फ्रांसीसी सैन्य बैरकों पर विस्फोटकों से भरे दो ट्रक ne आत्मघाती हमले किए गए। इस हमले में 241 अमेरिकी सैनिकों और 58 फ्रांसीसी सैनिकों की मौत हो गई, जिससे यह उस समय अमेरिकी मरीन कॉर्प्स पर सबसे घातक हमलों में से एक बन गया। अमेरिका और फ्रांस वहां बहुराष्ट्रीय शांति सेना के हिस्से के रूप में तैनात थे।

अमेरिका ने इन हमलों के पीछे ईरान समर्थित समूहों, खासकर Hezbollah, पर आरोप लगाया। इन घटनाओं के बाद United States और Iran के संबंध और अधिक तनावपूर्ण हो गए।

 

1984 में अमेरिकी विदेश विभाग ने ईरान कोआतंकवाद को प्रायोजित करने वाला राज्य” (State Sponsor of Terrorism) घोषित कर दिया।

जुलाई 1988 में अमेरिकी नौसेना ने एक ईरानी यात्री विमान को गलती से लड़ाकू विमान समझकर नागरिक विमान सेवा Iran Air Flight  पर मिसाइल दाग दी। जिसमें सवार सभी 290 लोगों की मौत हो गई। इस घटना ने अमेरिका और ईरान के बीच तनाव को और बढ़ा दिया। अमेरिका ने इसेगलतीबताया, लेकिन उसने तो औपचारिक माफी मांगी और ही पूरी जिम्मेदारी स्वीकार की।

 

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 इसी दौरान साल 1989 में Ruhollah Khomeini की मृत्यु हो गई और Ali Khamenei को ईरान का नया सुप्रीम लीडर चुना गया
Ali Khamenei
ईरानी क्रांति (Iranian Revolution) के प्रमुख नेताओं में से एक थे और Ruhollah Khomeini के करीबी सहयोगी माने जाते थे।

1995
और 1996 के बीच अमेरिका ने ईरान पर और कड़े प्रतिबंध लगाए। तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति Bill Clinton के आदेशों के तहत अमेरिकी कंपनियों को ईरान के साथ व्यापार करने से प्रतिबंधित कर दिया गया।
इसके साथ ही अमेरिकी कांग्रेस ने ऐसा कानून पारित किया, जिसके तहत ईरान के ऊर्जा क्षेत्र में निवेश करने वाली विदेशी कंपनियों या ईरान को उन्नत हथियार बेचने वाले दूसरे देशों पर भी पाबंदी लगाया जा सकता था।

2002 के अपने State of the Union संबोधन में राष्ट्रपति George W. Bush ने ईरान को इराक और उत्तर कोरिया के साथ “axis of evil” (बुराई की धुरी) का हिस्सा बताया।

(2013–2015) ईरान परमाणु समझौता:

2013 से 2015 के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति Barack Obama ने ईरान के साथ उच्च-स्तरीय वार्ताएँ शुरू कीं।


2015
में तेहरान ने परमाणु समझौते पर सहमति जताई, जिसे Joint Comprehensive Plan of Action (JCPOA) कहा जाता है। इस समझौते के तहत ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम और यूरेनियम संवर्धन (Enrichment) को सीमित करने पर सहमति दी, बदले में उस पर लगे कई आर्थिक प्रतिबंधों में राहत दी गई।   और यह तय किया गया कि Iran कभी भी इससे अधिक स्तर तक यूरेनियम संवर्धन (Uranium Enrichment) नहीं करेगा। इस समझौते में China, Russia, France, Germany, United Kingdom और European Union भी शामिल थे। समझौते के अनुसार ईरान के यूरेनियम संवर्धन की सीमा 3.67 प्रतिशत तय की गई थी।

Trump के पहले कार्यकाल में अमेरिका ने 2018 में  इस समझौते को एकतरफा बताकर अपने आप को  इस परमाणु समझौते से अलग कर लिया और ईरान पर दोबारा कड़े प्रतिबंध लगा दिए।
ट्रंप प्रशासन और Israel पहले से ही इस समझौते के आलोचक थे। इसके जवाब में ईरान ने भी समझौते के तहत अपनी कई प्रतिबद्धताओं को छोड़ दिया और तय सीमा से अधिक स्तर पर संवर्धित यूरेनियम का उत्पादन शुरू कर दिया।

13 जून 2019 को स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ के पास दो तेल टैंकरों पर हमला हुआ, यह घटना उस क्षेत्र में लगभग एक महीने पहले चार वाणिज्यिक जहाजों को नुकसान पहुंचने के बाद हुई थी। अमेरिका ने इन हमलों के लिए ईरान को जिम्मेदार ठहराया, जबकि राष्ट्रपति Donald Trump ने ईरान कोआतंक का राष्ट्रकहा।

 

ईरानी कमांडर Qasem Soleimani की हत्या-



3 जनवरी 2020 को अमेरिकी सेना ने इराक की राजधानी बगदाद के पास एक ड्रोन हमले में ईरान के वरिष्ठ सैन्य कमांडर Qasem Soleimani को मार गिराया। इस घटना के बाद अमेरिका और ईरान के बीच तनाव बेहद बढ़ गया।  जवाब में ईरान ने इराक में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर मिसाइल हमले किए। सुलेमानी की हत्या को मध्य पूर्व की राजनीति और अमेरिका-ईरान संबंधों में एक बड़े मोड़ के रूप में देखा जाता है।

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21
जून 2025 को अमेरिका ने ईरान के प्रमुख परमाणु ठिकानों पर बड़े सैन्य हमले किए। राष्ट्रपति Donald Trump ने घोषणा की कि अमेरिकी सेना ने ईरान के Fordow, Natanz और Isfahan परमाणु स्थलों को निशाना बनाया। इन हमलों में B-2 स्टेल्थ बॉम्बर्स और टॉमहॉक मिसाइलों का इस्तेमाल किया गया।
हमलों के बाद मध्य पूर्व में तनाव बेहद बढ़ गया।

ईरान ने जवाबी कार्रवाई की चेतावनी दी, जबकि संयुक्त राष्ट्र और कई देशों ने स्थिति को शांत करने की अपील की। दूसरी ओर ईरान ने अमेरिका कोस्थायी परिणामभुगतने की चेतावनी दी।


यह पहली बार था जब अमेरिका ने सीधे ईरानी क्षेत्र पर हमला किया।


मार्च 2025 में Donald Trump ने ईरान के सर्वोच्च नेता Ayatollah Ali Khamenei को एक पत्र भेजकर नए परमाणु समझौते पर बातचीत का प्रस्ताव दिया हालाँकि खामेनेई ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया। उनका कहना था कि अमेरिका वास्तव में बातचीत नहीं, बल्कि ईरान पर अपनी शर्तें थोपना चाहता है।
इसके बावजूद अप्रत्यक्ष वार्ताएँ शुरू हुईं, वहीं तेहरान ने भी बातचीत को thik जताया, लेकिन यूरेनियम संवर्धन के अपने अधिकार पर अड़ा रहा, जो वार्ता में सबसे बड़ा विवादित मुद्दा बना रहा

 

Ali Khamenei की मृत्यु-



28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इज़राइल के संयुक्त अभियान “Operation Epic Fury” में तेहरान सहित कई शहरों में ईरान के सर्वोच्च नेता और सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया गया। इस हमले में ईरान के सर्वोच्च नेता Ali Khamenei, उनके परिवार के सदस्यों और कई अन्य वरिष्ठ नेताओं की मौत हो गई। इससे Iran और ज्यादा गुस्सा हो गया  

इसके जवाब में ईरान ने तेजी से पलटवार किया और इज़राइल तथा बहरीन, कुवैत, कतर और संयुक्त अरब अमीरात में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर मिसाइलें दागीं ईरान ने वैश्विक तेल व्यापार के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मार्ग स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ पर भी नियंत्रण कर लिया। जिससे पूरी दुनिया में तेल संकट (Oil Crisis) पैदा हो गया।


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United States और बाकी देश इसे खुलवाने के लिए लगातार कूटनीतिक बैठकों और बातचीत में लगे हुए हैं, लेकिन अब तक कोई खास सफलता हासिल नहीं हो पाई है।

 

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