US-IRAN DEAL. आखिर ईरान Iran के सामने क्यों झुक गए ट्रंप, Trump On backfoot ?

US-IRAN DEAL. आखिर ईरान Iran के सामने क्यों झुक गए ट्रंप Trump, ट्रंप की धमकियां बेअसर? अमेरिका फर्स्ट America first वाले ट्रंप Trump आखिर ईरान के आगे क्यों नरम पड़े On backfoot ?







इस ब्लॉग में हम जानेंगे कि आखिर वह कौन-सी वजहें थीं, जिनके कारण ईरान Iran के साथ हुई डील में डोनाल्ड ट्रंप बैकफुट Backfoot पर दिखाई दिए।


आखिरकार 18 जून 2026 को अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से जारी तनाव को विराम देते हुए 14-बिंदुओं वाले Memorandum of Understanding (MoU) पर सहमति बनी. जिसके साथ दोनों देशों के बीच युद्धविराम (Ceasefire) लागू हो गया।


कई महीनों तक चले सैन्य टकराव और बढ़ते तनाव के बाद इस समझौते ने न केवल पश्चिम एशिया बल्कि पूरी दुनिया को बड़े युद्ध की आशंका से राहत दी है।


यह समझौता पाकिस्तान की मध्यस्थता में तैयार किया गया था, जबकि इसके अंतिम डिजिटल हस्ताक्षर Digital signature फ्रांस France के वर्साय (Versailles) में किए गए।






व्हाइट हाउस hitehouse के अनुसार, राष्ट्रपति ट्रंप ने फ्रांस के वर्साय पैलेस में जी-7 सम्मेलन के बाद इस दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर किए। ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियन Masoud Pezeshkian ने तेहरान Tehran से डिजिटल माध्यम से इस समझौते पर हस्ताक्षर किए.


दिलचस्प बात यह है कि अमेरिका–ईरान समझौते US- IRAN DEAL के अंतिम डिजिटल हस्ताक्षर फ्रांस के Palace of Versailles में हुए , जो इतिहास में उसी स्थान के रूप में प्रसिद्ध है जहाँ 1919 में प्रथम विश्व युद्ध First world war के बाद जर्मनी Germany को कठोर शर्तों वाली वर्साय संधि (Treaty of Versailles) पर हस्ताक्षर करने पड़े थे। उस संधि को जर्मनी में राष्ट्रीय अपमान का प्रतीक माना गया और इतिहासकारों के अनुसार उसी से उपजे असंतोष ने आगे चलकर द्वितीय विश्व युद्ध World war 2 की पृष्ठभूमि तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

कुछ इतिहासकार और राजनीतिक विश्लेषक इस समानता की ओर ध्यान दिलाते हुए तर्क दे रहे हैं कि जिस प्रकार 1919 की वर्साय संधि जर्मनी के लिए अपमान का प्रतीक बन गई थी, उसी तरह वर्साय में हुए इस समझौते को भी कुछ लोग अमेरिका और विशेष रूप से ट्रंप प्रशासन के लिए लिए अपमान का प्रतीक के रूप में देख रहे हैं।



अमेरिका ने ईरान के खिलाफ लागू अपनी समुद्री नाकेबंदी में ढील देना शुरू कर दिया है, वहीं ईरान ने भी वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ से अंतरराष्ट्रीय जहाज़ों की आवाजाही दोबारा शुरू करने की अनुमति दे दी है।







दोनों देशों के बीच बढ़ते तनाव के कारण स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ पर समुद्री आवाजाही प्रभावित हो गई थी, जिससे वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर संकट के बादल मंडराने लगे थे। दुनिया के कच्चे तेल (Crude Oil) और प्राकृतिक गैस (LNG) का एक बड़ा हिस्सा इसी समुद्री मार्ग से होकर गुजरता है।

लेकिन जिन हालातों पर ये सीजफायर cesefire हुआ है उसे दुनिया में नई बहस छिड़ गई है विशेषज्ञों का मनाना है कि जिन हालातों पर सीजफायर हुआ है उससे ऐसा लगता है कि कहीं ना कहीं अमेरिका डील में Compromise हुआ है

और ईरान काफ़ी हद तक अपने शर्तें (Conditions) मनवाने में कामयाब हुआ है। जो विशेषज्ञ भविष्यवाणी कर रहे थे कि अगर सीज़फ़ायर होता है तो वो ईरान की शर्तो पर ही होगा, क्योंकि शुद्ध युद्ध में वो शुरू से ही मजबूत स्थिति में है।



इसी कारण कुछ विश्लेषक इस समझौते को ईरान की कूटनीतिक और रणनीतिक सफलता के रूप में देख रहे हैं।



आइये उन 14 एमओयू (MoU) बिंदुओं पर चर्चा करते हैं जिन पर सीसेफायर (Cesefire Deal ) डील हुई है.






1 अमेरिका, ईरान और उनके सहयोगी सभी मोर्चों पर तत्काल और स्थायी रूप से सैन्य कार्रवाई समाप्त करेंगे, जिसमें लेबनान भी शामिल है। ईरान पहले ही स्पष्ट कर चुका था कि युद्धविराम में लेबनान भी शामिल होना चाहिए। दोनों देश लेबनान की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करेंगे।



2 अमेरिका और ईरान एक-दूसरे की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करेंगे तथा किसी भी प्रकार से एक-दूसरे के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेंगे।

3 अमेरिका और ईरान अधिकतम 60 दिनों के भीतर एक अंतिम समझौते पर बातचीत पूरी करने का प्रयास करेंगे।

4 अमेरिका ईरानी बंदरगाहों पर लगी अपनी समुद्री नाकाबंदी (Naval Blockade) को हटा देगा यह प्रक्रिया 30 दिनों के भीतर पूरी होगी।



5- ईरान होर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को पुनः खोल देगा और वाणिज्यिक जहाज़ों (Commercial Ships) को बिना किसी टोल या अतिरिक्त शुल्क के वहां से गुजरने की अनुमति देगा।


6- ईरान के पुनर्निर्माण के लिए 300 अरब डॉलर की आर्थिक पुनर्निर्माण और विकास योजना तैयार करेंगे। हालांकि, अमेरिकी अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि अमेरिका स्वयं ईरान को कोई पैसा नहीं देगा।

7- अमेरिका ईरान पर लगाए गए सभी आर्थिक प्रतिबंधों को समाप्त करने पर सहमत हुआ है, जिनमें संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद तथा अमेरिका द्वारा लगाए गए प्रतिबंध भी शामिल हैं।

8- ईरान परमाणु हथियार नहीं बनाएगा







ईरान ने वादा किया है कि वह परमाणु हथियार विकसित नहीं करेगा। इसके अलावा, उसके पास पहले से मौजूद उच्च संवर्धित यूरेनियम के प्रबंधन पर भी दोनों देश सहमत होंगे। कम से कम इतना तय है कि इस यूरेनियम को अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) की निगरानी में कम संवर्धित (Downblend) किया जाएगा।



हालांकि, इस बिंदु पर अभी अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है। दोनों देश अगले 60 दिनों तक वार्ता जारी रखेंगे, जिसके बाद इस मुद्दे पर अंतिम फैसला किया जाएगा


9 और 10- फिलहाल यथास्थिति बनी रहेगी इस दौरान अमेरिका नए प्रतिबंध नहीं लगाएगा। साथ ही, ईरान को तेल और पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात, बैंकिंग सेवाओं और परिवहन के लिए आवश्यक छूट (Waivers) भी दी जाएगी।

11 - ईरान की जमी हुई संपत्तियां जारी होंगी






बिंदु 12 से 14- अमेरिका और ईरान समझौते के पालन की निगरानी के लिए एक संयुक्त तंत्र (Monitoring Mechanism) बनाएंगे।






आखिर ऐसी क्या परिस्थितियाँ बनीं कि दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य और आर्थिक माने जाने वाले अमेरिका न को बातचीत की मेज़ पर समझौता करना पड़ा?




अब आइए एक-एक करके उन प्रमुख कारणों को समझने का प्रयास करते हैं जिनकी वजह से कई विश्लेषकों को लगा कि इस समझौते में अमेरिका इस सीजफायर डील मे बैकफुट पर दिखाई दिया.




ईरान की वर्षों की तैयारी: मिसाइल सिटी का निर्माण






हालांकि, 1979 के ईरान बंधक संकट (Iran Hostage Crisis) के बाद अमेरिका ने ईरान पर आर्थिक प्रतिबंध लगाए थे। फिर भी ईरान ने तेल निर्यात, क्षेत्रीय व्यापार नेटवर्क और वैकल्पिक आर्थिक साझेदारों के सहारे अपनी अर्थव्यवस्था को पूरी तरह ध्वस्त होने से बचाए रखा और प्रतिबंधों के बावजूद आर्थिक रूप से टिके रहने में सफलता हासिल की।

ईरान ने संभावित युद्ध और बाहरी दबावों की आशंका को देखते हुए काफी समय पहले ही अपनी तैयारियाँ शुरू कर दी थीं। उसने अपनी सैन्य क्षमताओं को मजबूत करने, मिसाइल कार्यक्रम विकसित करने, भूमिगत सैन्य ठिकानों का निर्माण करने तथा अर्थव्यवस्था को प्रतिबंधों के प्रभाव से बचाने के लिए कई दीर्घकालिक कदम उठाए थे





मध्य पूर्व और उसके आसपास के क्षेत्र में अतीत में हुए कई बड़े राजनीतिक और सैन्य घटनाक्रमों में अमेरिका की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इनमें Syria, Libya, Afghanistan और Iraq जैसे देश शामिल हैं। कुछ मामलों में अमेरिका ने सैन्य हस्तक्षेप किया, जबकि कुछ जगहों पर उसने स्थानीय समूहों या गठबंधनों का समर्थन किया। इन घटनाओं के परिणामस्वरूप कई देशों में सत्ता परिवर्तन हुए और नई सरकारें स्थापित हुईं, जिन्हें अक्सर अमेरिका के अधिक निकट या सहयोगी के रूप में देखा गया।




ईरान को यह डर लंबे समय से सताता रहा था कि जिस तरह अमेरिका ने अतीत में कई देशों में सैन्य हस्तक्षेप किया या वहां की राजनीतिक व्यवस्था को प्रभावित करने की कोशिश की, वैसा ही कुछ भविष्य में उसके साथ भी हो सकता है। यही वजह थी कि तेहरान ने दशकों पहले ही संभावित युद्ध और बाहरी हमलों की तैयारियां शुरू कर दी थीं।


ईरान ने अपनी रणनीति इस सोच के साथ बनाई कि यदि कभी उसे किसी बड़े सैन्य संघर्ष का सामना करना पड़े, तो हथियारों और गोला-बारूद की कमी उसकी सबसे बड़ी कमजोरी न बने। इसके लिए उसने न केवल अपने मिसाइल कार्यक्रम को लगातार मजबूत किया, बल्कि देश के विभिन्न हिस्सों में गुप्त भूमिगत सैन्य ठिकानों का विशाल नेटवर्क भी तैयार किया।

इन अंडरग्राउंड बंकरों में बड़ी संख्या में बैलिस्टिक और क्रूज़ मिसाइलों को सुरक्षित रखा गया। ईरान इन विशाल भूमिगत मिसाइल ठिकानों को 'मिसाइल सिटी' (Missile City) के नाम से संबोधित करता है। ये ठिकाने इतने गुप्त और सुरक्षित बनाए गए थे कि दुश्मन के लिए उन्हें खोज पाना और नष्ट करना आसान नहीं था।


दिलचस्प बात यह है कि ईरान ने इन मिसाइल शहरों को पूरी तरह गोपनीय रखने के बजाय कई बार इनके वीडियो और तस्वीरें सार्वजनिक भी कीं। टीवी प्रसारणों और सरकारी प्रचार वीडियो में सैकड़ों मिसाइलों से भरी लंबी सुरंगें दिखाई गईं, जिनका उद्देश्य केवल सैन्य शक्ति का प्रदर्शन करना नहीं था, बल्कि अपने विरोधियों को यह संदेश देना भी था कि किसी भी हमले की कीमत चुकानी पड़ सकती है।



जब क्षेत्र में तनाव चरम पर पहुंचा, तब ईरान लगातार मिसाइल और ड्रोन हमले करने की स्थिति में दिखाई दिया। इसकी एक बड़ी वजह यह थी कि उसने वर्षों से बड़ी मात्रा में मिसाइलों का उत्पादन और भंडारण किया हुआ था। यही कारण था कि भारी सैन्य और आर्थिक दबाव के बावजूद ईरान तुरंत बैकफुट पर जाता नहीं दिखा,



ईरान ने वर्षों तक अपेक्षाकृत सस्ते लेकिन प्रभावी ड्रोन विकसित करने पर भी विशेष ध्यान दिया। ईरान का मानना था कि आधुनिक युद्धों में केवल अत्याधुनिक हथियार ही नहीं, बल्कि बड़ी संख्या में उपलब्ध कम लागत वाले हथियार भी निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।

इसी सोच के तहत ईरान ने ऐसे ड्रोन विकसित किए जिन्हें अपेक्षाकृत कम लागत में बड़ी संख्या में तैयार किया जा सकता था। किसी संघर्ष की स्थिति में इन ड्रोनों का उपयोग दुश्मन की वायु रक्षा प्रणालियों को व्यस्त रखने, महत्वपूर्ण सैन्य ठिकानों को निशाना बनाने और महंगे इंटरसेप्टर मिसाइलों को खर्च करवाने के लिए किया जा सकता था।

ईरान की इस रणनीति का सबसे अच्छा उदाहरण उसके Shahed-136 जैसे ड्रोन हैं। इन ड्रोनों की लागत अपेक्षाकृत कम मानी जाती है, जबकि इन्हें रोकने के लिए इस्तेमाल होने वाली अमेरिका की Tomahawk जैसी क्रूज़ मिसाइलों की कीमत लाखों डॉलर तक हो सकती है। यही कारण है कि ईरान ने वर्षों तक बड़ी संख्या में सस्ते ड्रोन और मिसाइलें बनाने पर जोर दिया, ताकि किसी लंबे संघर्ष में वह अपने विरोधियों पर लगातार दबाव बनाए रख सके।"




ईरान के जवाबी हमले- अमेरिकी सैन्य अड्डों U.S. military bases और खाड़ी सहयोगियों United States gulf allies पर हमले-





जैसे ही अमेरिका और इज़राइल ने ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई शुरू की, ईरान ने अपनी पूर्व निर्धारित रणनीति पर काम करना शुरू कर दिया। उसकी पहली प्राथमिकता खाड़ी क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों और अमेरिका के क्षेत्रीय सहयोगियों के महत्वपूर्ण तेल एवं ऊर्जा बुनियादी ढांचे को निशाना बनाना था।

ईरान के लिए यह अपेक्षाकृत आसान था, क्योंकि खाड़ी क्षेत्र में स्थित अधिकांश अमेरिकी सैन्य अड्डे और उसके सहयोगी देश ईरानी मिसाइलों और ड्रोन की पहुंच के भीतर थे। इसके लिए ईरान को किसी अत्याधुनिक या लंबी दूरी की मिसाइल की आवश्यकता नहीं थी। उसके पास पहले से ही पर्याप्त संख्या में ऐसी मिसाइलें मौजूद थीं जो इन लक्ष्यों तक आसानी से पहुंच सकती थीं।

ईरान की भौगोलिक स्थिति: एक प्राकृतिक सुरक्षा कवच

ईरान की भौगोलिक स्थिति भी उसकी सबसे बड़ी रणनीतिक ताकतों में से एक है। देश का बड़ा हिस्सा पहाड़ी और दुर्गम क्षेत्रों से घिरा हुआ है, जो किसी भी बाहरी सैन्य अभियान के लिए प्राकृतिक बाधा (Natural Barrier) का काम करते हैं। यही कारण है कि ईरान पर बड़े पैमाने पर जमीनी हमला करना मध्य पूर्व के कई अन्य देशों की तुलना में कहीं अधिक कठिन माना जाता है।

ईरान ने वर्षों से अपने कई सैन्य ठिकानों, मिसाइल भंडारों और कमांड सेंटरों को पहाड़ी क्षेत्रों तथा भूमिगत बंकरों में विकसित किया है। इससे दुश्मन के लिए उन्हें खोज पाना और पूरी तरह नष्ट कर पाना बेहद चुनौतीपूर्ण हो जाता है। साथ ही, इन सुरक्षित ठिकानों से ईरान क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी सैन्य अड्डों और अन्य रणनीतिक लक्ष्यों पर जवाबी कार्रवाई करने की क्षमता बनाए रखता है।

भूगोल का एक और महत्वपूर्ण लाभ ईरान को जलमार्गों के क्षेत्र में मिलता है। दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में से एक, Strait of Hormuz, ईरान के तट के बेहद करीब स्थित है। वैश्विक तेल व्यापार का एक बड़ा हिस्सा इसी संकरे समुद्री मार्ग से होकर गुजरता है। इसलिए किसी भी क्षेत्रीय संघर्ष के दौरान इस जलमार्ग की सुरक्षा अंतरराष्ट्रीय चिंता का विषय बन जाती है।



होर्मुज़ जलडमरूमध्य को बंद करके ईरान ने युद्ध को केवल सैन्य मोर्चे तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे वैश्विक आर्थिक संकट में बदल दिया। तेल आपूर्ति प्रभावित होने के कारण पूरी दुनिया में ऊर्जा संकट गहराने लगा, तेल की कीमतें बढ़ने लगीं और कई देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर दबाव बढ़ गया

सैन्य दृष्टि से भी यह क्षेत्र बेहद संवेदनशील माना जाता है। किसी भी नौसैनिक शक्ति को अपने जहाजों और आपूर्ति मार्गों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए अतिरिक्त संसाधन लगाने पड़ते हैं।

अमेरिका जैसी महाशक्ति के लिए भी हजारों किलोमीटर दूर लंबे समय तक सैन्य अभियान चलाना, सैनिकों और हथियारों की आपूर्ति बनाए रखना तथा क्षेत्रीय स्थिरता को संभालना आसान नहीं होता। संभवतः यही कारण है कि विभिन्न अमेरिकी प्रशासन अक्सर प्रत्यक्ष पूर्ण-स्तरीय युद्ध (Full-Scale War) की बजाय सीमित सैन्य कार्रवाई, प्रतिबंधों और कूटनीतिक दबाव जैसी रणनीतियों को प्राथमिकता देते रहे हैं।



यूरोपीय देशों से Trump ke बढ़ते मतभेद






ट्रंप का अमेरिका के बैकफुट पर आने का एक कारण और हो सकता है उसके यूरोपीय सहयोगी United Kingdom, France, Germany, Italy, Spain और अन्य यूरोपीय देशों का ट्रंप के साथ खुलकर न आना भी एक बड़ा कारण माना जा सकता है।


हमें समय में कुछ कुछ साल पीछे जाना पड़ेगा जब यूक्रेन और रूस के बीच युद्ध शुरू हुआ तो अमेरिका ने जो बाइडेन के समय यूक्रेन को आर्म्स और इंटेलिजेंस प्रोवाइड करवाई लेकिन जब Trump जीत के सत्ता में आए तो उन्होंने सप्लाई भी काम की और इंटेलिजेंस भी काम की और जो भी पुतिन के साथ मीटिंग हुई उसके बाद ट्रंप ने क्लियर कहा कि जितने भाग पर रूस ने कब्जा कर लिया है वह भाग रसिया को दे दिया जाए उन्होंने यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर ज़ेलेंस्की को अमेरिका बुलाकर इंसल्ट भी कि तुम वर्ल्ड वॉर 3 (world war-3) शुरू करवा सकते हो.

इस बात से यूरोप (Europe) अच्छा खासा नाराज हो गया जो भी यूरोप के पावरफुल कंट्री यूनाइटेड किंगडम जर्मनी फ्रांस और इटली United Kingdom ट्रंप के बिहेवियर से काफी नाराज हो गए




और हाल ही में ट्रंप ने बीच में एक और विवादित बयान दिया है कि वह ग्रीनलैंड ( Greenland) को कब्जा कर लेंगे क्योंकि उन्हें लगता है कि वह उसकी की सुरक्षा के लिए खतरा है वहां रूस और चीनी के जहाज़ आते रहते हैं इसलिए ग्रीनलैंड पर अमेरिका का कब्जा होना चाहिए. इस बात से यूरोप और अमेरिका के रिश्ते और भी ज्यादा खराब हो गए क्योंकि यूरोप को ऐसा लगता है कि अमेरिका ने उन्हें धोखा दिया है और उन्हें यूक्रेन युद्ध में उसे तरह की सहायता नहीं थी जैसी करनी चाहिए ,वह पुतिन की भाषा बोल रहे हैं,



Donald Trump ने यह भी चेतावनी दी कि अगर तुम मेरी बात नहीं मानते हो तो यह समझ लेना की NATO खत्म हो जाएगा क्योंकि नाटो में अमेरिका ही सबसे पावरफुल कंट्री है और सबसे ज्यादा फंड अमेरिका ही देता है यहां तक की ट्रंप ने नाटो कंट्रीज को प्रेशराइज किया कि आप भी अपना सभी खर्च बढ़ाओ अमेरिका ही आपका खर्च कब तक उठाता रहेगा इस बात से ज्यादातर यूरोपीयन कंट्रीज नाराज थी.


और जब अमेरिका ईरान के साथ में युद्ध में उलझ गया तब यूरोप से वैसा ही किया उन्होंने भी यूरोप अमेरिका का साथ देने से डायरेक्ट साथ देने से मना कर दिया यहां तक की यूरोप के कंट्री ने अपनी Army Base का भी इस्तेमाल अमेरिका के करने के लिए भी मना कर दिया शायद यही वह रीजन एस है जिससे कि अमेरिका बैक फुट पर है.


ऊर्जा संकट का puri duniya me बढ़ता दबाव




यदि खाड़ी क्षेत्र में तेल आपूर्ति बाधित होती या होर्मुज़ जलडमरूमध्य में तनाव बढ़ता, तो इसका सीधा असर वैश्विक तेल बाजारों पर पड़ता। तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का प्रभाव केवल मध्य पूर्व तक सीमित नहीं रहता, बल्कि अमेरिका समेत पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ता है।

तेल की बढ़ती कीमतों का मतलब होता है महंगा पेट्रोल और डीजल, परिवहन लागत में वृद्धि, उत्पादन लागत में इजाफा और अंततः महंगाई (Inflation) का बढ़ना। अमेरिका में भी ईंधन की कीमतें और महंगाई हमेशा राजनीतिक रूप से संवेदनशील मुद्दे रहे हैं। आम अमेरिकी नागरिक सीधे तौर पर इसका असर अपनी जेब पर महसूस करते हैं।

अमेरिका को यह संतुलन बनाना था कि वह अपनी शक्ति और विश्वसनीयता भी बनाए रखे, लेकिन ऐसा करते हुए किसी ऐसे लंबे संघर्ष में न फंस जाए जिसकी आर्थिक और राजनीतिक कीमत बहुत अधिक हो।"





ट्रंप Trump पर घरेलू दबाव: पूर्ण-स्तरीय युद्ध को मंजूरी न मिलना



डोनाल्ड ट्रंप के सामने घरेलू राजनीतिक दबाव भी एक महत्वपूर्ण कारक था। अमेरिका में बड़ी संख्या में मतदाता लंबे समय से विदेशों में चलने वाले महंगे और लंबे युद्धों से थक चुके हैं। अफगानिस्तान और इराक जैसे संघर्षों पर खरबों डॉलर खर्च करने और हजारों अमेरिकी सैनिकों के हताहत होने के बाद अमेरिकी समाज में 'अनंत युद्धों' (Forever Wars) के प्रति समर्थन काफी कम हो गया है।

ट्रंप के राजनीतिक आधार (Support Base) का एक बड़ा हिस्सा भी इस विचार का समर्थक रहा है कि अमेरिका को अन्य देशों के संघर्षों में सीधे नहीं उलझना चाहिए और अपने संसाधनों को घरेलू समस्याओं पर केंद्रित करना चाहिए। ऐसे में ईरान के खिलाफ किसी पूर्ण-स्तरीय युद्ध (Full-Scale War) की स्थिति में ट्रंप को न केवल कांग्रेस और राजनीतिक विरोधियों के सवालों का सामना करना पड़ता, बल्कि अपने ही समर्थकों के बीच बढ़ती नाराजगी का जोखिम भी उठाना पड़ता।

स्वाभाविक रूप से अमेरिकी जनता का एक बड़ा वर्ग अपने सैनिकों की जान को ऐसे संघर्ष में जोखिम में डालने के पक्ष में नहीं था।



रूस और चीन का अप्रत्यक्ष रूप से ईरान को समर्थन (Russia and China Ka Back Support)



ईरान की स्थिति को मजबूत बनाने वाले महत्वपूर्ण कारकों में रूस और चीन का अप्रत्यक्ष समर्थन भी शामिल था। भले ही ये दोनों देश सीधे युद्ध में शामिल नहीं थे, लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति और कूटनीति के स्तर पर उनका रुख ईरान के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा था।

रूस और चीन लंबे समय से एक ऐसी विश्व व्यवस्था की वकालत करते रहे हैं जिसमें अमेरिका का एकाधिकार कम हो। यही कारण है कि दोनों देश अक्सर ईरान पर अत्यधिक दबाव या सैन्य कार्रवाई का विरोध करते रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी उन्होंने कई बार ईरान के पक्ष में संतुलित रुख अपनाया है।

अमेरिका के लिए यह चिंता का विषय था कि यदि संघर्ष लंबा खिंचता है, तो रूस और चीन ईरान को कूटनीतिक, आर्थिक या तकनीकी सहायता प्रदान कर सकते हैं। भले ही यह सहायता प्रत्यक्ष सैन्य हस्तक्षेप के रूप में न हो, लेकिन इससे युद्ध को समाप्त करना और अधिक कठिन हो सकता था।



अमेरिका की प्रतिष्ठा का सवाल -



एक ओर अमेरिका अपनी शक्ति और विश्वसनीयता पर सवाल नहीं उठने देना चाहता था, वहीं दूसरी ओर वह एक लंबे और महंगे युद्ध में भी नहीं फंसना चाहता था। इसलिए उसने ऐसा समाधान तलाशने का प्रयास किया, जिससे उसकी प्रतिष्ठा भी बरकरार रहे और होर्मुज़ जलडमरूमध्य में बाधित समुद्री यातायात को भी बहाल किया जा सके।






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