India's Ethanol Mystery. E20 Fuel Controversy: Nitin Gadkari पर क्यों उठ रहे सवाल ?

India’s Ethanol Mystery? E20 Fuel Controversy. Nitin Gadkari पर क्यों उठ रहे सवाल ?








आज हम इस ब्लॉग में समझेंगे कि Ethanol Blending क्या है और भारत India में इससे जुड़ी क्या-क्या controversies सामने आई हैं। नितिन गडकरी Nitin Gadkari और एथेनॉल ब्लेंडिंग कंपनियों से क्या संबंध है?



एथिनॉल क्या है?  (what is ethanol)


एथिनॉल (Ethanol) एक रंगहीन, साफ और अत्यधिक ज्वलनशील रासायनिक यौगिक (Chemical Compound) है, जिसका रासायनिक सूत्र C₂H₅OH है। इसे आमतौर पर एथिल अल्कोहल (Ethyl Alcohol) या ग्रेन अल्कोहल भी कहा जाता है।


एथेनॉल एक नवीकरणीय (Renewable) और अत्यधिक ज्वलनशील ईंधन है। क्योंकि यह जैविक स्रोतों (Biomass)—जैसे गन्ना, मक्का, टूटे चावल, शीरा (Molasses) आदि—से बनाया जाता है। यही वजह है कि इसे बायोफ्यूल (Biofuel) की श्रेणी में रखा जाता है।

कार्बन उत्सर्जन कम करने और जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता घटाने के लिए भारत सहित अमेरिका, ब्राज़ील और कई अन्य देशों में इसे पेट्रोल के साथ निश्चित अनुपात में मिलाकर इस्तेमाल किया जाता है।




एथेनॉल कैसे बनाया जाता है? (How Ethanol is Produced)-



एथेनॉल (Ethanol) मुख्य रूप से शर्करा युक्त फसलों (Sugar Crops) और स्टार्च युक्त फसलों (Starch Crops) से बनाया जाता है। इसके प्रमुख स्रोतों में गन्ना (Sugarcane), चुकंदर (Sugar Beet), मक्का (Maize/Corn), चावल, गेहूं, जौ और आलू शामिल हैं।


हालांकि, दुनिया के अधिकांश देशों में व्यावसायिक स्तर पर एथेनॉल उत्पादन के लिए मुख्य रूप से गन्ना, मक्का, चावल और गेहूं का ही उपयोग किया जाता है। अलग-अलग देशों में इन फसलों का चयन उनकी उपलब्धता, जलवायु और कृषि नीति पर निर्भर करता है। उदाहरण के लिए, ब्राज़ील में गन्ने से, जबकि अमेरिका में मुख्य रूप से मक्का से एथेनॉल बनाया जाता है।

भारत में एथेनॉल मुख्य रूप से गन्ने और चावल से बनाया जाता है, लेकिन अब मक्का (Maize) का योगदान भी तेजी से बढ़ रहा है।

एथेनॉल बनाने की प्रक्रिया में शर्करा युक्त फसलों का रस (Juice) या शीरा (Molasses) तथा स्टार्च युक्त फसलों के स्टार्च को पहले शर्करा (Sugar) में परिवर्तित किया जाता है। इसके बाद यीस्ट (Yeast) की मदद से इस शर्करा का किण्वन (Fermentation) किया जाता है, जिससे एथेनॉल बनता है। अंत में आसवन (Distillation) और शुद्धिकरण (Purification) की प्रक्रिया के बाद उपयोग योग्य एथेनॉल प्राप्त होता है।



यीस्ट Yeast शर्करा को एथिनॉल ethanol और कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) में तोड़ देता है fermentation किण्वन के बाद मिले तरल में केवल 10-15% एथिनॉल होता है। इसे 'डिस्टिलेशन' प्रक्रिया (उबालकर भाप बनाना और फिर ठंडा करना) द्वारा 95% शुद्ध एथिनॉल में बदला जाता है।

पेट्रोल में मिलाने (Biofuel) के लिए 99.% शुद्ध एथिनॉल चाहिए होता है। इसके लिए बचे हुए 5% पानी को विशेष मॉलिक्यूलर छलनियों (Molecular Sieves) से गुजारकर सोख लिया जाता है। इसे एनहाइड्रस एथिनॉल (Anhydrous Ethanol) कहते हैं। यह प्रक्रिया कुछ घंटों से लेकर 2–3 दिन तक चलती है

ईंधन (Biofuel) के रूप में इस्तेमाल होने वाला अधिकांश एथिनॉल इसी प्राकृतिक विधि से बनता है




पेट्रोल Petrol में एथेनॉल क्यों मिलाया जाता है? (why it is blended in petrol)



चूंकि एथेनॉल Ethanol एक ज्वलनशील (Flammable) तरल ईंधन है और आसानी से आग पकड़ लेता है और इसे जैविक स्रोतों (Biomass) से बनाया जाता है, इसलिए कई देशों की सरकारों ने इसे पेट्रोल के साथ मिलाकर उपयोग करने की नीति अपनाई।

 इसका उद्देश्य कच्चे तेल (Crude Oil) के आयात पर निर्भरता कम करना, ऊर्जा सुरक्षा (Energy Security) को मजबूत बनाना और दूसरे देशों पर ईंधन के लिए निर्भरता घटाना है। इसके साथ ही, एथेनॉल मिश्रण से जीवाश्म ईंधनों की खपत और ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने में भी मदद मिलती है।

देशों ने ऊर्जा सुरक्षा बढ़ाने और प्रदूषण कम करने के उद्देश्य से एथेनॉल मिश्रित ईंधन को अपनाया।




दुनिया में सबसे पहले एथेनॉल ब्लेंडिंग (Ethanol Blending) की शुरुआत कब हुई?







दुनिया में सबसे पहले बड़े पैमाने पर (व्यावसायिक और अनिवार्य) एथिनॉल ब्लेंडिंग की शुरुआत ब्राजील (Brazil) में हुई थी

साल 1973 के वैश्विक तेल संकट (Oil Crisis) के बाद ब्राजील (Brazil) ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए 1975 में 'Proálcool' (राष्ट्रीय अल्कोहल कार्यक्रम) लॉन्च किया। इसके बाद 1976 में ब्राजील (Brazil) सरकार ने पेट्रोल में एथिनॉल मिलाना पूरी तरह अनिवार्य (Mandatory) कर दिया.





 इस कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए ब्राज़ील ने केवल एथेनॉल उत्पादन ही नहीं बढ़ाया, बल्कि इसके लिए व्यापक योजना (Proper Planning) और मजबूत बुनियादी ढांचा (Infrastructure) भी विकसित किया। देशभर में पेट्रोल (Gasoline) और एथेनॉल मिश्रित ईंधन (Ethanol Blended Fuel) की अलग-अलग आपूर्ति व्यवस्था बनाई गई, ताकि उपभोक्ता अपनी आवश्यकता और पसंद के अनुसार ईंधन चुन सकें।


 इसके अलावा, सरकार ने दोनों ईंधनों की अलग-अलग कीमतें (Pricing) तय कीं। जब एथेनॉल मिश्रित ईंधन की कीमत अपेक्षाकृत कम रखी गई, तो लोगों ने इसका अधिक उपयोग करना शुरू किया, जिससे एथेनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम को तेजी से बढ़ावा मिला।

अमेरिका (USA) में भी 1920 और 1930 के दशक में छोटे स्तर पर एथिनॉल मिलाया गया था, लेकिन आधिकारिक तौर पर सरकार ने 1978 के एनर्जी टैक्स एक्ट के तहत 10% एथिनॉल ब्लेंडिंग (जिसे 'Gasohol' कहा गया) को बढ़ावा देना शुरू किया.





भारत में एथेनॉल ब्लेंडिंग की शुरुआत कब हुई? When India started Ethanol blending 






अक्सर लोगों को लगता है कि भारत में एथेनॉल ब्लेंडिंग (Ethanol Blending) की शुरुआत वर्तमान केंद्र सरकार के कार्यकाल में हुई। हालांकि, यह पूरी तरह सही नहीं है।

भारत में एथेनॉल ब्लेंडिंग की शुरुआत वर्ष 2001 में तत्कालीन प्रधानमंत्री Atal Bihari Vajpayee के नेतृत्व वाली सरकार के दौरान एक पायलट परियोजना (Pilot Project) के रूप में हुई थी। 


इस परियोजना के तहत उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) और महाराष्ट्र (Maharashtra) के कुछ चुनिंदा शहरों में पेट्रोल में 5% एथेनॉल मिलाकर उसकी व्यवहारिकता (Feasibility) और प्रभाव का परीक्षण किया गया।


इसके बाद जनवरी 2003 में भारत सरकार ने औपचारिक रूप से एथिनॉल ब्लेंडेड पेट्रोल (EBP) प्रोग्राम लॉन्च किया, जिसके तहत शुरुआती चरणों में 5% ब्लेंडिंग का लक्ष्य रखा गया था. बाद में इस अनुपात को बढ़ाकर 10% और फिर 20% तक ले जाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया।


 हालांकि, उस समय एथेनॉल की सीमित उपलब्धता और आपूर्ति संबंधी चुनौतियों के कारण यह कार्यक्रम अपेक्षित गति से आगे नहीं बढ़ सका।

बाद के वर्षों में विभिन्न सरकारों ने इस नीति को आगे बढ़ाया और विशेष रूप से 2014 के बाद एथेनॉल उत्पादन, खरीद नीति और ब्लेंडिंग लक्ष्य को तेज़ी से विस्तार दिया। जिसका उद्देश्य तेल आयात पर निर्भरता कम करना, प्रदूषण घटाना और किसानों को अतिरिक्त आय का स्रोत प्रदान करना था।


भारत में एथेनॉल मुख्य रूप से गन्ने और चावल से बनाया जाता है, लेकिन अब मक्का (Maize) का योगदान भी तेजी से बढ़ रहा है।



2003 -Ethanol Blended Petrol Programme (EBP) लॉन्च, 5% मिश्रण लागू


2006 -5% एथेनॉल मिश्रण का विस्तार देश के अधिकांश राज्यों तक

2015 -10% मिश्रण (E10) लक्ष्य को बढ़ावा

2022 -भारत ने E10 लक्ष्य हासिल किया

2023 -चुनिंदा पेट्रोल पंपों पर E20 की शुरुआत

2025 -भारत ने 20% एथेनॉल मिश्रण (E20) का लक्ष्य हासिल किया

सरकार अब E20 से आगे बढ़कर E85 और E100 ईंधन की दिशा में कदम बढ़ाना चाहती है।




सरकार का दावा है कि एथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम के कारण पिछले कुछ वर्षों में 1 लाख करोड़ रुपये से अधिक की विदेशी मुद्रा बचत हुई है।


लेकिन भारत में एथेनॉल ब्लेंडिंग पॉलिसी को लेकर काफी बड़ा विवाद (Controversy) और लोगों, विशेषज्ञों और विपक्षी दलों की कई चिंताएँ भी सामने आईं।




E20 Fuel (20% Ethanol Blended Petrol) पर लोगों की मुख्य शिकायतें -









भारत में E20 पेट्रोल लागू होने के बाद कई वाहन मालिकों और उपभोक्ताओं ने कुछ समस्याएँ और चिंताएँ सामने रखी हैं। ये शिकायतें मुख्य रूप से माइलेज, इंजन पर असर और पुराने वाहनों की अनुकूलता से जुड़ी हैं।

भारत में 20% एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल (E20) की शुरुआत 6 फरवरी 2023 को 15 चुनिंदा शहरों में एक पायलट परियोजना के रूप में हुई .अंततः 1 अप्रैल 2026 से E20 पूरे देश में मानक (Standard) पेट्रोल ग्रेड बन गया.

विशेषज्ञों (Experts) का कहना है कि भारत में E20 (20% एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल) के लागू होने से पहले बने अधिकांश वाहन पूरी तरह से E20-compatibile नहीं हैं।


माइलेज में कमी (Lower Mileage) सबसे आम शिकायत यही है कि E20 ईंधन से वाहन का माइलेज थोड़ा कम हो जाता है।कई उपयोगकर्ताओं का दावा है कि माइलेज में लगभग 2% से 7% तक गिरावट महसूस होती है।इसका कारण यह है कि एथेनॉल की ऊर्जा घनता (energy content) पेट्रोल से कम होती है।



पुराने वाहनों में समस्या (Compatibility Issue) 10–15 साल पुराने वाहनों को E20 के लिए पूरी तरह डिज़ाइन नहीं किया गया था। कुछ लोगों ने बताया है कि ऐसे वाहनों में:इंजन स्टार्टिंग में दिक्कत और प्लास्टिक पार्ट्स पर असर फ्यूल सिस्टम में घिसाव.


इंजन और पार्ट्स को लेकर चिंता कुछ वाहन मालिकों का मानना है कि:लंबे समय तक E20 इस्तेमाल करने से इंजन के अंदर corrosion (जंग लगने जैसी समस्या) बढ़ सकती है।फ्यूल पाइप, गास्केट और सील जल्दी खराब हो सकते हैं।


लोगों की शिकायतें हैं कि इसे लोगों को बिना पर्याप्त जानकारी दिए और बिना किसी उचित इंफ्रास्ट्रक्चर (Infrastructure) के शुरू किया गया।



हालांकि ऑटोमोबाइल कंपनियाँ कहती हैं कि नए वाहन E20-compliant हैं।


कम वास्तविक बचत (No Clear Cost Benefit) लोगों की एक बड़ी शिकायत यह भी है कि एथेनॉल पेट्रोल से सस्ता होने के बावजूद पेट्रोल की कीमतों में बहुत ज्यादा कमी नहीं आई और माइलेज घटने से कुल बचत लगभग बराबर हो जाती है


अलग-अलग वाहनों में अलग अनुभव - कुछ को माइलेज और परफॉर्मेंस में फर्क महसूस हुआ इससे उपभोक्ताओं में “consistency issue” की शिकायत बढ़ी है.


भारत के आम वाहन चालकों का सबसे बड़ा गुस्सा और शिकायत है। जब भी सरकार एथेनॉल ब्लेंडिंग का बचाव करती है, तो वह ब्राजील Brazil का उदाहरण देती है। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि ब्राजील और भारत के मॉडल में रात-दिन का अंतर है।





ब्राजील के हर फ्यूल स्टेशन पर दो तरह के विकल्प मिलते हैं—पहला E27 (27% एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल) और दूसरा E100 (100% शुद्ध हाइड्रस एथेनॉल). कीमत में भारी अंतर: ब्राजील में एथेनॉल पेट्रोल के मुकाबले लगभग 30% से 40% तक सस्ता मिलता है.




वहाँ की जनता को कोई मजबूरी नहीं है। अगर किसी के पास पुरानी गाड़ी है, तो वह E27 ले सकता है। जिसके पास फ्लेक्स-फ्यूल गाड़ी है, वह अपनी जेब और जरूरत के हिसाब से सस्ता E100 या महंगा पेट्रोल चुन सकता है.


भारत में सरकार ने पेट्रोल पंपों से सामान्य पेट्रोल (0% एथेनॉल) को पूरी तरह हटा दिया है। आज देश के लगभग सभी पंपों पर केवल E10 से लेकर E20 (20% एथेनॉल) वाला पेट्रोल ही मिल रहा है. आम उपभोक्ता के पास कोई चॉइस ही नहीं बची है।


कीमत में कोई कटौती नहीं: एथेनॉल की लागत पेट्रोल से काफी कम होती है। इसके बावजूद, भारत सरकार ग्राहकों से E20 पेट्रोल के लिए भी वही पूरी कीमत (Full Price) वसूल रही है जो सामान्य पेट्रोल की होती है।

 जैसा कि आपने महसूस किया, एथेनॉल के कारण गाड़ियों का माइलेज 5% से 7% तक घट गया है. यानी जनता को पेट्रोल भी महंगा मिल रहा है, माइलेज भी कम मिल रहा है और गाड़ी के इंजन खराब होने का जोखिम भी उन्हीं का है.




विशेषज्ञों (Experts) की चिंताएँ केवल वाहनों की E20 compatibility तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि इससे जुड़े कई अन्य आर्थिक, पर्यावरणीय और नीतिगत पहलू भी शामिल हैं।


फसल उगाने से लेकर फैक्ट्री तक (कुल वाटर फुटप्रिंट)

अगर हम खेत में चावल उगाने से लेकर फैक्ट्री में एथिनॉल बनाने तक का पूरा हिसाब लगाएं to 1 लीटर एथिनॉल तैयार करने में लगभग 2.12 किलोग्राम शुद्ध चावल और 10,790 लीटर पानी जरूरत पड़ती है.








वर्ष 2024-25 में सरकार द्वारा एथेनॉल उत्पादन के लिए लगभग 52 लाख टन चावल (Rice) आवंटित किया गया था, जिसे बढ़ाकर 2025-26 में लगभग 90 लाख टन कर दिया गया। यह चावल मुख्य रूप से सार्वजनिक वितरण प्रणाली (Public Distribution System - PDS) और बफर स्टॉक में उपलब्ध अतिरिक्त या अधिशेष (surplus/damaged grain) श्रेणी से लिया जाता है।

हालांकि, इस नीति को लेकर विशेषज्ञों के बीच बहस भी देखने को मिलती है। उनका कहना है कि जिस देश में खाद्य सुरक्षा एक संवेदनशील मुद्दा है, वहाँ सब्सिडी वाले या सार्वजनिक वितरण प्रणाली के अनाज का उपयोग एथेनॉल उत्पादन के लिए करना कई सवाल खड़े करता है।

कुछ विशेषज्ञ इस संदर्भ में भारत के Global Hunger Index (GHI) का भी उल्लेख करते हैं, जिसमें भारत की स्थिति 2025 में 123 देशों में 102वें स्थान पर बताई गई है। ऐसे में आलोचकों का तर्क है कि खाद्य सुरक्षा से जुड़े संसाधनों को ईंधन उत्पादन की ओर मोड़ना नीति संतुलन (policy balance) पर सवाल उठाता है।


दूसरी ओर, सरकार का पक्ष यह है कि उपयोग किया जाने वाला चावल मुख्य रूप से अतिरिक्त, खराब गुणवत्ता वाला या अधिशेष स्टॉक होता है, जो लंबे समय तक भंडारण में रखने से बर्बाद हो सकता है। इसलिए इसका उपयोग एथेनॉल उत्पादन में करना एक वैकल्पिक आर्थिक और ऊर्जा समाधान माना जाता है।



भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा गन्ना उत्पादक देश है।

लेकिन एक किलोग्राम चीनी उत्पादन के लिए लगभग 1500 से 2000 लीटर पानी की आवश्यकता पड़ सकती है।

कुछ अध्ययनों के अनुसार एक लीटर एथेनॉल उत्पादन के लिए कुल कृषि और प्रसंस्करण चक्र में 2000 से 3000 लीटर तक पानी की खपत हो सकती है।




यही कारण है कि जल विशेषज्ञ एथेनॉल विस्तार को लेकर चिंता व्यक्त करते हैं।

नीति आयोग (NITI Aayog) की एक रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि यदि जल प्रबंधन और भूजल (groundwater) के उपयोग को लेकर प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो वर्ष 2030 तक भारत के लगभग 21 बड़े शहर गंभीर जल संकट की स्थिति में पहुँच सकते हैं। इनमें दिल्ली, बेंगलुरु और चेन्नई जैसे प्रमुख महानगर शामिल हैं।





2024-25 में भारत ने लगभग 42-45 मिलियन टन मक्का का उत्पादन किया।

लेकिन एथेनॉल उद्योग की बढ़ती मांग के कारण मक्का की कीमतों में कई क्षेत्रों में 20-30% तक वृद्धि देखी गई।




एथेनॉल ब्लेंडिंग नीति को लेकर नितिन गडकरी पर लगे आरोप और विवाद-








केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी पर एथेनॉल ब्लेंडिंग (Ethanol Blending) नीति को लेकर विपक्षी दलों और आलोचकों द्वारा 'कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट' (Conflict of Interest - हितों का टकराव) और नेपोटिज़्म (भाई-भतीजावाद) के गंभीर आरोप लगाए गए हैं।

पारिवारिक बिजनेस का फायदा: विपक्षी नेताओं का आरोप है कि नितिन गडकरी पेट्रोलियम मंत्री न होने के बावजूद एथेनॉल ब्लेंडिंग नीति की सबसे ज्यादा वकालत करते हैं। आरोप है कि उनके दोनों बेटे—निखिल गडकरी (CIAN एग्रो इंडस्ट्रीज) और सारंग गडकरी (मानस एग्रो) ऐसी कंपनियों से जुड़े हैं जो चीनी और एथेनॉल उत्पादन के व्यवसाय में सक्रिय हैं।


विपक्ष का दावा है कि सरकार द्वारा एथेनॉल ब्लेंडिंग (E20) को अनिवार्य करने और इसके टारगेट समय से पहले पूरे करने के फैसलों के बाद गडकरी के परिवार से जुड़ी कंपनियों के रेवेन्यू और शेयर की कीमतों में भारी उछाल आया है, जिससे उनके परिवार को सीधा आर्थिक लाभ हुआ है

सोशल मीडिया पर उनके पुराने बयानों के वीडियो वायरल कर लोग आरोप लगा रहे हैं कि उन्होंने वादा किया था कि एथेनॉल आने से पेट्रोल ₹15 लीटर तक सस्ता हो सकता है। लेकिन हकीकत में जनता को आज भी ₹100+ प्रति लीटर की महंगी कीमत चुकानी पड़ रही है।





आरोपों पर नितिन गडकरी और सरकार का आधिकारिक पक्ष




नितिन गडकरी और सरकार ने इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए इसे देशहित के खिलाफ काम करने वाली ताकतों की साजिश बताया है:



विदेशी पेट्रोलियम लॉबी की साजिश: नितिन गडकरी का स्पष्ट कहना है कि एथेनॉल ब्लेंडिंग के कारण भारत का भारत का लगभग ₹22 लाख करोड़ का फॉसिल फ्यूल इम्पोर्ट (तेल आयात) बिल कम हो रहा है इसके चलते विदेशी तेल आयातक कंपनियाँ और उनकी शक्तिशाली लॉबी उनके खिलाफ सोशल मीडिया पर भ्रामक और प्रायोजित अभियान (Paid Campaigns) चला रही हैं।


'किसान से ऊर्जा-दाता' का विजन: उन्होंने सार्वजनिक मंचों पर स्पष्ट किया है कि एथेनॉल को बढ़ावा देने का उद्देश्य किसी निजी कंपनी को लाभ पहुँचाना नहीं, बल्कि देश के किसानों की आय बढ़ाना (कृषि को ऊर्जा क्षेत्र से जोड़ना) और प्रदूषण को कम करना है। उन्होंने साफ कहा कि वे आर्थिक लाभ के लालच से परे होकर राष्ट्रहित में नीतियां बनाते हैं।

न्यायिक और तकनीकी मान्यता: सरकार का पक्ष है कि देश की शीर्ष वैज्ञानिक संस्थाओं द्वारा एथेनॉल ब्लेंडेड फ्यूल को पूरी तरह जांचा और परखा गया है। इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट ने भी इस नीति के विरोध में दायर याचिकाओं को खारिज कर सरकार के इस पर्यावरण-अनुकूल कदम को सही ठहराया है।


देश की शीर्ष वैज्ञानिक संस्थाओं द्वारा एथेनॉल ब्लेंडेड फ्यूल को लेकर कई अध्ययन और परीक्षण किए गए हैं, हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि इसके दीर्घकालिक (long-term) प्रभावों को लेकर अभी भी और अधिक जांच  की आवश्यकता है।





ताज़ा जानकारी के अनुसार, केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा है कि पेट्रोल में 20% एथेनॉल ब्लेंडिंग (E20) फिलहाल एक 'प्रयोग' (Experiment) के रूप में देखी जा रही है।

सरकार के अनुसार, इस नीति के वास्तविक प्रभावों का व्यापक मूल्यांकन अभी जारी है और इसके अधिक स्पष्ट परिणाम अगले वर्ष तक सामने आने की उम्मीद है।

सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि इस बयान का अर्थ E20 नीति को वापस लेना या उसमें बदलाव करना नहीं है। एथेनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम पहले की तरह जारी रहेगा.





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