जब एक false missile alarm की वजह से Soviet Union America पर Nuclear strike करने वाला था. वह घटना जिसने GPS की राह बनाई.

जब एक false missile alarm की वजह से Soviet Union America पर Nuclear strike करने वाला था. वह घटना जिसने GPS की राह बनाई.

एक गलत मिसाइल अलार्म ने दुनिया को परमाणु युद्ध के कगार पर पहुंचा दिया, 





कल्पना कीजिए कि आधी रात का समय है। दुनिया सो रही है। लाखों लोग अपने घरों में चैन की नींद ले रहे हैं। उन्हें इस बात का ज़रा भी अंदाज़ा नहीं है कि कुछ ही मिनटों में पूरी मानव सभ्यता का भविष्य तय होने वाला है।

यह कोई फिल्म की कहानी नहीं, बल्कि शीत युद्ध (COLD WAR) के सबसे खतरनाक पलों में से एक की सच्ची घटना है।

26 सितंबर 1983 की रात, सोवियत संघ (Soviet Union) के एक गुप्त सैन्य बंकर में बैठे एक अधिकारी के सामने कंप्यूटर स्क्रीन पर चमकती लाल चेतावनी ने दुनिया को परमाणु विनाश के बेहद करीब पहुंचा दिया था।



दुनिया की दो सबसे बड़ी परमाणु शक्तियाँ आमने-सामने खड़ी हों, और अचानक कंप्यूटर स्क्रीन पर संदेश दिखाई दे कि दुश्मन ने परमाणु मिसाइलें लॉन्च कर दी हैं। यदि उस समय एक गलत फैसला लिया जाता, तो शायद आज दुनिया वैसी नहीं होती जैसी हम जानते हैं।उस समय मौजूद एक शख्स नेअपनी सूझबूझ से उस समय दुनिया को परमाणु हमले से बच्चा लिया.



आईए जानते हैं उसे घटना के बारे में जब दुनिया परमाणु हमले (Nuclear strike) के एकदम करीब पहुंच गई थी.



बात है 26 सितंबर 1983 को हुई एक ऐसी ही घटना की जब एक तकनीकी गलती (TECHINICAL ERROR) ने दुनिया को परमाणु युद्ध के बेहद करीब पहुंचा दिया। यह शीत युद्ध (Cold War) के दौर की सबसे खतरनाक घटनाओं में से एक मानी जाती है।


शीत युद्ध का खतरनाक दौर-


1983 में दुनिया दो महाशक्तियों में बंटी हुई थी—United States और Soviet Union।









दोनों देशों के पास हजारों परमाणु हथियार थे। दोनों एक-दूसरे पर भरोसा नहीं करते थे। तनाव इतना अधिक था कि किसी भी गलतफहमी से विश्व युद्ध छिड़ सकता था।


यह घटना है शीत युद्ध के दौरान कीजब अमेरिका और सोवियत संघ (Soviet Union) जो आज का रूस के संबंध बहुत तनावपूर्ण थे दोनों के बीच कोल्ड वॉर (Cold War) चल रहा था. यह कोई हथियारों से होने वाला युद्ध नहीं था यह युद्ध सूचना और खुशियां जानकारी के आधार पर एक दूसरे के खिलाफ लड़ा जा रहा था 


और साथ हीयह एक विचारधारा की लड़ाई भी थी जिस जो मुख्य रूप से सोवियत संघ (Soviet Union)  और अमेरिका (America) बीच लड़ी जा रही थी जिसमें सीधे तौर पर कोई देश एक दूसरे पर किसी तरह के हथियारों से हमला नहीं कर रहा था जहां अमेरिका पूंजीवाद का समर्थक ता वही यूएसएसआर रूस साम्यवादी विचारधारा का समर्थन करता है जिससे कि कम्युनिस्ट कहा जाता है

इस दौरान यह घटना हुई लेकिन उसे दौरान वहां पर मौजूद उस व्यक्ति की समझदारी ने उस समय एक बड़े परमाणु हमले से इस दुनिया को बचा लियाआई समझते हैं उसे घटना को.

1983 में अमेरिका और सोवियत संघ (Soviet Union) के बीच संबंध बेहद खराब थे। दोनों देशों के पास हजारों परमाणु हथियार (nuclear weapon)मौजूद थे और दोनों एक-दूसरे पर लगातार नजर रख रहे थे। कि कहीं कोई देश एक दूसरे पर हमला न कर दे.


उस दौर की कुछ घटनाएं जिससे दोनों के बीच तनाव और अविश्वास बढ़ता ही जा रहा था. उस समयशीत युद्ध एक-एक बेहद नाजुक मोड़ पर था-



1. Korean Air Lines Flight 007 (KAL 007) नागरिक विमान ने नेविगेशन त्रुटि के कारण अपने निर्धारित मार्ग से भटक कर सोवियत संघ (Soviet Union) हवाई क्षेत्र में प्रवेश कर लिया। सोवियत लड़ाकू विमान ने KAL 007 को इंटरसेप्ट किया।और सोवियत सेना ने विमान को एक संभावित अमेरिकी जासूसी विमान समझ लिया. 

उस समय शीत युद्ध  (Cold War) अपने चरम पर था. चेतावनी देने के प्रयासों के बाद सोवियत पायलट ने मिसाइल दाग दी. विमान में सवार 269 लोगों की मृत्यु हो गई। United States ने इस कार्रवाई की कड़ी निंदा की. इस घटना ने अमेरिका-सोवियत संबंधों को और अधिक तनावपूर्ण बना दिया

 
Korean Air Lines Flight 007 (KAL 007) शीत युद्ध (Cold War) के दौरान हुई सबसे चर्चित विमानन घटनाओं में से एक थी।



GPS ki History






यही वह घटना थी जिसके बाद अमेरिका ने जीपीएस (GPS) सिस्टम जो उन्होंनेअपने रक्षा क्षेत्र के लिए बनाया था जिसका उपयोग वह अपनी फाइटर जेट्स और दूसरी चीजों में करता था उसको अमेरिका ने पूरी दुनिया के लिए नागरिक उपयोग के लिए उपलब्ध करवाया ताकि भविष्य में इस तरह की कोई गलती दोबारा ना हो.



2. अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन ने सोवियत संघ को खुलेआम 'दुष्ट साम्राज्य' (Evil Empire) घोषित कर दिया था

3. नाटो का सैन्य अभ्यास और सोवियत संघ का बढ़ता डर

1983 में दुनिया पहले ही तनाव के दौर से गुजर रही थी। इसी बीच अमेरिका और उसके सहयोगी देशों के सैन्य गठबंधन NATO ने "एबल आर्चर 83" नामक एक बड़े सैन्य अभ्यास की तैयारी शुरू की। यह अभ्यास परमाणु युद्ध की स्थिति में कमांड, संचार और सैन्य प्रतिक्रिया की प्रक्रियाओं का परीक्षण करने के लिए आयोजित किया जा रहा था।

लेकिन मॉस्को में बैठी सोवियत संघ (Soviet Union) नेतृत्व और KGB के अधिकारियों ने इसे साधारण सैन्य अभ्यास के रूप में नहीं देखा। उन्हें आशंका थी कि कहीं यह अभ्यास पश्चिमी देशों द्वारा सोवियत संघ पर वास्तविक परमाणु हमला शुरू करने की तैयारी तो नहीं है।

सोवियत खुफिया एजेंसियों ने कई रिपोर्टें तैयार कीं, जिनमें चेतावनी दी गई कि नाटो का यह अभ्यास असली युद्ध की शुरुआत भी हो सकता है। उस समय हालात इतने तनावपूर्ण थे कि सोवियत सेना ने अपने कुछ परमाणु बलों को उच्च सतर्कता (High Alert) पर भी रखा था.



यह घटना जिसका  हम जिक्र कर रहे हैं यह उसी समय की है जब United States और Soviet Union के बीच माहौल इतना तनावपूर्ण और अविश्वास का था.





26 सितंबर 1983 की रात सोवियत संघ (Soviet Union) के एक गुप्त सैन्य केंद्र में लेफ्टिनेंट कर्नल स्टैनिस्लाव पेट्रोव (Stanislav Petrov) ड्यूटी पर थे। उनका काम था सोवियत प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली की निगरानी करना। यदि अमेरिका परमाणु मिसाइल लॉन्च करता, तो सबसे पहले इसकी जानकारी इसी प्रणाली से मिलती।


रात सामान्य थी। कमरे में मशीनों की धीमी आवाज़ गूंज रही थी।ऑपरेटर अपनी स्क्रीन पर नजर रखे हुए थे। तभी अचानक एक तेज़ अलार्म बज उठा।मिसाइल लॉन्च हो चुकी है!कमरे में सन्नाटा छा गया। कंप्यूटर स्क्रीन पर लाल रंग में चेतावनी चमक रही थी।
सिस्टम के अनुसार अमेरिका ने सोवियत संघ (Soviet Union)  पर एक अंतरमहाद्वीपीय परमाणु मिसाइल लॉन्च कर दी थी।


कुछ सेकंड के लिए सभी की सांसें थम गईं।


प्रोटोकॉल स्पष्ट था।

यदि हमला वास्तविक होता, तो इसकी सूचना तुरंत सोवियत नेतृत्व तक पहुंचाई जाती। उसके बाद जवाबी परमाणु हमला शुरू हो सकता था।

लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।

कुछ क्षण बाद स्क्रीन फिर चमकी।

अब सिस्टम बता रहा था कि केवल एक नहीं, बल्कि कई मिसाइलें लॉन्च की गई हैं।

अलार्म लगातार बज रहा था।

कंप्यूटर का निष्कर्ष साफ था—

अमेरिका ने हमला शुरू कर दिया है।



1983 में परमाणु युद्ध कैसे टला ?



सोवियत उपग्रह प्रणाली को उस समय अत्याधुनिक माना जाता था। इसलिए जब कंप्यूटर ने हमले की चेतावनी दी, तो कई अधिकारियों को लगा कि यह सही है।


ऐसी स्थिति में अधिकांश अधिकारी कंप्यूटर की रिपोर्ट पर भरोसा कर लेते। लेकिन पेट्रोव ने कुछ अलग देखा।

उन्होंने खुद से एक सवाल पूछा।अगर अमेरिका वास्तव में परमाणु युद्ध शुरू करना चाहता है, तो क्या वह सिर्फ कुछ मिसाइलें दागेगा?

उन्हें यह तर्क समझ नहीं आ रहा था।एक पूर्ण परमाणु हमला आमतौर पर सैकड़ों मिसाइलों के साथ शुरू होता। यहां सिस्टम केवल कुछ मिसाइलों की बात कर रहा था।

यदि अमेरिका वाकई में सोवियत संघ (Soviet Union) जैसे विशाल देश पर हमला शुरू करता, तो वह केवल 5 मिसाइलें नहीं भेजता। शीत युद्ध की रणनीति 'मैड' (MAD - Mutually Assured Destruction) पर आधारित थी, जिसके तहत पहला हमला इतना बड़ा होना चाहिए कि दुश्मन दोबारा उठ न सके। 5 मिसाइलें भेजना सैन्य रूप से अतार्किक था।


उन्होंने सोचा कि यदि अमेरिका वास्तव में परमाणु युद्ध शुरू करना चाहता, तो वह केवल कुछ मिसाइलें नहीं भेजता। वह एक साथ सैकड़ों मिसाइलें दागता ताकि सोवियत संघ (Soviet Union) को जवाब देने का मौका न मिले।

पेट्रोव (Stanislav Petrov) के सामने एक असंभव विकल्प था।

क्या वह कंप्यूटर पर भरोसा करें? या अपनी समझ पर?

गलत फैसला पूरी दुनिया के लिए विनाशकारी साबित हो सकता था।
यदि पेट्रोव चेतावनी को वास्तविक हमला घोषित कर देते, तो यह जानकारी सोवियत सैन्य नेतृत्व तक पहुंचती।

उस समय की सैन्य रणनीति के अनुसार, जवाबी परमाणु हमला शुरू करने पर विचार किया जा सकता था।

कमांड सेंटर में तनाव बढ़ता जा रहा था।

हर सेकंड महत्वपूर्ण था।

दुनिया ऐसी स्थिति में पहुंच सकती थी जहां एक गलत चेतावनी लाखों नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की मौत का कारण बन जाती।

लेकिन पेट्रोव ने निर्णय लिया। उन्होंने रिपोर्ट भेजी कि यह संभवतः फॉल्स अलार्म (False Missile Alarm) है।


यह उनका व्यक्तिगत आकलन था।


और अब सबको इंतजार था।

मिनट बीतते गए।

लेकिन कोई मिसाइल नहीं आई।

कोई हमला नहीं हुआ।

धीरे-धीरे स्पष्ट हो गया कि कंप्यूटर गलत था।

यह निर्णय आसान नहीं था। यदि वे गलत साबित होते, तो सोवियत संघ पर वास्तविक हमला हो सकता था

पेट्रोव जानते थे कि सोवियत संघ का यह नया सैटेलाइट रडार सिस्टम अभी पूरी तरह से आजमाया हुआ नहीं था और इसमें तकनीकी खामियां हो सकती थीं।

बाद की जांच में पता चला कि सोवियत उपग्रह प्रणाली ने सूर्य के प्रकाश के प्रतिबिंब को गलती से मिसाइल लॉन्च समझ लिया था।दूसरे शब्दों में, प्रकृति की एक साधारण प्रकाशीय घटना को कंप्यूटर ने परमाणु हमले के रूप में पहचान लिया।


तकनीकी त्रुटि ने पूरी चेतावनी प्रणाली को भ्रमित कर दिया था। एक मशीन ने दुनिया को युद्ध की ओर धकेलने की कोशिश की थी। और एक इंसान ने उसे रोक दिया।



इतिहासकार अक्सर इस सवाल पर चर्चा करते हैं—


अगर उस रात पेट्रोव ने कंप्यूटर पर भरोसा किया होता तो क्या होता?






इसका निश्चित उत्तर किसी के पास नहीं है।लेकिन यह स्पष्ट है कि सोवियत नेतृत्व को परमाणु हमले की चेतावनी मिलती।तनाव पहले से चरम पर था। गलत आकलन की संभावना बहुत अधिक थी। यही कारण है कि कई विशेषज्ञ इस घटना को शीत युद्ध के सबसे खतरनाक क्षणों में गिनते हैं।



दिलचस्प बात यह है कि  घटना कई वर्षों तक गोपनीय रही। 1983 की घटना का खुलासा लगभग 15 साल बाद, 1998 में हुआ।


सोवियत अधिकारियों के लिए यह स्वीकार करना आसान नहीं था कि उनकी अत्याधुनिक चेतावनी प्रणाली इतनी बड़ी गलती कर सकती थी। दुनिया को इस घटना के बारे में काफी समय बाद पता चला।

जब सच्चाई सामने आई, तब लोगों ने महसूस किया कि उस रात एक व्यक्ति के निर्णय ने शायद मानव इतिहास की दिशा बदल दी थी।



यह तकनीकी त्रुटि इतनी गंभीर थी कि उसने पूरी दुनिया को संकट में डाल दिया। कल्पना कीजिए कि पेट्रोव ने अलार्म को सही मान लिया होता।

सोवियत नेतृत्व को सूचना मिलती कि अमेरिका ने परमाणु हमला शुरू कर दिया है। उस समय दोनों देशों की सैन्य रणनीति ऐसी थी कि जवाबी हमला करने के लिए बहुत कम समय मिलता था।

संभव है कि सोवियत संघ अमेरिका पर परमाणु मिसाइलें दाग देता।

इसके जवाब में अमेरिका भी अपनी मिसाइलें लॉन्च करता।

कुछ ही घंटों में करोड़ों लोग मारे जा सकते थे और मानव इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदी शुरू हो सकती थी।

दुनिया को बचाने वाला व्यक्ति

स्टैनिस्लाव पेट्रोव ने उस रात केवल शांत दिमाग से स्थिति का आकलन किया और कंप्यूटर के बजाय अपनी समझ पर भरोसा किया। इसी कारण उन्हें बाद में दुनिया भर में सम्मान मिला और कई लोगों ने उन्हें "वह व्यक्ति जिसने दुनिया को परमाणु युद्ध से बचाया" कहा।



1995 में फिर हुआ ऐसा खतरा ?


यह पहली और आखिरी बार नहीं था जब परमाणु युद्ध का खतरा गलतफहमी की वजह से पैदा हुआ।

1995 में रूस ने एक नॉर्वेजियन वैज्ञानिक रॉकेट को संभावित अमेरिकी परमाणु मिसाइल समझ लिया था। स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि रूस का परमाणु ब्रीफकेस सक्रिय कर दिया गया।

हालांकि कुछ ही मिनटों में पता चल गया कि यह कोई हमला नहीं था और संकट टल गया।

26 सितंबर 1983 की रात इतिहास के उन दुर्लभ क्षणों में से एक थी जब पूरी मानव सभ्यता का भविष्य कुछ मिनटों के फैसले पर निर्भर था। एक गलत कंप्यूटर सिग्नल ने दुनिया को परमाणु युद्ध के कगार पर पहुंचा दिया था, लेकिन स्टैनिस्लाव पेट्रोव की सूझबूझ और शांत सोच ने संभावित तबाही को टाल दिया।





19 मई 2017 को 77 वर्ष की आयु में  स्टैनिस्लाव पेट्रोव का निधन हुआ।


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