कैसे भारत India ने इटली Italy को झुकने पर मजबूर किया ? Italy Marine Case.

कैसे भारत India ने इटली Italy को झुकने पर मजबूर किया ? Italy Marine Case.भारत-इटली के सबसे बड़े कूटनीतिक विवाद की पूरी कहानी.






इस ब्लॉग में हम जानेंगे कि हाल ही में एक तेल टैंकर पर अमेरिकी कार्रवाई में तीन भारतीय नागरिकों की मौत के बाद भारत सरकार द्वारा अमेरिका का नाम लिए बिना जारी की गई प्रतिक्रिया ने किस प्रकार नई बहस को जन्म दिया। इस घटना के बाद कई लोगों ने वर्तमान सरकार और UPA सरकार की विदेश नीति की तुलना करनी शुरू कर दी है।




आलोचकों और सोशल मीडिया पर चर्चा करने वाले कुछ लोगों का सवाल है कि जब अमेरिकी कार्रवाई में भारतीय नागरिकों की मौत हुई, तब भी वर्तमान सरकार आधिकारिक बयानों में अमेरिका का नाम लेने से बचती हुई क्यों दिखाई दी।

पिछले ब्लॉग में हमने देवयानी खोबरागड़े प्रकरण का विस्तार से विश्लेषण किया था। अब इस ब्लॉग में हम उस घटना को समझेंगे, जिसमें इटली के दो मरीन ने भारतीय मछुआरों की गोली मारकर हत्या कर दी थी। इस घटना ने भारत और इटली के संबंधों में अभूतपूर्व तनाव पैदा कर दिया। मामला इतना बढ़ गया कि अंततः इटली सरकार को भारत के समक्ष झुकना पड़ा और अपने पहले के रुख से पीछे हटना पड़ा।


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Devyani Khobragade Case देवयानी खोबरागड़े जब भारत और अमेरिका आमने-सामने आ गए, When India teach a lesson to America


हाल ही में अमेरिका और ईरान के बीच starit of hormuz में बढ़ते तनाव के कारण 11 जून 2026 में हुई एक घटना ने भारत में गहरी चिंता पैदा कर दी.




रिपोर्टों के अनुसार, 11 जून 2026 में ओमान के निकट समुद्री क्षेत्र में एक तेल टैंकर पर हुई अमेरिकी सैन्य कार्रवाई में 3 भारतीय जहाज़ कर्मचारी की मौत हो गई। बताया गया कि टैंकर पर कुल 24 भारतीय नाविक मौजूद थे। इनमें से 21 लोगों कोओमान की मदद से सुरक्षित निकाल लिया गया.





अमेरिका का दावा था कि यह जहाज प्रतिबंधों के उल्लंघन कर रहा था और सुरक्षा संबंधी निर्देशों का पालन नहीं कर रहा था। अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, जहाज को कई बार चेतावनी दी गई थी और सुरक्षा संबंधी निर्देशों का पालन करने के लिए कहा गया था।

कंपनी का कहना था कि उसे या जहाज के चालक दल को अमेरिकी पक्ष की ओर से किसी प्रकार की पूर्व चेतावनी प्राप्त नहीं हुई थी




इसके बाद यूपीए सरकार के कार्यकाल की दो घटनाएँ लोगों के बीच चर्चा का विषय बन गई हैं। पहली घटना 15 फ़रवरी 2012 को इटली के दो मरीन द्वारा भारत के दो मछुआरों की हत्या से जुड़ी थी, जबकि दूसरी घटना दिसंबर 2013 के देवयानी खोबरागड़े साथ अमेरिका में हुए व्यवहार से जुड़ी है.




इन दोनों मामलों में उस समय की सरकार ने क्रमशः इटली और अमेरिका के खिलाफ आधिकारिक स्तर पर कड़ा विरोध दर्ज कराया तथा उनकी कार्रवाई की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर निंदा की थी।





भारत सरकार की प्रतिक्रिया



घटना के बाद भारत सरकार ने गहरी संवेदना व्यक्त की और प्रभावित परिवारों से संपर्क स्थापित किया। विदेश मंत्रालय ने संबंधित देशों से विस्तृत जानकारी मांगी तथा भारतीय नागरिकों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देने की बात कही।

नई दिल्ली ने घटना पर चिंता और शोक व्यक्त किया, परंतु आधिकारिक बयान में अमेरिका का नाम लेने से परहेज किया।




दिलचस्प बात यह है कि यह पहली बार नहीं था जब भारत ने अमेरिकी कार्रवाई की आलोचना करते हुए भी आधिकारिक बयान में अमेरिका का नाम लेने से परहेज किया.



इससे पहले मार्च 2026 में, जब ईरानी नौसेना का युद्धपोत IRIS Dena हिंद महासागर में अमेरिकी हमले का शिकार हुआ था, तब भी भारत ने अपने आधिकारिक बयानों में अमेरिका का नाम सीधे तौर पर नहीं लिया था।

इस घटना का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि IRIS Dena भारत में आयोजित International Fleet Review 2026 और MILAN 2026 मैत्रीपूर्ण नौसैनिक अभ्यास में भाग लेने के बाद ईरान लौट रहा था.

हमले के समय ईरानी नौसेना के युद्धपोत IRIS Dena पर कुल 136 नौसैनिक सवार थे। रिपोर्टों के अनुसार, इस हमले में 104 नौसैनिकों की मौत हो गई, जबकि 32 लोगों को जीवित बचाया जा सका। सबसे दुखद तथ्य यह रहा कि मृतकों में से 20 नौसैनिकों के शव भी बरामद नहीं किए जा सके.







भारत सरकार के हालिया प्रेस नोट के बाद वर्ष 2012 में इटली के दो मरीन द्वारा भारतीय मछुआरों की हत्या तथा दिसंबर 2013 के देवयानी खोबरागड़े प्रकरण की एक बार फिर चर्चा शुरू हो गई है। सोशल मीडिया पर कई लोग इन दोनों घटनाओं को याद कर रहे हैं और इन मामलों में भारत द्वारा वैश्विक स्तर पर अपनाई गई कूटनीतिक प्रतिक्रिया की तुलना कर रहे हैं।






ये दोनों घटनाएँ घटना उस समय की है जब केंद्र में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (UPA) की सरकार सत्ता में थी और डॉ. मनमोहन सिंह भारत के प्रधानमंत्री थे.


पिछले ब्लॉग में हमने देवयानी खोबरागड़े प्रकरण का विस्तार से विश्लेषण किया था। अब इस ब्लॉग में हम उस घटना को समझेंगे, जिसमें इटली के दो मरीन ने भारतीय मछुआरों की गोली मारकर हत्या कर दी थी। इस घटना ने भारत और इटली के संबंधों में अभूतपूर्व तनाव पैदा कर दिया। मामला इतना बढ़ गया कि अंततः इटली सरकार को भारत के समक्ष झुकना पड़ा और अपने पहले के रुख से पीछे हटना पड़ा।






2008 से 2012 के बीच सोमालिया के आसपास और अरब सागर में समुद्री डकैती (Piracy) की घटनाएँ तेजी से बढ़ रही थीं। समुद्री डाकू व्यापारिक जहाजों का अपहरण कर फिरौती मांगते थे। इस खतरे से बचने के लिए कई देशों ने अपने व्यापारिक जहाजों पर सशस्त्र सैनिक तैनात करना शुरू कर दिया।


इसी कारण इटली के तेल टैंकर Enrica Lexie पर भी इतालवी नौसेना (Italian Navy) के छह मरीन तैनात थे। उनका कार्य जहाज को समुद्री डाकुओं से सुरक्षा प्रदान करना था।



घटना कब और कहाँ हुई?


15 फरवरी 2012 ko केरल तट से लगभग 20.5 समुद्री मील (Nautical Miles) दूर भारतीय मछली पकड़ने वाली नाव सेंट एंटनी (St. Antony) समुद्र में मछली पकड़कर वापस लौट रही थी।

नाव में कुल 11 भारतीय मछुआरे सवार थे।उसी समय इतालवी तेल टैंकर Enrica Lexie उसी समुद्री मार्ग से गुजर रहा था।



टैंकर पर इतालवी नौसेना (Italian Navy) के छह मरीन तैनात थे। इनमें से दो मरीन Massimiliano Latorre, Salvatore Girone, इन दोनों ने भारतीय नाव को देखा।

इसके बाद दोनों मरीन ने नाव पर गोलीबारी कर दी। इस गोलीबारी में नाव पर सवार 11 लोगों में से दो भारतीय मछुआरों की मृत्यु हो गई.
 

यह स्थान भारत की विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र (Exclusive Economic Zone - EEZ) और Contiguous Zone में था, लेकिन भारत की 12 समुद्री मील की क्षेत्रीय सीमा (Territorial Waters) के बाहर था। बाद में यही बात पूरे विवाद का सबसे बड़ा कानूनी मुद्दा बनी।



इटली का दावा

 


भारतीय नाव समुद्री डाकुओं की नाव जैसी दिखाई दे रही थी।
मछुआरों की नाव तेज़ी से टैंकर की ओर बढ़ रही थी।
पहले चेतावनी (Warning) दी गई।
चेतावनी के बावजूद नाव नहीं रुकी।
इसलिए आत्मरक्षा (Self Defence) में गोली चलाई





भारत का दावा



वे सामान्य मछुआरे थे।
उनके पास कोई हथियार नहीं था।
उन्हें कोई चेतावनी नहीं दी गई।
अचानक जहाज से गोलियाँ चलाई गईं।



भारत की कार्रवाई

 

घटना की सूचना मिलने के बाद भारतीय तटरक्षक बल (Indian Coast Guard) ने Enrica Lexie से संपर्क किया।

जहाज को कोच्चि (Kochi) बंदरगाह आने का निर्देश दिया गया। 17 फरवरी 2012 को जहाज को कोच्चि लाया गया। दोनों इतालवी मरीन को गिरफ्तार कर लिया गया।

उन पर आरोप लगाए गए
हत्या (Murder)
आपराधिक षड्यंत्र
अवैध रूप से हथियारों का प्रयोग



इटली का पक्ष


इटली ने गिरफ्तारी का कड़ा विरोध किया।


उसने चार प्रमुख तर्क दिए—

1. इटली ने कहा कि घटना भारत की क्षेत्रीय सीमा के बाहर अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में हुई

हुई थी।

2. इटली ने कहा कि मरीन नौसेना के सैनिक थे

3 इटली ने कहा कि सरकारी सैनिकों पर विदेशी अदालत मुकदमा नहीं चला सकती क्योंकि वे अपने आधिकारिक कर्तव्य निभा रहे थे।

4. इटली ने कहा कि Enrica Lexie जहाज इटली का था इसलिए उस पर हुई घटना का मुकदमा इटली में चलना चाहिए।




भारत ने कहा


 

मारे गए दोनों व्यक्ति भारतीय नागरिक थे।
भारतीय मछली पकड़ने वाली नाव पर हमला हुआ।
घटना भारत के विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र (Exclusive Economic Zone - EEZ) में हुई।
इसलिए भारत को जांच और मुकदमा चलाने का पूरा अधिकार है।


भारत ने यह भी कहा कि निर्दोष नागरिकों की हत्या को केवल "सरकारी ड्यूटी" कहकर माफ़ नहीं किया जा सकता।




शुरुआत में मामला केरल हाई कोर्ट में चला।

इटली ने कहा कि भारतीय अदालतों का अधिकार क्षेत्र नहीं है। लेकिन अदालत ने यह तर्क स्वीकार नहीं किया।

2013 में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने कहा केरल सरकार इस मामले की सुनवाई नहीं कर सकती। क्योंकि घटना राज्य की समुद्री सीमा के बाहर हुई थी। लेकिन भारत सरकार (केंद्र) विशेष अदालत बनाकर मुकदमा चला सकती है।



यह मामला धीरे-धीरे भारत और इटली के बीच बड़ा कूटनीतिक विवाद बन गया।





इटली ने कई बार भारत से दोनों मरीन को रिहा करने की मांग की।
इटली के प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री ने कई बार भारत सरकार से बातचीत की।
मामला यूरोपीय संघ (European Union) तक पहुँच गया।
यूरोपीय संघ ने भी इटली के पक्ष का समर्थन करते हुए भारत से अंतरराष्ट्रीय कानून का पालन करने की अपील की।

लेकिन भारत ने स्पष्ट कहा कि जब तक जांच और मुकदमा पूरा नहीं होगा, दोनों मरीन भारत में ही रहेंगे।








इसी दौरान इटली में आम चुनाव होने वाले थे।

दोनों मरीन ने भारत के सर्वोच्च न्यायालय से अनुरोध किया कि उन्हें अपने देश जाकर मतदान करने की अनुमति दी जाए।

इटली के राजदूत (Italian Ambassador) ने भारत के सर्वोच्च न्यायालय को लिखित आश्वासन दिया कि—


दोनों मरीन चार सप्ताह के भीतर वापस भारत लौट आएँगे। इस आश्वासन के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें चार सप्ताह के लिए इटली जाने की अनुमति दे दी।



जब दोनों मरीन इटली पहुँच गए, तब 11 मार्च 2013 को इटली सरकार ने अचानक घोषणा की कि दोनों मरीन भारत वापस नहीं भेजे जाएँगे।क्योंकि भारत को उन पर मुकदमा चलाने का अधिकार नहीं है। मामला अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार इटली में ही चलेगा।


इस घोषणा से भारत में भारी राजनीतिक और जनाक्रोश फैल गया।

भारत सरकार ने इसे सर्वोच्च न्यायालय के साथ किए गए वादे का उल्लंघन माना।


भारत का कहना था कि सर्वोच्च न्यायालय ने दोनों इतालवी मरीन को केवल मानवीय आधार पर इटली में होने वाले आम चुनाव में मतदान करने और लंबे समय से अपने परिवार से मिलने का अवसर देने के लिए अस्थायी रूप से अपने देश जाने की अनुमति दी थी।

यह अनुमति इटली के राजदूत द्वारा भारत के सर्वोच्च न्यायालय को दिए गए लिखित आश्वासन के आधार पर प्रदान की गई थी कि दोनों मरीन निर्धारित समय के भीतर भारत लौट आएँगे। 

लेकिन इटली पहुँचने के बाद उनके वापस न आने के निर्णय को भारत ने मानवीय आधार पर किए गए विश्वास का दुरुपयोग तथा भारत के सर्वोच्च न्यायालय को दिए गए वचन का उल्लंघन माना।



इससे दोनों देशों के संबंधों में भारी तनाव उत्पन्न हुआ।





भारत की कड़ी प्रतिक्रिया


भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने इसे अत्यंत गंभीर मामला माना। उस समय भारत में इटली के राजदूत Daniele Mancini थे।
सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि जब तक दोनों मरीन वापस नहीं आते तब तक इतालवी राजदूत भारत छोड़कर नहीं जा सकते।


लेकिन भारत के लिए यह स्थिति बेहद निराशाजनक थी। इटली के राजदूत द्वारा सर्वोच्च न्यायालय को दिया गया आश्वासन टूट चुका था, लेकिन इसके बावजूद भारत उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई नहीं कर सकता था, क्योंकि उन्हें Diplomatic Immunity प्राप्त थी।

अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार किसी मान्यता प्राप्त राजदूत को मेजबान देश में गिरफ्तारी या आपराधिक मुकदमे से व्यापक कानूनी संरक्षण प्राप्त होता है।

इस विशेषाधिकार के कारण भारत उन्हें गिरफ्तार या अभियोजन का सामना करने के लिए बाध्य नहीं कर सकता था।





भारत के लिए यह स्थिति अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठा और संप्रभुता से जुड़ा गंभीर मुद्दा बन गई। इटली के इस रुख को भारत ने अपने न्यायिक तंत्र और सर्वोच्च न्यायालय के प्रति विश्वासघात के रूप में देखा, जिससे देश की अंतरराष्ट्रीय छवि और सम्मान पर भी प्रश्न खड़े होने लगे।



भारत सरकार की चेतावनी


इसके बाद भारत सरकार ने इटली को स्पष्ट शब्दों में चेतावनी दी कि यदि इटली अपने वचन से पीछे हटता है और दोनों इतालवी मरीन भारत वापस नहीं लौटे और भारतीय न्यायालय के समक्ष उपस्थित नहीं हुए, तो भारत इटली के साथ अपने राजनयिक संबंध समाप्त करने जैसे कठोर कदम उठाने पर भी विचार करेगा।

भारत ने यह भी कहा कि किसी विदेशी सरकार द्वारा सर्वोच्च न्यायालय को दिए गए आश्वासन का उल्लंघन स्वीकार नहीं किया जा सकता।



भारत की कड़ी प्रतिक्रिया के बाद यूरोपीय संघ ने स्थिति पर चिंता व्यक्त की।इटली की संसद में भी इस मुद्दे पर तीखी बहस हुई। इटली सरकार पर यह दबाव बढ़ने लगा कि यदि उसने अपना वादा नहीं निभाया, तो उसकी अंतरराष्ट्रीय विश्वसनीयता को नुकसान होगा।

लगभग एक सप्ताह बाद, 21 मार्च 2013 को इटली सरकार ने अपना निर्णय बदल दिया।

 इटली ने  घोषणा की कि अंतरराष्ट्रीय कानून का सम्मान करते हुए, दोनों मरीन भारत वापस भेजे जाएँगे। इटली ने यह भी कहा कि वह भारत के साथ टकराव नहीं बढ़ाना चाहता।


बाद में अंतरराष्ट्रीय दबाव और भारत के सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के बाद उन्हें 22 मार्च 2013 को  वापस भारत भेजा गया।



इसके बाद उनके विरुद्ध भारतीय अदालतों में मुकदमा फिर से शुरू हुआ.







2021 में समझौता


अंततः इटली ने इस मामले के समाधान के तहत कुल ₹10 करोड़ का मुआवजा देने पर सहमति व्यक्त की। इस समझौते के अनुसार यह राशि दोनों मृत भारतीय मछुआरों के परिवारों, घटना में घायल हुए मछुआरों तथा क्षतिग्रस्त हुई St. Antony नाव के मालिक को क्षतिपूर्ति (Compensation) के रूप में प्रदान की गई। इस मुआवजे का उद्देश्य घटना से प्रभावित लोगों को आर्थिक राहत देना था, जबकि दोनों देशों के बीच लंबे समय से चले आ रहे इस विवाद को भी समाप्त करने का मार्ग प्रशस्त हुआ।


इसके बाद 15 जून 2021 को भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने सभी आपराधिक कार्यवाही समाप्त  कर दी।





इटली में क्या हुआ?


भारत में कानूनी प्रक्रिया समाप्त होने के बाद इटली में भी दोनों इतालवी मरीन के खिलाफ चल रहा मामला बंद कर दिया गया। वर्ष 2022 में इटली की एक अदालत ने उनके विरुद्ध आपराधिक कार्यवाही समाप्त करते हुए कहा कि घटना के समय दोनों मरीन को यह विश्वास था कि वे समुद्री डाकुओं का सामना कर रहे थे, इसलिए उनके विरुद्ध आपराधिक मुकदमा आगे चलाने का आधार नहीं बनता।






दुनिया के लिए भारत का बड़ा संदेश-


यह घटना दिखाती है कि जब भारत अपने राष्ट्रीय हितों, न्यायिक संप्रभुता और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी दृढ़ता से अपनी बात रख सकता है।


इस मामले में तत्कालीन यूपीए (UPA) सरकार ने कड़ा रुख अपनाने का साहस दिखाया और भारतीय न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र तथा राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए इटली पर लगातार कूटनीतिक दबाव बनाए रखा।


हाल ही में अमेरिका द्वारा किए गए हमले में तीन भारतीय नाविकों की मृत्यु के मामले में भी भारत को इसी प्रकार का दृढ़ और स्पष्ट कूटनीतिक रुख अपनाना चाहिए था। यद्यपि भारत सरकार ने अमेरिका के समक्ष औपचारिक और कड़ा विरोध दर्ज कराया, फिर भी ऐसे मामलों में, जहाँ भारतीय नागरिकों की जान जाती है, भारत को बिना किसी भेदभाव के अपने नागरिकों के अधिकारों, सुरक्षा और सम्मान की रक्षा के लिए और अधिक प्रभावी तथा दृढ़ कूटनीतिक प्रयास करने चाहिए।

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