जब देश का सोना गिरवी रखना पड़ा : कैसे डॉ. मनमोहन सिंह ने देश का सोना गिरवी रखकर बचाई भारतीय अर्थव्यवस्था.
जब देश का सोना गिरवी रखना पड़ा : कैसे डॉ. मनमोहन सिंह ने देश का सोना गिरवी रखकर बचाई भारतीय अर्थव्यवस्था
1991 के आर्थिक संकट के दौरान भारत विदेशी मुद्रा की भारी कमी से जूझ रहा था और देश के पास केवल कुछ हफ्तों के आयात के लिए ही विदेशी मुद्रा बची थी। ऐसे गंभीर समय में प्रधानमंत्री पी. वी. नरसिम्हा राव के नेतृत्व में वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने आर्थिक उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण (LPG) की नीतियां लागू कीं। उन्होंने विदेशी निवेश को प्रोत्साहित किया, लाइसेंस राज में ढील दी और अर्थव्यवस्था में कई महत्वपूर्ण सुधार किए। इन कदमों की बदौलत भारत गहरे आर्थिक संकट और संभावित दिवालियेपन से बच गया तथा देश की अर्थव्यवस्था धीरे-धीरे फिर से पटरी पर लौट आई।
आज अमेरिका ईरान युद्ध के कारण जहां होर्मुज स्ट्रेट बंद है, जो दुनिया का तेल शिपिंग मार्ग है। इसकी वजह से दुनिया में ऊर्जा संकट बना हुआ है। अगर ये लंबा समय तक बंद रहता है तो दुनिया में वित्तीय संकट की संभावना बन सकती है।
वही इसी दिन पीएम नरेंद्र मोदी की देश वासियो से की गई अपील जिसमें सोना न खरीदें, विदेश में घूमें या विदेशो में जाकर शादी न करें, पेट्रोल डीजल बचाने के लिए वर्क फ्रॉम होम, कार पूलिंग और पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल करें पीएम मोदी द्वारा ये भी कहा गया कि आने वाला समय बहुत संकट वाला होगा।
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पीएम मोदी की अपील ने देशवाशियो की चिंता बढ़ा दी है, एक्सपर्ट की राय है कि भारत आने वाले दिनों में वित्तीय संकट से गुजर सकता है इसके लिए देशवाशियो को तैयार रहना होगा।
लेकिन ये पहला मौका नहीं था जब देश के सामने वित्तीय संकट आया हो। वश्विक करणो से एसा आज़ाद भारत के इस्तिहास में दो बार एसा समय आया कि भारत वित्तीय संकट के दरवाज़े पर आकर खड़ा था, जैसा कि हमें समय की मौजदा सरकार की सही और दूरगामी नीतियों की वजह से देश इस वित्तीय संकट से बच गया।
लेकिन ये पहला मौका नहीं था जब देश के सामने वित्तीय संकट आया हो। वश्विक करणो से एसा आज़ाद भारत के इस्तिहास में दो बार एसा समय आया कि भारत वित्तीय संकट के दरवाज़े पर आकर खड़ा था, जैसा कि हमें समय की मौजदा सरकार की सही और दूरगामी नीतियों की वजह से देश इस वित्तीय संकट से बच गया।
बहुत हो रोचक बात है कि दोनों ही समय भारत को इस फाइनेंशियल से बचाने वाले इंसान थे भारत के पूर्व पीएम डॉ. मनमोहन सिंह। 1991 में जब डॉ. मनमोहन सिंह देश के वित्त मंत्री थे और दूसरी बार 2008 में जब वे देश के प्रधानमंत्री थे। तो उन्होंने देश को आने वाले आर्थिक मंदी (Economic Recession) के संकट से बाहर निकाला, विश्व स्तर पर भारत को डिफॉल्टर होने से बचाया।
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आइये जानते हैं कि ये हालात कैसे बने और डॉ. मनमोहन सिंह ने किन नीतियों या प्लानिंग से भारत को आर्थिक मंदी (Economic Recession) के संकट से बाहर निकाला.
मनमोहन सिंह का प्रारंभिक जीवन और शिक्षा-
मनमोहन सिंह का जन्म 26 सितंबर 1932 को गाह (तत्कालीन पंजाब प्रांत, ब्रिटिश भारत) में हुआ था। आज यह जगह पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में स्थित है। 1947 के विभाजन के बाद वे भारत आ गए थे।उन्होंने पंजाब विश्वविद्यालय (होशियारपुर) से अर्थशास्त्र में स्नातक और स्नातकोत्तर किया और दोनों में प्रथम स्थान प्राप्त किया।
इसके बाद वे कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय गए और 1957 में अर्थशास्त्र ट्रिपोस पूरा किया।
बाद में उन्होंने ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से डी.फिल. (डॉक्टरेट) की डिग्री प्राप्त की और नफिल्ड कॉलेज के सदस्य रहे।
शिक्षा पूरी करने के बाद वे भारत लौटे और पंजाब विश्वविद्यालय में शिक्षक बने।
1966 से 1969 तक उन्होंने संयुक्त राष्ट्र (UN) में अर्थशास्त्री के रूप में काम किया।
पहली बार 1991 में-
भारत में पहला ऐसा वित्तीय संकट, 1991 में हमें समय भारत के प्रधान मंत्री थे पी. वी. नरसिम्हा राव. इस साल 1990 में इराक ने कुवैत पर हमला कर दिया और वहाँ कब्ज़ा कर लिया। जिस कारण भारत को वहा काम करने वाले अपने कामगारों को वापस बुलाना पड़ा, जो कि काफी मात्रा में विदेशी मुद्रा भेजते थे। जो युद्ध के कारण अब पूरी तरह बंद हो गई थी। साथ ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल (cruid oil) के दाम बढ़ गए। जिससे भारत को महंगी जिससे भारत को महँगी दरों पर कच्चा तेल खरीदना पड़ रहा था.
साथ ही सरकार के द्वार काई योजनाओं पर दी जा रही जरुरत से ज्यादा सब्सिडी सरकार पर बोझ बनी हुई थी।और उस समय की राजनीतिक अस्थिरता भी एक करण बानी।
इससे हुआ यूं कि भारत का विदेशी मुद्रा भंडार तेजी से ख़त्म होने लगा। या साल 1991 में भारत के पास विदेशी मुद्रा भंडार सिर्फ 1 अरब डॉलर से भी कम रह गया जो मात्र 2 सप्ताह का विदेश भुगतान के लिए ही काफी था।
इसका मतलब भारत सिर्फ 2 सप्ताह तक ही विदेशो से समान आयात कर के उनका भुगतान कर सकता था। क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय आयात निर्यात का भुगतान केवल अमेरिकी डॉलर में ही होता है 1991 में भारत का विदेशी कर्ज 35 अरब डॉलर से दोगुना होकर 69 अरब डॉलर हो गया था। जिसे भारत को विदेशी संस्थान या आईएमएफ से ऋण मिलना मुश्किल हो गया था। IMF विकास देश को अपनी अर्थव्यवस्था सुधारने के लिए लोन देता है।
भारत के लिए हालत बहुत खराब थी, देश के पास समय और पैसा दोनों ही नहीं थे। ऐसी हालत में उस समय के प्रधानमंत्री पी. वी. नरसिम्हा राव ने डॉ. मनमोहन सिंह को वित्त मंत्री नियुक्त किया
डॉ. मनमोहन सिंह ने शपथ लेते हुए ही अर्थव्यवस्था को बदलने का काम शुरू कर दिया।
पहला औद्योगिक नीति में बदलाव किया गया अब से उन्होंने सभी उद्योगों में लाइसेंसिंग के नियम खत्म किए.
कुल मिलाकर सिर्फ 18 उद्योगों में ही लाइसेंस की ज़रूरत होगी। इसका मुख्य उद्देश्य था कि ज्यादा से ज्यादा उद्योग को बढ़ावा देना. जिससे अधिक से अधिक रोजगार पैदा हो सके।
दूसरा बदलाव सरकार द्वारा निजी कंपनियों के एकाधिकार के बारे में बनाए गए नियमों को लचीला करना था
ताकि निजी कंपनियों का सरकार पर भरोसा बढ़ाया जा सके. इसके अंतरगत सरकार ने नियमों में बदलाव शुरू किया है, जिसमें सरकार को लगता है कि बड़ी कंपनी अपना अधिकार जमा लेगी। उन नियमों में ढील दी गई ताकि कंपनी ज्यादा निवेश कर सके।
तीसरा क्रांतिकारी परिवर्तन था 34 विभागों में विदेशी निवेश (एफडीआई) की सीमा को 40 फ़ीसदी से बढ़ाकर 51 फ़ीसदी करना।
जिसकी विदेशी कंपनियों के लिए भारत के बाहर खुल गए।निवेश भारत के माध्यम से निवेश भारत में आने. भारत की अर्थव्यवस्था को मदद मिली। लेकिन इसके लिए सरकार ने नियम बनाए कि निवेश के लिए किसी विदेशी कंपनी को भारत की कंपनियों को साझेदार बनाकर ही निवेश करना होगा। इसके पीछे सरकार की सोच थी कि इस तरह की विदेशी कंपनियां भारत में आएंगी लेकिन उनका एकाधिकार नहीं होगा। और साथ ही भारतीय कंपनियों को सीखने का मौका मिलेगा.
इसके तहत हीरो होंडा, मारुतिसुज़ुकी, जनरल मोटर्स विद हिंदुस्तान मोटर्स और बहुत सी कंपनियों ने भारत में कदम रखा जिसने देश की अर्थव्यवस्था को बढ़ावा दिया।
इसके तहत हीरो होंडा, मारुतिसुज़ुकी, जनरल मोटर्स विद हिंदुस्तान मोटर्स और बहुत सी कंपनियों ने भारत में कदम रखा जिसने देश की अर्थव्यवस्था को बढ़ावा दिया।
रुपये की दो बार अवमूल्यन (devaluation) -
डॉ. मनमोहन सिंह की नीति के तहत सरकार कुछ समय के अंतराल में दो बार रुपये का अंतरराष्ट्रीय मुद्रा के हिसाब से अवमूल्यन किया। ताकि भारत के निर्यात और विदेश से आने वाले निवेश को बढ़ाया जा सके।
उद्योगपतियों से संवाद -
नरसिम्हा राव ने सभी बड़े उद्योग उद्यमियों से मुलाकात का समय दिया। ताकि वो बिना किसी डर के देश की अर्थव्यवस्था में ज्यादा निवेश करे।
राजकोषीय सुधार:
राजकोषीय घाटा कम करने की कोशिश की गई। पेट्रोल, रसोई गैस की कीमतें बढ़ाईं और चीनी पर सब्सिडी खत्म कर दी। ताकि भारत सरकार के खर्चे मैनेज करके देश के खजाने को भरा जा सके।
भारत ने अपना सोना गिरवी रख कर आपातकालीन फंड की व्यवस्था की थी. यह मनमोहन सिंह का सबसे साहसिक और निर्णायक कदम था।
सोना गिरवी रख्कर आपातकालीन फंड की व्यवस्था करना।
भारत ने अपना सोना गिरवी रख कर आपातकालीन फंड की व्यवस्था की थी. यह मनमोहन सिंह का सबसे साहसिक और निर्णायक कदम था।
मनमोहन सिंह ने बड़े ही गुप्त तरीके से भारत सरकार का 67 टन सोने का एयर लिफ्ट करके विदेशी बैंकों में गिरवी रखा था। इसमें 47 टन सोना बैंक ऑफ इंग्लैंड और 20 टन सोना यूनियन बैंक ऑफ यूनियन बैंक ऑफ स्विट्ज़रलैंड मैं भेजा था। ताकि आपातकालीन ऋण जारी किया गया था। इसके बदले भारत को लगभग $400–$600 मिलियन (लगभग 400–600 मिलियन डॉलर) की विदेशी मुद्रा सहायता मिली थी।
आईएमएफ से ली गई मदद: संकट से उबरने के लिए भारत ने अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) से करीब 2.2 अरब डॉलर का आपातकालीन ऋण लिया। शुरू में आईएमएफ ने मना किया लेकिन बाद में कुछ शर्तों के साथ लोन दे दिया।
1992 के मध्य में भारत का विदेशी मुद्रा भंडार में सामान्य वृद्धि हुई। नरसिम्हा राव की राजनीतिक समझ और मनमोहन सिंह की नीति और योजना के बिना ऐसा संभव नहीं हो सकता था।
गिरवी रखा गया सोना कब वापस भारत आया?-
1991 में गिरवी रखा गया सोना तकनीकी रूप से उसी साल नवंबर 1991 तक वापस छुड़ा लिया गया था, लेकिन उसे भौतिक रूप से भारत नहीं लाया गया था।
कर्ज चुकाने के बाद सोना भारत का हो गया था, लेकिन सुरक्षा, लॉजिस्टिक्स और अंतरराष्ट्रीय व्यापार में आसानी के लिए उसे लंदन के 'बैंक ऑफ इंग्लैंड' की तिजोरियों में ही रखा गया था
हाल ही में, मई 2024 में भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने ब्रिटेन (Bank of England) से 100 टन (1 लाख किलो) सोना वापस भारत मंगाया है, जो 1991 के बाद की सबसे बड़ी वापसी है।
दूसरी बार 2008 में…
ऐसा मौका दूसरा बार तब आया जब अमेरिका में जबरदस्त मंदी आई। उस समय अमेरिकी बैंकों ने बिना वहा के लोगो का उचित पुनर्भुगतान क्षमता की जांच की, घर पर बंधक ऋण (Mortgage loan) देना शुरू कर दिया।
जिससे वहा के लोगों ने जमकर लोन लिया। बाद में फेडरल बैंकों ने जैसे ही ब्याज बढ़ाया, लोग पुनर्भुगतान नहीं कर पाए। या धीरे धीरे वाहा वित्तीय संकट चालू हो गया. जिसे 2008 अमेरिकी सबप्राइम मॉर्गेज संकट कहा गया.
इससे पहले वहां की बीमा कंपनी डूब गई और बाद में वहाँ के बैंक डूब गए। पूरे अमेरिका में वित्तीय संकट आ गया। अमेरिका के वित्तीय संकट पूरी दुनिया को वित्तीय संकट में डाल दिया है, पूरी दुनिया में आर्थिक मंदी हो गई है। क्योंकि अमेरिका पूरी दुनिया का आर्थिक केंद्र है वहा आर्थिक मंदी का मतलब है पूरी दुनिया में आर्थिक मंदी।
1991 के बाद 2008 में भारत को एक बार फिर आर्थिक मंदी का सामना करना पड़ा। जहां 1991 में आई आर्थिक मंदी के पीछे कई आंतरिक कारण थे, वहीं 2008 में वैश्विक मंदी के पीछे वैश्विक कारण थे . 2008 में जब पूरी दुनिया को मंदी ने अपनी चपेट में ले लिया था तब मनमोहन सिंह ने देश को इस संकट से उबारा था
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इस संकट में भारतीय शेयर बाजार भी धराशायी हो गए थे। गिर गया 50% से अधिक, विदेशी आवेदकों ने एक महीने में 12 अरब डॉलर निकाले और उत्पाद वृद्धि (GPD) दर 9% से गिरकर 6.7% हो गई। जब लगा कि भारतीय उद्योग चरमराएगा, लेकिन मनमोहन की नीति या योजना ने देश को इस संकट ने निकाल लिया है।
1- बाजार में पैसों का प्रवाह बनाए रखने के लिए भारी सरकारी खर्च किया गया और ब्याज में कटौती की गई।
2- सरकार और रिज़र्व बैंक के कर्मचारियों और आम लोगों को राहत दी गई, जिससे भारत की अर्थव्यवस्था में गहरी गिरावट आई और अर्थव्यवस्था जल्द ही पटरी पर लौट आई।
3 - चार करोड़ छोटे किसानों पर 71,600 करोड़ रुपये का कृषि ऋण माफ
4 -उनकी रणनीति में 1.86 लाख करोड़ रुपये के प्रोत्साहन कार्यक्रम शामिल थे, जिससे 2010 तक वृद्धि दर में तेजी से सुधार हुआ और यह 8.5% तक पहुंच गया।
5 -उत्पाद शुल्क में छूट के साथ 20,000 करोड़ रुपये का निवेश किया गया।
6 -राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार सचिवालय अधिनियम (पिटाईजी) जैसे प्रमुख पद के लिए 30,000 करोड़ रुपये अतिरिक्त जोड़े गए।
7 -रिज़र्व बैंक ने अपनी सुपरमार्केट नीति में बदलाव किया। उसके माध्यम से बाजार में सस्ते पैसे की व्यवस्था की गई।
जिससे भारत की अर्थव्यवस्था धीरे-धीरे पटरी पर आ गई।और भारत गहरे आर्थिक संकट में जाने से बच गया.
डॉ. मनमोहन सिंह की नीतियों और आर्थिक योजनाओं की वजह से भारत दो बार आर्थिक संकट से बच पाया।”
हम इस दूरदर्शी व्यक्ति को सलाम करते हैं या उम्मीद करते हैं कि एक भविष्य में भी जब देश में ये हालात बने तो मौजदा सरकार भी देश को संकट में डालेगी, अन्यथा ऐसे ही बाहर निकले जैसे डॉ. मनमोहन सिंह ने अपना नेत्रारवा में किया था।
पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का निधन 26 दिसंबर 2024 को नई दिल्ली के AIIMS में 92 वर्ष की आयु में हुआ.
मई 2026 में भारत की आर्थिक स्थिति 1991 के संकट की अर्थव्यवस्था बहुत मजबूत है।मुख्य आर्थिक आँकड़े (मई 2026)
विदेशी मुद्रा भंडार: लगभग $697 अरब , जो 1991 में मात्र $1.1 अरब था।
स्वर्ण भंडार: RBI के पास 880.5 टन सोना जमा है (मार्च 2026 तक), कीमत $115 अरब से अधिक है।
आज भारत 1991 और 2008 के आर्थिक संकट से निकल कर जापान को पछाड़कर चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है।
यदि डॉ. मनमोहन सिंह ने अपनी नीतियों के माध्यम से देश को आर्थिक संकट से नहीं बचाया होता, तो संभव है कि भारत की वर्तमान स्थिति कुछ और होती
क्या आज का भारत उन आर्थिक सुधारों के बिना एक वैश्विक शक्ति बन पाता जो डॉ. सिंह ने तीन दशक पहले शुरू किए थे?"
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