आखिर क्यों खत्म नहीं हो रही Russia-Ukraine जंग ? Did America and NATO fail to stop Russia?
आखिर क्यों खत्म नहीं हो रही Russia-Ukraine जंग ? क्या रूस को रोकने में नाकाम रहा अमेरिका और नाटो? Did America and NATO fail to stop Russia?
यह केवल सीमाओं का विवाद नहीं है, बल्कि इसमें वैश्विक राजनीति, सुरक्षा, ऊर्जा आपूर्ति, अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय शक्ति संतुलन जैसे कई बड़े मुद्दे जुड़े हुए हैं। इस युद्ध ने दुनिया भर में महंगाई, ऊर्जा संकट और सुरक्षा चिंताओं को बढ़ा दिया है.
साथ ही रूस-यूक्रेन युद्ध ने पारंपरिक सैन्य रणनीतियों को पूरी तरह बदल दिया है।
इस संकट को गहराई से समझने के लिए इसके ऐतिहासिक Historical reason कारणों, 2022 के आक्रमण और वर्तमान समय (2026) तक इसके वैश्विक प्रभावों का विश्लेषण करना आवश्यक है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि (2022 से पहले का सफर) historical relation of of Russia and Ukrain
यह संघर्ष अचानक शुरू नहीं हुआ, बल्कि इसके पीछे दशकों पुरानी राजनीतिक खींचतान और इतिहास है। साल 1991 में जब सोवियत संघ (USSR) का विघटन हुआ, तो वह 15 स्वतंत्र संप्रभु देशों में विभाजित हो गया। जिसमें यूक्रेन भी शामिल था। इन 15 देशों में रूस के बाद यूक्रेन क्षेत्रफल, संसाधनों और आबादी के लिहाज से दूसरा सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण देश था।
हालांकि, Russia हमेशा Ukraine को अपने प्रभाव क्षेत्र का हिस्सा मानता रहा। भौगोलिक रूप से यूक्रेन, पश्चिमी यूरोप और रूस के बीच में स्थित था, जिससे यह दोनों महाशक्तियों के बीच प्रभाव जमाने का केंद्र बन गया।
हालांकि, Russia हमेशा Ukraine को अपने प्रभाव क्षेत्र का हिस्सा मानता रहा। भौगोलिक रूप से यूक्रेन, पश्चिमी यूरोप और रूस के बीच में स्थित था, जिससे यह दोनों महाशक्तियों के बीच प्रभाव जमाने का केंद्र बन गया।
परमाणु हथियारों का त्याग और बुडापेस्ट मेमोरेंडम (The Nuclear Disarmament)
साल 1991 में सोवियत संघ (USSR) के विघटन के बाद, यूक्रेन को विरासत में दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा परमाणु हथियारों का जखीरा मिला था, जिसमें करीब 1,900 रणनीतिक परमाणु हथियार शामिल थे। यूक्रेन रातों-रात दुनिया की एक बड़ी परमाणु शक्ति बन गया था। हालांकि, साल 1994 में अमेरिका और ब्रिटेन की मध्यस्थता से एक ऐतिहासिक समझौता हुआ, जिसे 'बुडापेस्ट मेमोरेंडम' (Budapest Memorandum) कहा जाता है।
इस संधि के तहत, यूक्रेन ने इस शर्त पर अपने सभी परमाणु हथियार रूस को सौंप दिए और परमाणु अप्रसार संधि (NPT) पर हस्ताक्षर किए कि अमेरिका, ब्रिटेन और स्वयं रूस उसकी राष्ट्रीय संप्रभुता, स्वतंत्रता और मौजूदा सीमाओं का सम्मान करेंगे और उसकी सुरक्षा की गारंटी देंगे।
आज के परिदृश्य में यह समझौता इतिहास की सबसे बड़ी कूटनीतिक चूकों में से एक माना जाता है, क्योंकि जिन शक्तियों ने यूक्रेन की सीमाओं की रक्षा का वादा किया था, उनमें से एक (रूस) ने खुद उसकी संप्रभुता पर हमला कर दिया और यूक्रेन के पास अपनी रक्षा के लिए कोई परमाणु निवारक (Nuclear Deterrent) नहीं बचा।
साल 1991 में सोवियत संघ के पतन के बाद, जैसे-जैसे समय बीतता गया, यूक्रेन की भू-राजनीतिक (geopolitical) पहचान में एक बहुत बड़ा बदलाव आया। यूक्रेन धीरे-धीरे मॉस्को के प्रभाव से दूर होने लगा और उसका झुकाव पश्चिमी यूरोप की ओर बढ़ता गया। इस बदलाव की मुख्य वजह यूक्रेन की नई पीढ़ी थी, जो अपने देश के भविष्य को पश्चिमी लोकतांत्रिक मूल्यों, आर्थिक पारदर्शिता और आधुनिक संस्थानों के साथ जोड़कर देखती थी।
Ukraine ने यूरोप और पश्चिमी देशों के साथ अपने संबंध मजबूत करने शुरू किए, जिससे Moscow की चिंताएँ बढ़ने लगीं। Russia को विशेष रूप से NATO के विस्तार से खतरा महसूस हुआ। Kremlin का मानना था कि यदि Ukraine NATO के करीब जाता है, तो यह Russia की सुरक्षा के लिए चुनौती बन सकता है।
Russia को डर था कि अगर Ukraine NATO में शामिल हो जाता है, तो NATO की सैन्य ताकत उसकी सीमा तक पहुंच जाएगी। यही कारण था कि Moscow लगातार Ukraine को NATO से दूर रहने की चेतावनी देता रहा.
2013–14 Ukraine में हुए प्रदर्शन -
2013–14 के दौरान Ukraine में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए। जनता यूरोपीय देशों के साथ बेहतर संबंध चाहती थी, लेकिन तत्कालीन सरकार ने Russia के पक्ष में फैसला लिया।
साल 2013-2014 में यह तनाव चरम पर पहुंच गया जब यूक्रेन में 'यूरोमैदान आंदोलन' (Euromaidan protests) शुरू हुआ। यूक्रेन के तत्कालीन राष्ट्रपति विक्टर यानूकोविच ने यूरोपीय संघ (EU) के साथ एक समझौते को खारिज कर रूस के साथ हाथ मिला लिया।
इसके विरोध में जनता सड़कों पर उतर आई और अंततः उन्हें सत्ता छोड़नी पड़ी।
इससे नाराज होकर रूस ने मार्च 2014 में यूक्रेन के 'क्रीमिया' (Crimea) प्रायद्वीप पर सैन्य नियंत्रण कर उसे अपने देश में मिला लिया। बाद में वहां जनमत संग्रह कराया गया और Russia ने उसे अपने देश का हिस्सा घोषित कर दिया। कई पश्चिमी देशों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने इस कदम को अवैध बताया।
इसके साथ ही, पूर्वी यूक्रेन के डोनबास क्षेत्र (डोनेट्स्क और लुहान्स्क) में रूस समर्थित अलगाववादियों और यूक्रेनी सेना के बीच युद्ध छिड़ गया। 2014 से 2022 के बीच इस छिटपुट लड़ाई में 14,000 से अधिक लोग मारे गए, जिसने बड़े युद्ध की नींव रखी।
ऐतिहासिक रूप से, रूसी सीमा से लगे यूक्रेन के पूर्वी और दक्षिणी इलाकों—जैसे डोनबास (डोनेट्स्क और लुहान्स्क), खार्किव और क्रीमिया प्रायद्वीप—के नागरिक खुद को सांस्कृतिक और मानसिक रूप से यूक्रेन से ज़्यादा रूस के करीब मानते थे.
2022 का आक्रमण और पूर्ण-स्तरीय युद्ध की शुरुआत Russian full scale war on ukrain-
साल 2021 के अंत में, रूस ने यूक्रेन की सीमाओं पर भारी संख्या में सेना तैनात कर दी। रूस की मुख्य मांग यह थी कि यूक्रेन को कभी भी नाटो (NATO) सैन्य गठबंधन में शामिल न किया जाए। पश्चिमी देशों और नाटो ने इस मांग को खारिज कर दिया।
24 फरवरी 2022 को, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने एक "विशेष सैन्य अभियान" (special military operation) की घोषणा की और यूक्रेन पर तीन तरफ से हमला कर दिया। रूस का दावा था कि वह यूक्रेन का "असैन्यीकरण" करना चाहता है, जिसे अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने खारिज कर दिया।
युद्ध के प्रमुख चरण Kyiv की लड़ाई युद्ध के शुरुआती महीनों में Russia ने Kyiv की ओर तेजी से बढ़ने की कोशिश की। लेकिन Ukraine ने मजबूत रक्षा करते हुए Russian सेना को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। Mariupol और पूर्वी Ukraine दक्षिण और पूर्वी Ukraine में भीषण लड़ाई देखने को मिली। Mariupol शहर युद्ध का बड़ा केंद्र बना, जहाँ कई महीनों तक संघर्ष जारी रहा। इस दौरान शहर का बड़ा हिस्सा नष्ट हो गया।
Drone और आधुनिक तकनीक का उपयोग यह युद्ध आधुनिक सैन्य तकनीकों के उपयोग के लिए भी जाना जाता है। दोनों देशों ने drones, satellite intelligence, cyber attacks और long-range missiles का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया।
NATO और पश्चिमी देशों की भूमिका -
रूस-यूक्रेन संघर्ष की सबसे बड़ी रणनीतिक विशेषता यह रही है कि अमेरिका और यूरोपीय देशों (NATO) ने इस युद्ध में अपनी सेना सीधे उतारने (Direct Military Intervention) के बजाय यूक्रेन को हथियारों, खुफिया जानकारी और असीमित वित्तीय सहायता (Arms and Money) देने की नीति अपनाई।
America और यूरोपीय देशों ने Ukraine को आर्थिक और सैन्य सहायता प्रदान की। इसमें advanced missile systems, air defense systems, tanks, ammunition और intelligence support शामिल रहे। दूसरी ओर, Russia ने बार-बार आरोप लगाया कि पश्चिमी देश इस युद्ध को अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ावा दे रहे हैं।
नाटो (NATO) के सबसे महत्वपूर्ण और बुनियादी नियमों में से एक है, यदि कोई देश वर्तमान में किसी युद्ध या क्षेत्रीय विवाद (Territorial Dispute) में फंसा हुआ है, तो वह नाटो का सदस्य नहीं बन सकता.
दूसरी ओर, रूस ने मिसाइलों और ड्रोन हमलों के जरिए यूक्रेन के बिजली ग्रिड और बंदरगाहों (ports) को भारी नुकसान पहुंचाया है, जिससे यूक्रेन में ऊर्जा संकट और आर्थिक तबाही गहरा गई है।
economical section on Russia पर आर्थिक प्रतिबंध
युद्ध शुरू होने के बाद कई देशों ने Russia पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाए। इनमें banking restrictions, technology export ban और Russian assets को freeze करना शामिल था। हालांकि, Russia ने Asia और अन्य देशों के साथ व्यापार बढ़ाकर अपनी अर्थव्यवस्था को स्थिर रखने की कोशिश की
खाद्य संकट -----Ukraine और Russia दोनों गेहूं तथा अन्य अनाज के बड़े exporters हैं। युद्ध के कारण कई देशों में खाद्य आपूर्ति प्रभावित हुई, जिससे महंगाई बढ़ी।
Cyber Warfare ------इस संघर्ष में cyber attacks और digital propaganda का भी व्यापक उपयोग हुआ। Social media platforms पर misinformation campaigns और hacking incidents लगातार बढ़े।
मानवीय संकट शरणार्थियों की समस्या -
इस युद्ध की सबसे बड़ी कीमत आम इंसानों ने चुकाई है। संयुक्त राष्ट्र (UN) के अनुसार, हजारों नागरिक इस युद्ध में मारे जा चुके हैं और वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक हो सकती है। दोनों पक्षों के लाखों सैनिक घायल या मारे गए हैं। इसके अतिरिक्त, लाखों यूक्रेनी नागरिक अपने ही देश में विस्थापित हो चुके हैं या दूसरे देशों में शरणार्थी (refugees) के रूप में रह रहे हैं।
थका देने वाला युद्ध और युद्ध रणनीति में बदलाव (2023–2026)
शुरुआती दौर के बाद, अब यह युद्ध एक 'पोज़ीशनल वॉर' (positional warfare) यानी एक ही जगह पर टिक कर लड़े जाने वाले युद्ध में बदल चुका है, जहाँ दोनों पक्षों को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है।
युद्ध लंबा खिंचने के कारण दोनों देशों को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है। हजारों सैनिक और नागरिक मारे जा चुके हैं जबकि कई शहर बुरी तरह तबाह हो चुके हैं
इस युद्ध ने नाटो गठबंधन को नया जीवन दे दिया। दशकों तक न्यूट्रल (तटस्थ) रहने वाले देश फिनलैंड और स्वीडन भी सुरक्षा कारणों से नाटो के सदस्य बन गए हैं। इसके साथ ही दुनिया भर के देशों ने अपने रक्षा बजट में भारी बढ़ोतरी की है।
कई विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि NATO और Russia के बीच सीधा टकराव होता है, तो स्थिति बेहद गंभीर हो सकती है। क्योंकि Russia एक nuclear power है, इसलिए दुनिया के बड़े देश इस युद्ध को सीमित रखने की कोशिश कर रहे हैं। इसलिए America और यूरोपीय देश सीधे युद्ध में उतरने से बच रहे हैं
यूक्रेन के कौन-से क्षेत्र रूस के कब्जे में हैं?
वर्तमान समय (2026) तक, रूस यूक्रेन के लगभग 20% (करीब पांचवें हिस्से) क्षेत्र पर kabja है
क्रीमिया (Crimea): साल 2014 से ही यह क्षेत्र पूरी तरह से रूस के नियंत्रण में है। यह ब्लैक सी (काला सागर) में रूसी नौसेना का सबसे बड़ा रणनीतिक गढ़ है।
लुहान्स्क प्रांत (Luhansk Oblast): यह पूर्वी यूक्रेन के औद्योगिक डोनबास क्षेत्र का उत्तरी हिस्सा है और इस पर लगभग पूरी तरह (95% से अधिक) रूसी सेना का कब्जा है।
डोनेट्स्क प्रांत (Donetsk Oblast): इस क्षेत्र पर रूस का आंशिक कब्जा है। रूस इसके एक बड़े हिस्से पर नियंत्रण रखता है, लेकिन यूक्रेन अभी भी इस प्रांत के लगभग 30% हिस्से (जैसे पोक्रोव्स्क और क्रामाटोर्स्क जैसे महत्वपूर्ण लॉजिस्टिक्स हब) को अपने नियंत्रण में रखे हुए है।
ज़ापोरिज्झिया प्रांत (Zaporizhzhia Oblast): इस प्रांत का दक्षिणी हिस्सा रूस के कब्जे में है, जिसमें यूरोप का सबसे बड़ा परमाणु ऊर्जा संयंत्र (Zaporizhzhia Nuclear Power Plant) शामिल है। हालांकि, इस प्रांत की राजधानी (ज़ापोरिज्झिया शहर) अभी भी यूक्रेन के पास है।
खेरसॉन प्रांत (Kherson Oblast): यहाँ रूसी सेना नीपर नदी (Dnipro River) के पूर्वी तट वाले हिस्से पर काबिज़ है। नदी का पश्चिमी तट और खेरसॉन शहर को यूक्रेनी सेना ने 2022 के अंत में आज़ाद करा लिया था।
Rare Earth Elements and buffer zone theory- Russia’s Sight on Ukraine’s Trillion-Dollar Rare Mineral Wealth.
rare earth mineral- यूक्रेन की खरबों डॉलर की खनिज संपदा पर रूस की नज़र, बफ़र ज़ोन थ्योरी
रूस-यूक्रेन संघर्ष के पीछे चल रही ये दोनों थ्योरियां—'रिसोर्स जियोपॉलिटिक्स' (खनिज संपदा का खेल) और 'बफ़र ज़ोन थ्योरी' (सुरक्षा घेरा सिद्धांत)—पूरी दुनिया के सैन्य और कूटनीतिक विशेषज्ञों के बीच सबसे ज़्यादा मानी जाती हैं।
1. रिसोर्स जियोपॉलिटिक्स: खरबों डॉलर के रेयर अर्थ मिनरल्स पर नज़र
पहली बड़ी थ्योरी के अनुसार, यह युद्ध भविष्य की आधुनिक तकनीक और क्लीन-एनर्जी बाज़ार पर कब्ज़ा करने की एक आर्थिक लड़ाई है। यूक्रेन के जिन पूर्वी और दक्षिणी इलाकों (जैसे डोनबास और ज़ापोरिज्झिया) पर रूसी सेना का कब्ज़ा है, वे प्राकृतिक संसाधनों से पूरी तरह समृद्ध हैं।
भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षणों के मुताबिक, इन क्षेत्रों में लिथियम (Lithium), टाइटेनियम (Titanium) और करीब 17 प्रकार के अत्यंत दुर्लभ खनिज (Rare Earth Elements) दबे हुए हैं, जिनकी कीमत कई ट्रिलियन (खरबों) डॉलर आंकी गई है। ये खनिज आज के समय में इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) की बैटरी, सेमीकंडक्टर चिप्स, स्मार्टफ़ोन और आधुनिक मिसाइल प्रणालियों के निर्माण के लिए सबसे बुनियादी कच्चा माल हैं।
रूस इन भविष्य की बहुमूल्य धातुओं पर अपना रणनीतिक एकाधिकार बनाए रखना चाहता है, और यही कारण था कि हालिया अलास्का कूटनीतिक वार्ताओं (Alaska Summit 2025) में भी पुतिन ने इन क्षेत्रों के बदले अमेरिकी कंपनियों को वहां संयुक्त खनन (Joint Mining) के बड़े अवसर देने का पासा फेंका था, जिसे यूक्रेन ने अपनी संप्रभुता की लूट मानकर पूरी तरह खारिज कर दिया।
इस थ्योरी को तब और बल मिला जब हालिया अलास्का शिखर सम्मेलन (Alaska Summit) की गोपनीय कूटनीतिक वार्ताओं की परतें खुलीं। बैठक के दौरान रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने इन खनिज-समृद्ध क्षेत्रों पर रूसी संप्रभुता को मान्यता देने के बदले अमेरिकी कंपनियों को वहां संयुक्त खनन (Joint Mining) और निवेश के बड़े अवसर देने का एक कूटनीतिक कार्ड खेला।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी चीन पर अपनी तकनीकी और खनिज निर्भरता को कम करने के लिए इन दुर्लभ धातुओं को हासिल करने में गहरी दिलचस्पी रखते हैं। हालांकि, यूक्रेनी नेतृत्व ने इसे अपनी मातृभूमि के प्राकृतिक संसाधनों की खुली लूट और राष्ट्रीय संप्रभुता का सौदा मानते हुए इस आर्थिक प्रस्ताव को पूरी तरह खारिज कर दिया। रूस इन भविष्य की बहुमूल्य धातुओं पर अपना रणनीतिक नियंत्रण कभी नहीं खोना चाहता, और यही वजह है कि वह इन कब्ज़े वाले क्षेत्रों को छोड़ने के लिए किसी भी कीमत पर तैयार नहीं है।
2. बफ़र ज़ोन थ्योरी: रूस की सुरक्षा और नाटो का घेरा
दूसरी ओर, इस युद्ध की सबसे बड़ी कूटनीतिक जड़ 'बफ़र ज़ोन थ्योरी' (Buffer Zone Theory) है। ऐतिहासिक और भौगोलिक रूप से, रूस हमेशा से यूक्रेन को अपने और पश्चिमी शक्तियों (NATO) के बीच एक मध्यस्थ सुरक्षा कवच यानी 'बफ़र ज़ोन' के रूप में देखता आया है।
रूस की चिंता यह है कि यदि यूक्रेन नाटो सैन्य गठबंधन का हिस्सा बन जाता है, तो पश्चिमी देशों की मिसाइलें और सेनाएं सीधे रूस की दहलीज पर आकर खड़ी हो जाएंगी, जिससे मॉस्को की सुरक्षा स्थायी रूप से खतरे में पड़ जाएगी।
रूस का तर्क है कि 1991 में सोवियत संघ के टूटने के समय पश्चिम ने नाटो को पूर्व की ओर एक इंच भी न बढ़ाने का आश्वासन दिया था, लेकिन पिछले तीन दशकों में नाटो लगातार रूस की सीमाओं तक आ पहुंचा है। रूस के लिए यूक्रेन का पश्चिमी देशों की तरफ जाना एक ऐसी 'रेड लाइन' थी, जिसे टूटने से बचाने के लिए और खुद को सुरक्षित रखने के लिए उसने सैन्य आक्रमण का रास्ता चुना।
अलास्का शिखर सम्मेलन और 'एंकोरेज फ्रेमवर्क'
शांति वार्ताओं में सबसे बड़ा कूटनीतिक गतिरोध तब पैदा हुआ जब रूस ने यह सख्त शर्त रखी कि यूक्रेन के जितने हिस्से (लगभग 20%) पर वर्तमान में रूसी सेना का नियंत्रण है, यूक्रेन को उस पर से अपना दावा छोड़ना होगा और इस कड़वी सच्चाई को स्वीकार करना होगा।
अलास्का शिखर सम्मेलन (Alaska Summit) के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी इसी व्यावहारिक रुख को दोहराया और युद्ध को तुरंत रोकने के लिए यूक्रेन पर इस जमीनी हकीकत को मानने का दबाव बनाया।
हालांकि, यूक्रेनी नेतृत्व ने रूस और ट्रंप के इस प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर दिया। यूक्रेनी नेतृत्व का स्पष्ट रुख है कि संप्रभुता के साथ कोई समझौता नहीं होगा, जबकि रूस सुरक्षा गारंटियों पर अड़ा हुआ है।
यूक्रेन ने साफ कर दिया कि बिना किसी क्षेत्रीय रियायत के ही युद्धविराम पर बातचीत शुरू हो सकती है, जिसके कारण अलास्का वार्ता का यह कूटनीतिक प्रयास किसी ठोस नतीजे पर पहुंचे बिना ठंडे बस्ते में चला गया।
अमेरिका की केंद्रीय भूमिका और यूरोपीय गठबंधनों में दरार (The American Paradox & European Strains)
रूस-यूक्रेन युद्धविराम (Ceasefire) की प्रक्रिया में संयुक्त राज्य अमेरिका सबसे महत्वपूर्ण और निर्णायक भूमिका निभा सकता है, क्योंकि यूक्रेन की सैन्य और वित्तीय रीढ़ पूरी तरह अमेरिकी सहायता पर टिकी है। हालांकि, कूटनीतिक मोर्चे पर एक बड़ा संकट यह है कि इस युद्ध को लेकर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के रुख के कारण अमेरिका और यूरोपीय देशों के संबंध काफी तनावपूर्ण हो गए हैं।
जहाँ यूरोपीय संघ (EU) और नाटो (NATO) के सदस्य देश यूक्रेन की क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा के लिए दीर्घकालिक सैन्य समर्थन जारी रखने के पक्ष में हैं, वहीं ट्रंप प्रशासन का ध्यान फंडिंग में कटौती करने और यूक्रेन पर जल्द से जल्द युद्ध रोकने का दबाव बनाने पर है।
यूरोप को डर है कि ट्रंप का यह रुख रूस को आक्रामक बढ़त देगा और भविष्य में पूरे यूरोपीय महाद्वीप की सुरक्षा को खतरे में डाल देगा। नतीजतन, ट्रांस-अटलांटिक (अमेरिका-यूरोप) गठबंधनों में आई यह वैचारिक दरार वर्तमान में एक ठोस और एकजुट शांति योजना के निर्माण में सबसे बड़ी बाधा बनी हुई है।
कूटनीतिक परिदृश्य:
हालांकि अलास्का वार्ता की वह शुरुआती उम्मीद अब कूटनीतिक मतभेदों के कारण कुछ धीमी पड़ गई है, लेकिन यह बैठक इस बात का प्रमाण है कि पर्दे के पीछे से (Backchannel Diplomacy) शांति के रास्ते खोजने की कोशिशें लगातार की जा रही हैं।
इन तमाम राजनीतिक चालों, कूटनीतिक बैठकों, आधुनिक हथियारों और नक्शों पर खींची जाने वाली सीमाओं के बीच सबसे बड़ा और कड़वा सच यह है कि किसी भी युद्ध की असल कीमत वहां के आम बेगुनाह लोग ही चुकाते हैं। महाशक्तियों की महत्वाकांक्षाओं और भू-राजनीतिक वर्चस्व की वेदी पर हमेशा आम नागरिकों का जीवन और उनका भविष्य ही बलि चढ़ता है।
फिलीस्तीन के मशहूर कवि महमूद दरविश ने युद्ध की इसी विडंबना को बहुत गहरे शब्दों में बयां किया.
"The war will end. The leaders will shake hands. The old woman will keep waiting for her martyred son. The girl will wait for her beloved husband. And those children will wait for their heroic father. I don’t know who sold our homeland but I saw who paid the price."
इन तमाम राजनीतिक चालों, कूटनीतिक बैठकों, आधुनिक हथियारों और नक्शों पर खींची जाने वाली सीमाओं के बीच सबसे बड़ा और कड़वा सच यह है कि किसी भी युद्ध की असल कीमत वहां के आम बेगुनाह लोग ही चुकाते हैं। महाशक्तियों की महत्वाकांक्षाओं और भू-राजनीतिक वर्चस्व की वेदी पर हमेशा आम नागरिकों का जीवन और उनका भविष्य ही बलि चढ़ता है।
फिलीस्तीन के मशहूर कवि महमूद दरविश ने युद्ध की इसी विडंबना को बहुत गहरे शब्दों में बयां किया.






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