Israel-Palestine Conflict: The Story Behind the Never-Ending Conflict.

Israel-Palestine Conflict: The Story Behind the Never-Ending Conflict. A History of Land, War and Politics.


इजरायल-फिलिस्तीन संघर्ष: 100 साल पुरानी कहानी आखिर खत्म क्यों नहीं होती?


इसराइल-फिलिस्तीन विवाद  Israel-Palestine Conflict  दुनिया के सबसे पुराने, सबसे जटिल और सबसे संवेदनशील भू-राजनीतिक (geopolitical) संघर्षों में से एक है। एक सदी से भी अधिक समय से चल रहा यह विवाद ज़मीन, संप्रभुता (sovereignty) और पहचान की लड़ाई है।



इस संघर्ष को पूरी तरह समझने के लिए हमें केवल आज को ही नहीं, बल्कि इसके गहरे ऐतिहासिक इतिहास और मुख्य विवादों को समझना होगा।

इस विवाद की जड़ें 19वीं सदी के अंत और 20वीं सदी की शुरुआत में पैदा हुए दो अलग-अलग राष्ट्रीय आंदोलनों से जुड़ी हैं। दोनों ही पक्ष भूमध्य सागर (Mediterranean Sea) और जॉर्डन नदी के बीच की एक छोटी सी ज़मीन पर अपना ऐतिहासिक अधिकार होने का दावा करते हैं।


पैलेस्टाइन ( Palestine) की धरती पर यहूदियों के लिए एक अलग देश इजरायल Israel  बनाने की अवधारणा (Idea) अचानक कैसे आई जिसने आगे चलकर दुनिया के सबसे लंबे, जटिल और विनाशकारी संघर्षों में से एक को जन्म दिया, जिसे हम इजरायल-फिलिस्तीन संघर्ष (Israeli-Palestinian Conflict) के रूप में जानते हैं।






 

आइए इस पूरे इतिहास और विवाद को सिलसिलेवार तरीके से (Step-by-Step) एक-एक करके गहराई से समझते हैं


यूरोप europe में यहूदियों jews का उत्पीड़न और उनके अपने देश की मांग का इतिहास कई चरणों से होकर गुजरा है।


1,   19वीं सदी का अंत और ज़ायनवाद (Zionism) की नींव -



1800 के दशक के आखिरी दशकों में पूर्वी यूरोप, खासकर रूसी साम्राज्य में, यहूदी विरोधी हिंसा (जिसे 'पोग्रोम' कहा जाता है) चरम पर थी। इस नस्लीय और धार्मिक नफरत के कारण यहूदियों को अपने घर छोड़ने पर मजबूर होना पड़ रहा था।

इसी असुरक्षा के माहौल के बीच 1897 में ऑस्ट्रियाई पत्रकार थियोडोर हर्ज़ल Theodor Herzl ने 'ज़ायनवाद' (Zionism) आंदोलन की शुरुआत की। उनका मानना था कि जब तक यहूदियों का अपना कोई स्वतंत्र राष्ट्र नहीं होगा, तब तक वे दुनिया में कहीं भी सुरक्षित नहीं रह पाएंगे।

इस आंदोलन का मुख्य लक्ष्य यहूदियों को उनकी ऐतिहासिक भूमि (फिलिस्तीन) palestine में वापस बसाना था। और यहूदियों के लिए एक पूरी तरह से स्वतंत्र और अलग देश का निर्माण करना था।



2.  प्रथम विश्व युद्ध world war 1 (1914–1918)




प्रथम विश्व युद्ध से पहले Palestine क्षेत्र उस्मानिया साम्राज्य (Ottoman Empire) का हिस्सा था। लेकिन First World War युद्ध में उस्मानिया साम्राज्य OTTOMAN EMPIRE की हार के बाद, लीग ऑफ नेशंस (League of Nations) ने इस क्षेत्र का नियंत्रण ब्रिटेन britain को सौंप दिया, ब्रिटेन ने फिलिस्तीन का नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया।


उस ऐतिहासिक दौर में ब्रिटेन Britain दुनिया की सर्वोच्च महाशक्ति (Global Superpower) था। उसके पास अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़े और निर्णायक फैसले लेने की अचूक राजनैतिक और सैन्य क्षमता थी। ब्रिटिश सरकार द्वारा लिए गए निर्णयों का सीधा असर पूरी दुनिया के भू-राजनीतिक परिदृश्य पर पड़ता था।



3 . प्रथम विश्व युद्ध का ऐतिहासिक समझौता (1917)


प्रथम विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटेन को वित्तीय और राजनीतिक मोर्चे पर बड़े समर्थन की जरूरत थी। वह चाहता था कि अमेरिका और यूरोप का प्रभावशाली यहूदी समुदाय युद्ध में ब्रिटेन का साथ दे।

इसी उद्देश्य से 1917 में ब्रिटिश सरकार ने 'बाल्फोर घोषणा' (Balfour Declaration) जारी की। इसमें वादा किया गया कि यदि यहूदी समुदाय युद्ध में मित्र राष्ट्रों की मदद करता है, तो ब्रिटेन युद्ध जीतने के बाद फिलिस्तीन क्षेत्र में यहूदियों के लिए एक home land स्थापित करने में सहयोग करेगा।


युद्ध के बाद यह क्षेत्र ब्रिटिश नियंत्रण में आ गया, जिससे यहूदियों का वहां प्रवास बढ़ने लगा। इस दौरान दुनिया भर से यहूदियों का फिलिस्तीन आना और वहां बसना तेज़ी से बढ़ा। इसके कारण स्थानीय अरब निवासियों और यहूदियों के बीच हिंसक झड़पें होने लगीं।


द्वितीय विश्व युद्ध के समय स्थितियां पूरी तरह उलट चुकी थीं। ब्रिटेन ने यहूदियों की मदद करने के बजाय उनके लिए कड़े नियम बना दिए थे

नाजी जर्मनी द्वारा किए जा रहे यहूदी नरसंहार ( Holocaust ) के कारण यहूदी समुदाय के पास हिटलर Hitler के खिलाफ लड़ रहे ब्रिटेन का साथ देने के अलावा कोई और रास्ता नहीं था।




4. हिटलर का दौर और होलोकॉस्ट की त्रासदी Adolf Hitler and Holocaust (1933–1945)


यहूदियों के इतिहास का सबसे काला और निर्णायक अध्याय तब शुरू हुआ जब 1933 में जर्मनी की सत्ता एडॉल्फ हिटलर के हाथों में आई। नाजी शासन ने यहूदियों के खिलाफ अत्यंत क्रूर नीतियां अपनाईं।

द्वितीय विश्व युद्ध (1939-1945) के दौरान नाजियों ने सुनियोजित तरीके से लगभग 60 लाख  6 million यहूदियों का नरसंहार (Holocaust) कर दिया।



इस महाविपदा ने यहूदी समुदाय के उस डर को सच साबित कर दिया कि बिना अपनी संप्रभु सरकार और सेना के, उनका अस्तित्व हमेशा खतरे में रहेगा। इसके बाद एक अलग यहूदी देश की मांग केवल एक विचार न रहकर, उनके अस्तित्व की सबसे बड़ी जरूरत बन गई।

इस भयानक नरसंहार ने पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया। इसके बाद यहूदियों के इस तर्क को वैश्विक स्तर पर सही माना जाने लगा कि बिना अपने स्वतंत्र देश के यहूदी समुदाय दुनिया में कहीं भी सुरक्षित नहीं रह सकता।




यहूदियों ने अपने स्वतंत्र देश के लिए दुनिया के किसी अन्य हिस्से के बजाय फिलिस्तीन (Palestine) को ही क्यों चुना- 



इसके पीछे गहरे धार्मिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक कारण थे।


1. धार्मिक और आध्यात्मिक जुड़ाव (The Promised Land) -

 यहूदी धर्म के पवित्र ग्रंथ 'तोरह' (Torah) और हिब्रू बाइबिल के अनुसार, ईश्वर ने यह भूमि यहूदियों के पूर्वजों (अब्राहम, इसहाक और जैकब) को देने का वादा किया था। इसीलिए वे इसे "प्रॉमिस ड लैंड" (Promised Land) या पवित्र भूमि मानते हैं।

2 यरूशलम का महत्व - 

यहूदियों का सबसे पवित्र धार्मिक स्थल, यरूशलम (Jerusalem), इसी क्षेत्र में स्थित है। प्राचीन काल में राजा सुलेमान (King Solomon) द्वारा बनवाया गया पहला और दूसरा यहूदी मंदिर (Holy Temple) यहीं था, जिसकी बची हुई दीवार (Western Wall) आज भी यहूदियों के लिए सबसे पवित्र स्थान है।

3. ऐतिहासिक मातृभूमि (Ancestral Homeland) - 


 प्राचीन इतिहास: ईसा पूर्व (BC) के दौर में, इस क्षेत्र में 'इज़राइल' और 'जुडाह' नाम के यहूदी साम्राज्य फल-फूल रहे थे। यहूदियों का इतिहास, भाषा (हिब्रू) और संस्कृति इसी मिट्टी से पैदा हुई थी।



4 निर्वासन का दर्द - 

 रोमन साम्राज्य ने लगभग 2000 साल पहले यहूदियों को इस ज़मीन से खदेड़ दिया था, जिसके बाद वे पूरी दुनिया में बिखर गए (जिसे Diaspora कहा जाता है)। दुनिया के किसी भी कोने में रहने के बावजूद, यहूदी अपनी प्रार्थनाओं में हमेशा अपनी इस खोई हुई मातृभूमि में वापस लौटने की मन्नत मांगते थे।



3. जायनवाद आंदोलन का दृढ़ संकल्प - 

 जब 19वीं सदी के अंत में जायनवाद (Zionism) आंदोलन शुरू हुआ, तो शुरुआती दौर में ब्रिटिश सरकार ने यहूदियों को रहने के लिए पूर्वी अफ्रीका में 'युगांडा' (Uganda Scheme) और दक्षिण अमेरिका में 'अर्जेंटीना' जैसी जगहों का विकल्प भी दिया था।


लेकिन यहूदी नेताओं और आम जनता ने इन प्रस्तावों को पूरी तरह खारिज कर दिया। उनका मानना था कि यहूदियों को पूरी दुनिया से एकजुट करने के लिए केवल वही ज़मीन भावनात्मक और वैचारिक रूप से प्रेरित कर सकती है, जहाँ उनका गौरवशाली इतिहास और पूर्वज जुड़े थे।

संक्षेप में कहें तो, यहूदियों के लिए फिलिस्तीन सिर्फ एक ज़मीन का टुकड़ा नहीं था, बल्कि उनकी धार्मिक पहचान, पूर्वजों की विरासत और सदियों पुराना वह सपना था जिसे वे कभी भूल नहीं पाए थे।



️ विवाद की असली जड़ क्या है?



यरूशलेम (Jerusalem) सिर्फ यहूदियों के लिए ही नहीं, बल्कि दुनिया के तीन सबसे बड़े एकेश्वरवादी धर्मों (Monotheistic Religions) - यहूदी, ईसाई और इस्लाम - का सबसे पावन और केंद्रीय संगम स्थल है।







इस शहर की सबसे बड़ी संवेदनशीलता यह है कि ईसाइयों का पवित्र चर्च, यहूदियों का टेम्पल माउंट और मुसलमानों का अल-अक्सा परिसर सब एक-दूसरे से सटे हुए हैं। जब एक ही ज़मीन के टुकड़े से अरबों लोगों की धार्मिक और गहरी भावनाएं जुड़ी हों, तो उस पर किसी एक पक्ष का राजनीतिक दावा हमेशा एक बड़े अंतर्राष्ट्रीय विवाद का रूप ले लेता है।




यही कारण है कि इतिहास में इस शहर पर नियंत्रण के लिए सबसे ज़्यादा युद्ध लड़े गए हैं। इस शहर का 'ओल्ड सिटी' (Old City) इलाका मात्र 1 वर्ग किलोमीटर से भी छोटा है, लेकिन इसके अंदर तीनों धर्मों के सबसे पवित्र स्थल मौजूद हैं:



अल-अक्सा मस्जिद (Al-Aqsa Mosque) - मुस्लिम मान्यता के अनुसार, पैगंबर मोहम्मद साहब ने अपनी 'मेराज' (आसमान की पवित्र यात्रा) पर जाने से पहले इसी स्थान पर सभी पैगंबरों की नमाज़ का नेतृत्व किया था।



डोम ऑफ द रॉक (Dome of the Rock) - यह सुनहरे गुंबद वाली ऐतिहासिक इमारत भी इसी परिसर में है, जिसे 'हरम अल-शरीफ' (Noble Sanctuary) कहा जाता है। शुरुआती दौर में मुस्लिम इसी दिशा (किबला) की तरफ मुँह करके नमाज़ पढ़ा करते थे।




ईसाई धर्म (Christianity) के लिए महत्व

ईसाई धर्म के लिए यह शहर ईसा मसीह (Jesus Christ) के जीवन, उनके चमत्कारों, उनके बलिदान और पुनरुत्थान (Resurrection) का मुख्य गवाह है.

चर्च ऑफ द होली सेपल्कर (Church of the Holy Sepulchre): यह ईसाइयों का सबसे पवित्र चर्च माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी स्थान पर ईसा मसीह को सूली (Crucifixion) पर चढ़ाया गया था, यहीं उनका मकबरा है और यहीं वे दोबारा जीवित (Resurrection) हुए थे.


वाया डोलोरोसा (Via Dolorosa): इसे 'दुखों का रास्ता' कहा जाता है। माना जाता है कि ईसा मसीह सूली पर चढ़ाए जाने से पहले अपना क्रूस उठाकर इसी रास्ते से गुज़रे थे। दुनिया भर के ईसाई इस रास्ते पर तीर्थयात्रा करने आते हैं।



यहूदी धर्म (Judaism) के लिए महत्व -




यहूदियों के लिए यह शहर उनकी आध्यात्मिक और राजनीतिक पहचान का सबसे प्राचीन केंद्र है.

· टेम्पल माउंट (Temple Mount): यहूदी इसे अपनी दुनिया का सबसे पवित्र स्थान मानते हैं. उनका मानना है कि राजा सुलेमान (King Solomon) द्वारा बनाया गया पहला और दूसरा यहूदी मंदिर (Holy Temple) इसी पहाड़ी पर स्थित था, जिसे बाद में नष्ट कर दिया गया था.

· पश्चिमी दीवार (Western Wall / Wailing Wall): यह उस प्राचीन यहूदी मंदिर के परिसर की बची हुई आखिरी बाहरी दीवार है. आज दुनिया भर के यहूदी इसी दीवार के सामने आकर प्रार्थना करते हैं और रोकर अपनी मन्नतें मांगते हैं (इसीलिए इसे वेलिंग वॉल भी कहा जाता है).


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1. इस्राइल राष्ट्र की स्थापना (1948)



1947 की संयुक्त राष्ट्र (UN) विभाजन योजना -

द्वितीय विश्व युद्ध समाप्त होने के बाद, होलोकॉस्ट की भयावहता को देखकर संयुक्त राष्ट्र ने इस ज़मीन को दो अलग-अलग हिस्सों एक यहूदी राज्य और एक अरब राज्य में बांटने का प्रस्ताव रखा। जेरूसलम को एक अंतरराष्ट्रीय शहर घोषित किया गया। 

यहूदी नेताओं ने इस योजना को स्वीकार कर लिया, लेकिन अरब नेताओं ने इसे खारिज कर दिया। उनका मानना था कि यह स्थानीय बहुसंख्यक आबादी के अधिकारों के खिलाफ है।


आखिरकार, 14 मई 1948 को इस्राइल एक स्वतंत्र देश के रूप में अस्तित्व में आया।








19वीं सदी की शुरुआत में वहां यहूदियों की संख्या बहुत कम थी, लेकिन सदी के अंत तक इसमें बदलाव आने लगा.

19वीं सदी के अंत में जब यहूदियों ने बड़े पैमाने पर फिलिस्तीन लौटना शुरू किया जिसे हिब्रू में 'अलियाह' (मातृभूमि की ओर वापसी) कहा जाता है। तब वहां की जनसांख्यिकी (Demographics) आज के मुकाबले बिल्कुल अलग थी।

कुल आबादी का लगभग 80% से 85% हिस्सा स्थानीय अरब मुसलमानों का था, जो मुख्य रूप से खेती, व्यापार और पशुपालन से जुड़े थे। लगभग 10% से 11% आबादी स्थानीय ईसाइयों की थी, जो मुख्य रूप से यरूशलम, बेथलेहम और नाज़रेथ जैसे ऐतिहासिक शहरों में रहते थे।


शुरुआती स्थिति (1800-1880): इस क्षेत्र में केवल 5% से 7% यहूदी रहते थे। इन्हें 'ओल्ड यिशुव' (Old Yishuv) कहा जाता था। ये बेहद धार्मिक लोग थे जो यरूशलम, सफ़ेद, तिबेरियास और हेब्रोन जैसे पवित्र शहरों में रहते थे और पढ़ाई व प्रार्थना में लीन रहते थे।


 पलायन के बाद बदलाव (1882 के बाद): जब यूरोप में यहूदियों पर अत्याचार बढ़े, तो जायनवादी आंदोलन के तहत यहूदी वहां पहुंचने लगे। 1882 से 1903 के बीच लगभग 25,000 से 35,000 नए यहूदी वहां पहुंचे.


जर्मनी की सत्ता में एडॉल्फ हिटलर के आने के बाद यहूदियों पर भयानक अत्याचार शुरू हुए। अपनी जान बचाने के लिए मात्र छह वर्षों (1933–1939) में 2.5 लाख से अधिक यहूदी फिलिस्तीन पहुंचे, जिनमें वैज्ञानिक, डॉक्टर और बुद्धिजीवी शामिल थे।

अवैध आव्रजन (1939–1948): द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जब ब्रिटेन ने अरबों के विरोध के डर से यहूदियों के आने पर कानूनी रोक लगा दी, तब भी लाखों शरणार्थी गुप्त समुद्री रास्तों से यहाँ पहुंचते रहे।

1948 आजादी के समय यहूदियों की संख्या करीब 6,50,000 हो गई, जो कुल आबादी का एक-तिहाई (33%) हिस्सा थी।

14 मई 1948 को इज़राइल के गठन के तुरंत बाद, नए देश ने दुनिया भर के यहूदियों के लिए नागरिकता के दरवाजे खोल दिए। इसके परिणामस्वरूप, अगले 4 सालों के भीतर 7 लाख से अधिक नए यहूदी वहां पहुंचे, जिससे वे अपनी भूमि पर बहुसंख्यक (Majority) बन गए।

अरब देशों ने ब्रिटेन पर आरोप लगाया कि वह फिलिस्तीन में यहूदियों के लिए एक home land स्थापित करने में मदद कर रहा है


1948 में इसराइल की आज़ादी और 'नकबा' (Nakba) -






मई 1948 में जैसे ही ब्रिटिश सेना वहां से हटी, यहूदी नेताओं ने इसराइल की आज़ादी की घोषणा कर दी। इसके तुरंत बाद, पड़ोसी अरब देशों ने इसराइल पर हमला कर दिया।

इस युद्ध में इसराइल की जीत हुई और उसने संयुक्त राष्ट्र द्वारा तय की गई सीमाओं से भी ज़्यादा ज़मीन पर कब्ज़ा कर लिया।


केवल 1 दिन पुराना इसराइल फिर जीता कैसे?
 

सिर्फ एक दिन पहले आधिकारिक देश बनने के बावजूद इसराइल के जीतने के पीछे कुछ प्रमुख सैन्य और रणनीतिक कारण थे:


अमेरिका के राष्ट्रपति हैरी ट्रूमैन ने इसराइल की आज़ादी की घोषणा के मात्र 11 मिनट बाद ही उसे एक नए देश के रूप में मान्यता दे दी थी। यह एक बहुत बड़ा नैतिक और कूटनीतिक समर्थन था।

अमेरिका ने 1948 के युद्ध में ने पूरे मध्य पूर्व (Middle East) पर हथियारों का प्रतिबंध (Arms Embargo) लगा रखा था.

इसराइल की सैन्य जीत के पीछे असल में फ्रांस america, Britain से ज़्यादा चेकोस्लोवाकिया (Czechoslovakia) का हाथ था।

 युद्ध की शुरुआत में इसराइल के पास भारी हथियारों की बहुत कमी थी। लेकिन जून 1948 में जब संयुक्त राष्ट्र (UN) ने कुछ हफ़्तों का युद्धविराम (Ceasefire) कराया, तब इसराइल ने सोवियत संघ (Soviet Union) की गुप्त मंज़ूरी से चेकोस्लोवाकिया से भारी मात्रा में राइफलें, मशीन गन, गोला-बारूद और यहाँ तक कि लड़ाकू विमान (Messerschmitt) खरीदे।


 फ्रांस ने इस दौरान कुछ हद तक इसराइल को हथियार लाने के लिए अपने बंदरगाहों का इस्तेमाल करने की छूट ज़रूर दी थी, लेकिन असल गुप्त सैन्य मदद कम्युनिस्ट ब्लॉक (चेकोस्लोवाकिया) से आई थी।


पहले से तैयार सेना- हज़ारों यहूदी सैनिक द्वितीय विश्व युद्ध (World War II) में ब्रिटिश सेना की तरफ से नाज़ियों के खिलाफ लड़ चुके थे, इसलिए वे बेहद अनुभवी थे।



अस्तित्व की लड़ाई (Survival Instinct) - इसराइली सैनिकों के लिए यह "करो या मरो" की स्थिति थी। उनका मानना था कि अगर वे यह युद्ध हार गए, तो उनका नया देश और उनका अस्तित्व हमेशा के लिए मिट जाएगा।


युद्ध की शुरुआत में अरब सेनाएं भारी थीं, लेकिन जैसे-जैसे युद्ध खिंचा, इसराइल ने दुनिया भर से आए यहूदी प्रवासियों को सेना में भर्ती किया। युद्ध के आखिरी हफ़्तों में इसराइली सैनिकों की संख्या अरब सैनिकों से कहीं अधिक हो गई थी।



Palestine refuse crisis









सन 1948 के युद्ध जिसे फिलिस्तीनियों के लिए इस दौर को 'नकबा' (Nakba - विनाश या तबाही) कहा जाता है. संघर्षों के कारण लाखों फ़िलिस्तीनी नागरिकों को अपनी ज़मीन और घर छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा। इस दौरान 7 लाख से अधिक फिलिस्तीनियों को अपने घरों से भागना पड़ा या उन्हें निकाल दिया गया,


आज इन शरणार्थियों और उनकी अगली पीढ़ियों की संख्या लगभग 59 लाख तक पहुंच चुकी है, जो पड़ोसी अरब देशों के अस्थाई कैंपों में बेहद कठिन परिस्थितियों में जीवन बिता रहे हैं।


1948 के इसी युद्ध के बाद से यहूदियों (Jews) और अरबों (Arabs) के बीच का यह संघर्ष सिर्फ एक राजनीतिक विवाद नहीं रहा, बल्कि यह दुनिया का सबसे लंबा चलने वाला ज़मीनी और क्षेत्रीय विवाद (Area Conflict) बन गया।


यहूदी पक्ष - उनका मानना है कि यह उनकी प्राचीन ऐतिहासिक और धार्मिक मातृभूमि (Biblical Homeland) है, जहाँ से उन्हें सदियों पहले खदेड़ दिया गया था।


अरब (फ़िलिस्तीनी) पक्ष: उनका तर्क है कि वे और उनके पूर्वज सदियों से लगातार इस ज़मीन पर रह रहे थे, इसलिए इस पर उनका प्राकृतिक और पैतृक अधिकार है।




आने वाले दशकों में कई बड़े युद्धों के कारण इस क्षेत्र का नक्शा और राजनीति पूरी तरह बदल गई-

1967 का छह दिवसीय युद्ध (Six-Day War) आधुनिक मध्य पूर्व (Middle East) के इतिहास की सबसे निर्णायक घटनाओं में से एक है। यह युद्ध 5 जून से 10 जून 1967 के बीच केवल 6 दिनों तक चला, लेकिन इसने पूरे क्षेत्र का राजनीतिक और भौगोलिक नक्शा हमेशा के लिए बदल दिया।



यह युद्ध एक तरफ इसराइल और दूसरी तरफ उसके पड़ोसी अरब देशों—मिस्र (Egypt), जॉर्डन (Jordan) और सीरिया (Syria) के गठबंधन के बीच लड़ा गया था।


मिस्र के राष्ट्रपति गमाल अब्देल नासिर ने इसराइल को मिटाने और अरब देशों की एकजुटता का नारा दिया। मिस्र ने संयुक्त राष्ट्र (UN) के शांति सैनिकों को सिनाई प्रायद्वीप से हटाकर वहाँ अपनी भारी सेना और टैंक तैनात कर दिए।

मिस्र ने इसराइली जहाजों के लिए 'स्ट्रेट्स ऑफ तीरन' (Straits of Tiran) को बंद कर दिया, जिससे इसराइल का लाल सागर (Red Sea) से व्यापार पूरी तरह ठप हो गया। इसराइल ने इसे अंतरराष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन और युद्ध की शुरुआत माना।

इसराइल का अचानक हमला (Pre-emptive Strike): 5 जून 1967 की सुबह, इसराइल ने अपनी सुरक्षा को खतरे में देख 'ऑपरेशन फोकस' शुरू किया। इसराइली वायुसेना ने एक साथ अचानक हमला करके मिस्र, सीरिया और जॉर्डन के लड़ाकू विमानों को जमीन पर ही (रनवे पर) तबाह कर दिया।


पहले ही दिन अरब देशों की वायुसेना पूरी तरह पंगु हो गई, जिससे इसराइली थल सेना को जमीन पर आगे बढ़ने में बहुत आसानी हुई। केवल 6 दिनों के भीतर इसराइल ने तीनों मोर्चों पर अरब सेनाओं को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया।

इस युद्ध में इसराइल की एकतरफा जीत हुई और उसने अपने मूल आकार से लगभग तीन गुना बड़े क्षेत्र पर कब्जा कर लिया. इसराइल ने पूरे सिनाई प्रायद्वीप (Sinai Peninsula) और गाज़ा पट्टी (Gaza Strip) पर कब्जा कर लिया।


इसराइल ने वेस्ट बैंक (West Bank) और सबसे महत्वपूर्ण, पूर्वी यरूशलेम (East Jerusalem) को अपने नियंत्रण में ले लिया (जिसमें अल-अक्सा मस्जिद और पश्चिमी दीवार जैसे पवित्र स्थल शामिल हैं)।
सामरिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण पहाड़ी इलाके गोलांस हाइट्स (Golan Heights) पर कब्जा कर लिया'




इसके बाद लाखों फिलिस्तीनी इसराइली सैन्य नियंत्रण (military occupation) के तहत आ गए। वेस्ट बैंक और गाज़ा से लगभग 3 से 4 लाख फ़िलिस्तीनी अरबों को एक बार फिर विस्थापित होना पड़ा और वे पड़ोसी देशों में शरणार्थी बन गए।



आज के संघर्ष की जड़



आज के समय में इसराइल और फ़िलिस्तीन के बीच जिस 'अधिकृत क्षेत्र' (Occupied Territories) को लेकर मुख्य विवाद है—यानी वेस्ट बैंक, गाज़ा और पूर्वी यरूशलेम—वह सब इसी 1967 के युद्ध के बाद से इसराइल के प्रशासनिक या सैन्य नियंत्रण में आए।

युद्ध के बाद यूएन ने 'Land for Peace' (शांति के बदले ज़मीन) का सिद्धांत दिया, जिसके तहत इसराइल को जीते हुए इलाके खाली करने थे और अरब देशों को इसराइल के अस्तित्व को स्वीकार करना था, लेकिन यह पूरी तरह लागू नहीं हो सका।


ओस्लो समझौता (1993): इसराइल और फिलिस्तीन मुक्ति संगठन (PLO) के बीच शांति समझौते पर हस्ताक्षर होने से शांति की उम्मीद जगी थी। इसके तहत वेस्ट बैंक और गाज़ा के कुछ हिस्सों में सीमित स्वशासन देने के लिए फिलिस्तीनी प्राधिकरण (Palestinian Authority - PA) का गठन किया गया। लेकिन बाद में राजनीतिक हत्याओं, हिंसा और इसराइली बस्तियों के लगातार विस्तार के कारण यह शांति प्रक्रिया पूरी तरह विफल हो गई।



गाज़ा की नाकाबंदी (2007-वर्तमान): इसराइल ने 2005 में गाज़ा पट्टी से अपनी सेना और बस्तियों को हटा लिया था। इसके बाद 2006 के चुनावों में चरमपंथी संगठन हमास (Hamas) की जीत हुई और 2007 तक उसने फिलिस्तीनी प्राधिकरण को हटाकर गाज़ा पर पूरी तरह कब्ज़ा कर लिया।


हमास को रोकने के लिए इसराइल और मिस्र ने गाज़ा की ज़मीनी, हवाई और समुद्री सीमाओं की सख्त नाकाबंदी कर दी, जिससे गाज़ा की अर्थव्यवस्था पूरी तरह तबाह हो गई।



शांति वार्ताओं के बार-बार असफल होने के पीछे सबसे बड़े मुद्दे हैं:




फिलिस्तीन वेस्ट बैंक और गाज़ा पट्टी को मिलाकर एक स्वतंत्र और संप्रभु फिलिस्तीन देश चाहते हैं। पूर्वी जेरूसलम को अपने भविष्य के स्वतंत्र देश की राजधानी बनाना चाहते हैं, जहां अल-अक्सा मस्जिद स्थित है। वेस्ट बैंक में बनी सभी इसराइली बस्तियों को हटाने की मांग करते हैं, जिन्हें अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत अवैध माना जाता है।

1948 और 1967 के युद्धों में विस्थापित हुए लाखों फिलिस्तीनी शरणार्थियों को अपने पुराने घरों में लौटने का हक (Right of Return) मिले। अपनी सीमाओं, हवाई क्षेत्र और समुद्र पर पूरा नियंत्रण चाहते हैं। उनका कहना है कि सैन्य घेरेबंदी में वास्तविक आज़ादी मुमकिन नहीं है।



वही  इसराइल सुरक्षा कारणों का हवाला देता है और वेस्ट बैंक (यहूदी इतिहास में जूडिया और सामरिया) पर अपने ऐतिहासिक अधिकार का दावा करता है। इसराइल पूरे जेरूसलम शहर को अपनी 'अविभाजित और शाश्वत' राजधानी मानता है। इसराइल West Bank बस्तियों को हटाने का विरोध करता है और बस्तियों को हमेशा के लिए अपने देश का हिस्सा मानता है।

  युद्धों में विस्थापित हुए लाखों फिलिस्तीनी शरणार्थियों को अपने पुराने घरों में लौटने  को इसराइल इसे पूरी तरह खारिज करता है। उसका मानना है कि लाखों फिलिस्तीनियों के आने से इसराइल में यहूदी बहुसंख्या खत्म हो जाएगी और यहूदी देश के रूप में उसकी पहचान मिट जाएगी। आतंकवाद और हथियारों की तस्करी को रोकने के लिए फिलिस्तीनी क्षेत्रों की सीमाओं और हवाई क्षेत्र पर अपना सैन्य नियंत्रण बनाए रखना चाहता है।



1948 से लेकर अब तक (वर्ष 2026) इस ऐतिहासिक संघर्ष में दोनों पक्षों को मिलाकर कुल 1.85 लाख (185,000) से अधिक लोगों की जान जा चुकी है। इस कुल संख्या में सबसे बड़ा नुकसान फिलिस्तीनी नागरिकों का हुआ है।



 कुल फिलिस्तीनी और अरब मौतें: 1,65,000 से अधिक (इनमें गाजा, वेस्ट बैंक और शरणार्थी शिविरों में सैन्य अभियानों के दौरान मारे गए लोग शामिल हैं)।

 कुल इजरायली और यहूदी मौतें: 18,000 से 20,000 के बीच (इनमें विभिन्न युद्धों में मारे गए सैनिक और नागरिक हमलों का शिकार हुए आम लोग शामिल हैं)



4. वर्तमान स्थिति क्या है?


 
7 अक्टूबर 2023 को हमास द्वारा किए गए हमलों और उसके बाद शुरू हुए भीषण युद्ध ने इस पूरे विवाद के समीकरण को बदल कर रख दिया है। जान-माल के भारी नुकसान और तबाही ने इस क्षेत्र में एक बेहद अस्थिर माहौल बना दिया है।

· अमेरिका का प्रस्ताव है कि इसराइली सेना के हटने के बाद वहां एक अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा बल (ISF) तैनात किया जाए।

· लेकिन इसराइल का साफ कहना है कि जब तक हमास पूरी तरह अपने हथियार नहीं डाल देता, वह गाज़ा से नहीं हटेगा।

·दूसरी तरफ, हमास की मांग है कि हथियार डालने से पहले इसराइली सेना गाज़ा से पूरी तरह बाहर निकले।




क्या कभी शांति संभव है?




इसराइल-फिलिस्तीन विवाद आज के समय में बेहद जटिल हो चुका है। दुनिया के अधिकांश देश फिलिस्तीन संकट के समाधान के लिए 'टू-स्टेट सॉल्यूशन' (Two-State Solution) का पुरजोर समर्थन करते हैं। जिसके तहत इसराइल के बगल में एक स्वतंत्र फिलिस्तीन देश बनाने की बात कही जाती है.


संयुक्त राष्ट्र (UN) आधिकारिक तौर पर टू-स्टेट सॉल्यूशन को ही एकमात्र वैध मार्ग मानता है। अमेरिका, यूरोपीय संघ (EU), रूस और चीन सभी इस नीति का समर्थन करते हैं।

भारत का रुख: भारत शुरुआत से ही एक स्वतंत्र, संप्रभु और व्यवहार्य फिलिस्तीन राज्य के निर्माण का समर्थन करता आया है, जो इजरायल के साथ शांति से रह सके।


वहीं 'एक-राज्य समाधान' (एक ही देश जिसमें दोनों को बराबर अधिकार मिले) को दोनों पक्षों के कट्टरपंथी स्वीकार नहीं करते क्योंकि इससे दोनों अपनी राष्ट्रीय पहचान खोने से डरते हैं।

जब तक अंतरराष्ट्रीय कूटनीति इसराइल की सुरक्षा चिंताओं और फिलिस्तीन की आज़ादी की मांग के बीच का रास्ता नहीं ढूंढ लेती, तब तक इस क्षेत्र में स्थिरता आना बेहद कठिन है।


यहूदी समुदाय के लिए यह टकराव केवल एक क्षेत्रीय विवाद नहीं है, बल्कि यह उनके ऐतिहासिक अस्तित्व, राष्ट्रीय सुरक्षा और अपनी प्राचीन पैतृक मातृभूमि पर बने रहने की अनिवार्य लड़ाई है।



फिलिस्तीनी दृष्टिकोण (Palestinian Perspective) से फिलिस्तीन का इतिहास, संघर्ष और उनकी मांगें न्याय, आत्मनिर्णय (Self-determination) और अपनी मातृभूमि पर अधिकार की लड़ाई है।

फिलिस्तीनी आज भी इसे एक खुला घाव मानते हैं और संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव 194 के तहत अपने "वापसी के अधिकार" (Right of Return) की मांग करते हैं, ताकि शरणार्थी अपनी पैतृक भूमि पर लौट सकें।


इन तमाम राजनीतिक चालों, कूटनीतिक बैठकों, आधुनिक हथियारों और नक्शों पर खींची जाने वाली सीमाओं के बीच सबसे बड़ा और कड़वा सच यह है कि किसी भी युद्ध की असल कीमत वहां के आम बेगुनाह लोग ही चुकाते हैं। महाशक्तियों की महत्वाकांक्षाओं और भू-राजनीतिक वर्चस्व की वेदी पर हमेशा आम नागरिकों का जीवन और उनका भविष्य ही बलि चढ़ता है।

फिलीस्तीन के मशहूर कवि महमूद दरविश ने युद्ध की इसी विडंबना को बहुत गहरे शब्दों में बयां किया.
"युद्ध समाप्त हो जाएगा। नेता आपस में हाथ मिला लेंगे। लेकिन वह बूढ़ी मां अपने शहीद बेटे का इंतजार करती रहेगी। वह लड़की अपने प्यारे पति का रास्ता देखती रहेगी। और वे बच्चे अपने बहादुर पिता की राह तकते रहेंगे। मैं नहीं जानता कि हमारा वतन किसने बेचा, लेकिन मैंने यह साफ देखा कि उसकी असल कीमत किसने चुकाई।"

 


"The war will end. The leaders will shake hands. The old woman will keep waiting for her martyred son. The girl will wait for her beloved husband. And those children will wait for their heroic father. I don’t know who sold our homeland but I saw who paid the price."
Mahmoud Darwish

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