आख़िर इज़रायल ISREAL ने कैसे अली खामेनेई Ali Khamenei को मार गिराया (Eliminate) ? इज़रायली MOSSAD के उस मिशन की पूरी कहानी जिसने सबको चौंकाया
आख़िर सालो छिपे होने के बाद भी इज़रायली मोसाद (MOSSAD) ने कैसे अली खामेनेई Ali Khamenei को मार गिराया (Eliminate)?. इज़रायली MOSSAD के उस मिशन की पूरी कहानी जिसने सबको चौंकाया।
खामेनेई की मौत के पीछे का सच ऑपरेशन 'Roar of the Lion': ईरान के सुप्रीम लीडर (IRANIAN SUPREME LEADER)अली खामेनेई के अंत की पूरी इनसाइड स्टोरी।
इस ब्लॉग में हम जानेंगे कि कैसे इज़राइल (ISREAL) ने दुनिया के सबसे सुरक्षित लोगों में से एक माने जाने वाले ईरान के सर्वोच्च नेता (SUPREME LEADER) Ali Khamenei को ईरान के अंदर खोज निकाला और इसके बाद 28 फरवरी 2026 को मोसाद (MOSSAD)और सीआईए (CIA)ने एक संयुक्त ऑपरेशन चलाकर Ali Khamenei को मार गिराया।
आइए अब एक-एक करके समझते हैं कि इज़राइल ने आखिर ऐसा कैसे किया।
कौन थे Ali Khamenei ?
Ali Khamenei ईरान के सर्वोच्च नेता (Supreme Leader) थे। उनका पूरा नाम सैयद अली हुसैनी ख़ामेनेई है। उनका जन्म 19 अप्रैल 1939 को ईरान के Mashhad शहर में हुआ था। ईरान में Supreme Leader का पद सबसे शक्तिशाली माना जाता है। उनके पास सेना पर नियंत्रण, बड़ी सरकारी नीतियों पर अंतिम फैसला, न्यायपालिका और सुरक्षा संस्थाओं पर गहरा प्रभाव होता है।
Ali Khamenei पहले ईरान के राष्ट्रपति भी रह चुके हैं। उन्होंने 1981 से 1989 तक राष्ट्रपति पद संभाला था। 1979 की Iranian Revolution के बाद उनका प्रभाव तेजी से बढ़ा। वे ईरान के पहले सर्वोच्च नेता Ruhollah Khomeini के बेहद करीबी माने जाते थे। अली ख़ामेनेई मध्य पूर्व की राजनीति MIDDLE EAST POLITICSमें एक महत्वपूर्ण नेता माने जाते हैं।
उनके बयान और फैसलों का असर ईरान की विदेश नीति, अमेरिका और पश्चिमी देशों से संबंध मध्य पूर्व की राजनीति पर पड़ता है।
मार्च 2026 की रिपोर्टों के आधार पर, तेहरान में ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई को मारने वाले संयुक्त अमेरिकी-इजरायली अभियान को इज़राइल ने "ऑपरेशन रोअरिंग लायन- (Operation Roaring Lion) नाम दिया, जबकि अमेरिका ने इसे "ऑपरेशन एपिक फ्यूरी" (Operation Epic Fury) नाम दिया गया । खामेनेई के परिसर को निशाना बनाकर किया गया यह हमला 28 फरवरी, 2026 को ईरानी नेतृत्व और सैन्य ठिकानों के खिलाफ एक व्यापक अभियान के हिस्से के रूप में हुआ था.
इज़राइल ISREAL और ईरान IRAN एक-दूसरे पर कई गंभीर आरोप लगाते हैं
इज़राइल का आरोप है कि ईरान Middle East में ऐसे संगठनों को समर्थन देता है जो इज़राइल के खिलाफ काम करते हैं। इनमें प्रमुख संगठन हैं
Hezbollah — लेबनान में सक्रिय संगठन
Hamas — गाजा और फिलिस्तीनी क्षेत्रों में सक्रिय
Houthis — यमन में सक्रिय समूह
Palestinian Islamic Jihad
इराक IRAQऔर सीरिया SYRIA की कई Shia militias-

इज़राइल ISREAL यह आरोप लगाता रहा है कि ईरान Middle East में सक्रिय कई proxy संगठनों को funding, हथियार, training और intelligence support देता है, जो इज़राइल के खिलाफ काम करते हैं। इज़राइल के अनुसार ये संगठन उसकी security और अस्तित्व (existence) के लिए बड़ा खतरा हैं। इज़राइल हमेशा से ईरान के nuclear program को अपने अस्तित्व (existence) के लिए बड़ा खतरा मानता रहा है।
इसीलिए ईरान का IRAN nuclear program और उससे जुड़े वैज्ञानिक, सैन्य अधिकारी और nuclear facilities लंबे समय से इज़राइल और मोसाद (MOSAD) के निशाने पर रहे हैं। इज़राइल (ISREAL)किसी भी कीमत पर ईरान को nuclear power बनने से रोकना चाहता है, क्योंकि उसका मानना है कि परमाणु हथियार Middle East में शक्ति संतुलन बदल सकते हैं और उसकी सुरक्षा SECURITY के लिए बड़ा खतरा बन सकते हैं।
ईरान (IRAN) लंबे समय से यह दावा करता रहा है कि उसका nuclear program पूरी तरह peaceful (शांतिपूर्ण) उद्देश्यों के लिए है। ईरान कहता है कि वह nuclear energy का इस्तेमाल सिर्फ electricity production और medical research के लिए कर रहा है।
ईरान परमाणु हथियार क्यों बनाना चाहता है –why iran wants nuclear weapon-
ईरान IRANकी सुरक्षा चिंताओं के पीछे एक महत्वपूर्ण कारण यह भी माना जाता है कि उसने पिछले कई दशकों में विभिन्न देशों में हुए विदेशी हस्तक्षेपों Foreign Interventions और सत्ता परिवर्तन Regime change की घटनाओं को देखा है। अफगानिस्तान Afghanistan, इराक IRAQ और लीबिया LIBYA जैसे मामलों में अमेरिका की भूमिका को अक्सर उदाहरण के रूप में पेश किया जाता है। तेहरान TEHRAN को यह आशंका है कि यदि उसने अपनी सुरक्षा क्षमताओं को मजबूत नहीं किया, तो आज नहीं तो कल उसके साथ भी वही हो सकता है जो अतीत में कुछ अन्य देशों के साथ हुआ। शायद यही उन कारणों में से एक हो सकता है जिसकी वजह से ईरान परमाणु हथियार IRAN NUCLEAR WEAPON बनाने की क्षमता हासिल करना चाहता हो। तेहरान के कई रणनीतिकारों का मानना है कि यदि किसी देश के पास पर्याप्त प्रतिरोधक क्षमता नहीं हो, तो वह बाहरी दबाव या राजनीतिक अस्थिरता का शिकार बन सकता है।
इसके साथ ही उत्तर कोरिया NORTH KOREA का उदाहरण भी अक्सर चर्चा में आता है। उत्तर कोरिया NORTH KOREA के पास परमाणु हथियार NUCLEAR WEAPON होने के बावजूद अमेरिका AMERICAऔर उसके सहयोगी देशों ने उस पर कड़े प्रतिबंध तो लगाए हैं, लेकिन उसके खिलाफ इराक IRAQ या लीबिया LIBYA जैसी प्रत्यक्ष सैन्य कार्रवाई नहीं की गई। इसी वजह से कुछ विश्लेषकों का तर्क है कि परमाणु क्षमता किसी देश के लिए एक मजबूत सुरक्षा कवच का काम कर सकती है
आखिर किस वजह से इज़राइल ने Ali Khamenei को मारने का प्लान बनाया? why isreal eliminate Ali Khamenei -
इज़राइल सालों से ईरान के nuclear scientists, nuclear sites और कई nuclear plants की uranium enrichment facilities को निशाना बनाता रहा है। इन हमलों की वजह से ईरान का nuclear program कई बार पीछे चला गया, लेकिन पूरी तरह बंद नहीं हो पाया। क्योंकि ईरान के Supreme Leader Ali Khamenei के अधीन यह पूरा nuclear program चलता है, इसलिए जैसे ही किसी हमले या sabotage से program को नुकसान होता है, उसे फिर से दूसरी जगह या नई NEW facilities में शुरू कर दिया जाता है।
इज़राइल का मानना था कि इन attacks से वह ईरान के nuclear program को slow या delay कर सकता है, लेकिन ईरान लगातार इसे दोबारा rebuild करता रहता है। शुरुआती दौर में इज़राइल का मुख्य रणनीतिक एजेंडा ईरान के nuclear program को रोकना या कमजोर करना माना जाता है, न कि Ali Khamenei को निशाना बनाना।
लेकिन मोसाद MOSSAD के जनवरी 2018 में ईरान के अंदर किए गए अंडर कवर ऑपरेशन ISREAL UNDER COVER OPERATION से सब कुछ बदल जाता है
जनवरी 2018 में, इज़राइल की खुफिया एजेंसी मोसाद MOSSAD ने तेहरान में एक साहसिक और गुप्त ऑपरेशन SECRET OPERATION को अंजाम दिया, जिसमें एक गुप्त गोदाम से 100,000 दस्तावेज़ों का एक विशाल संग्रह चुरा लिया गया। इन दस्तावेज़ों में ईरान के परमाणु हथियार विकास की पूरी जानकारी थी, जिसे 'अमद प्रोजेक्ट' (AMAD Project) के नाम से जाना जाता है।
एक मोसाद एजेंट (mossad agent)ने इंटरव्यू में खुलासा किया कि इस ऑपरेशन की योजना बनाने में दो साल का समय लगा था। इस गुप्त ऑपरेशन के अंदर कुल 20 मोसाद एजेंट शामिल थे - जिनमें से कोई भी इज़राइली नागरिक नहीं था।
एजेंटों ने एक गोदाम में सेंध लगाई और उन्हें 30 से अधिक तिजोरियों को तोड़ना पड़ा, इस ऑपरेशन से इजराइल को बहुत सारी चीजें पता चली. ईरान की ऐसी-ऐसी सीक्रेट अंडरग्राउंड लोकेशन UNDERGROUND LOCATIONS के बारे में पता चला जिनके बारे में इजराइल को अभी तक जानकारी नहीं थी सैटेलाइट SETALLITE से भी नहीं दिखती थी.
ये दस्तावेज़ हाथ लगने के बाद इज़राइल को एहसास हुआ कि हमें ईरान के परमाणु कार्यक्रम IRAN NUCLEAR PROGRAM को रोकने के लिए उनकी कोर लीडरशिप CORE LEADERSHIP(मुख्य नेतृत्व) को ही खत्म करना पड़ेगा। चूंकि यह कार्यक्रम सुप्रीम लीडर अली खामेनेई की देखरेख (सुपरविज़न) में चल रहा था, इसलिए इज़राइल ने सुप्रीम लीडर अली खामेनेई को मारने का अंतिम निर्णय ले लिया।
लेकिन Ali Khamenei को मारना इतना आसान नहीं था। it was not easy to eliminate Ali Khamenei-
अली ख़ामेनेई Ali Khamenei का आधिकारिक निवास और कार्यस्थल तेहरान में स्थित बेहद सुरक्षित परिसर "बैत-ए-रहबरी" में था। वे मुख्य रूप से भूमिगत (UNDERGROUND bunkers) बंकरों में रहते थे जो आपस में जुड़े हुए अंडरग्राउंड सुरंगों से जुड़े हुए थे ,और काफी हद तक मिसाइल हमलों से सुरक्षित थे .सुरक्षा कारणों से वे लंबे समय तक एक ही बंकर में नहीं रुकते थे और समय-समय पर अपना स्थान बदलते रहते थे। उनकी सुरक्षा व्यवस्था इतनी कड़ी थी कि उनसे मिलने की अनुमति हर किसी को नहीं होती थी। केवल चुनिंदा और भरोसेमंद अधिकारियों को ही उनके संपर्क में आने की इजाजत थी। सुरक्षा कारणों से वे अपना अधिकांश समय इसी परिसर के भीतर बिताते थे और केवल विशेष अवसरों पर ही सार्वजनिक कार्यक्रमों या लोगों से मुलाकात के लिए बाहर निकलते थे।
यह इलाका ईरान की सत्ता और सुरक्षा व्यवस्था का प्रमुख केंद्र माना जाता है। इसी क्षेत्र में सर्वोच्च न्यायालय, खुफिया मंत्रालय का मुख्यालय, आईआरजीसी (इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स) के महत्वपूर्ण कार्यालयों सहित कई शीर्ष सरकारी संस्थान स्थित हैं। यही वजह है कि पूरे क्षेत्र को देश के सबसे सुरक्षित इलाकों में गिना जाता है।
इस परिसर की सुरक्षा कई स्तरों पर की जाती है। यहां चौबीसों घंटे सुरक्षा बल तैनात रहते हैं और आधुनिक निगरानी प्रणालियों का इस्तेमाल किया जाता है। परिसर में उन्नत कैमरे, संचार संकेतों की निगरानी करने वाले उपकरण, मोबाइल सिग्नल जैमर तथा ड्रोन या रॉकेट हमलों से सुरक्षा के लिए विशेष रक्षात्मक व्यवस्थाएं मौजूद बताई जाती हैं। सुरक्षा का स्तर इतना कड़ा है कि परिसर के हर हिस्से पर लगातार निगरानी रखी जाती है।
सबसे पहले ज़मीनी स्तर पर खुफिया नेटवर्क और निगरानी तंत्र को मजबूत किया गया, ताकि जब भी ख़ामेनेई को निशाना बनाने का अवसर मिले, इज़राइल के पास उनकी सटीक और रियल-टाइम लोकेशन की जानकारी हो।
रणनीतिक दृष्टि से यह एक ऐसा लक्ष्य था, जहां गलती की गुंजाइश लगभग नहीं थी। यदि यह मौका हाथ से निकल गया, तो दोबारा ऐसा मौका मिलना बेहद मुश्किल हो सकता था। इसके अलावा इज़राइल को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारी आलोचना और राजनीतिक दबाव का भी सामना करना पड़ सकता था।
साथ ही इज़राइल ने कूटनीतिक मोर्चे DIPLOMATIC LEVELपर भी तैयारियां शुरू कर दीं। उसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि यदि भविष्य में वह ख़ामेनेई या ईरानी नेतृत्व के खिलाफ कोई बड़ा कदम उठाए, तो उसे अमेरिका और अपने अन्य सहयोगी देशों का समर्थन प्राप्त हो। इसी रणनीति के तहत इज़राइल ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने ऐसे सबूत और खुफिया जानकारियां प्रस्तुत करना शुरू किया, जिनसे यह साबित किया जा सके कि ईरान परमाणु हथियार बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। इज़राइल का तर्क था कि यदि ईरान परमाणु हथियार हासिल कर लेता है, तो इससे उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा और यहां तक कि उसके अस्तित्व के लिए भी गंभीर खतरा पैदा हो सकता है।
इसके बाद इज़राइल ने अली ख़ामेनेई की गतिविधियों, सुरक्षा व्यवस्था और संभावित ठिकानों से जुड़ी खुफिया जानकारी जुटाने पर विशेष ध्यान देना शुरू किया।
इस परिसर की सुरक्षा कई स्तरों पर की जाती है। यहां चौबीसों घंटे सुरक्षा बल तैनात रहते हैं और आधुनिक निगरानी प्रणालियों का इस्तेमाल किया जाता है। परिसर में उन्नत कैमरे, संचार संकेतों की निगरानी करने वाले उपकरण, मोबाइल सिग्नल जैमर तथा ड्रोन या रॉकेट हमलों से सुरक्षा के लिए विशेष रक्षात्मक व्यवस्थाएं मौजूद बताई जाती हैं। सुरक्षा का स्तर इतना कड़ा है कि परिसर के हर हिस्से पर लगातार निगरानी रखी जाती है।
इसके लिए इज़राइल ने लंबी और सुनियोजित तैयारी शुरू की। isreal planned well and long ago-
सबसे पहले ज़मीनी स्तर पर खुफिया नेटवर्क और निगरानी तंत्र को मजबूत किया गया, ताकि जब भी ख़ामेनेई को निशाना बनाने का अवसर मिले, इज़राइल के पास उनकी सटीक और रियल-टाइम लोकेशन की जानकारी हो।
रणनीतिक दृष्टि से यह एक ऐसा लक्ष्य था, जहां गलती की गुंजाइश लगभग नहीं थी। यदि यह मौका हाथ से निकल गया, तो दोबारा ऐसा मौका मिलना बेहद मुश्किल हो सकता था। इसके अलावा इज़राइल को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारी आलोचना और राजनीतिक दबाव का भी सामना करना पड़ सकता था।
साथ ही इज़राइल ने कूटनीतिक मोर्चे DIPLOMATIC LEVELपर भी तैयारियां शुरू कर दीं। उसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि यदि भविष्य में वह ख़ामेनेई या ईरानी नेतृत्व के खिलाफ कोई बड़ा कदम उठाए, तो उसे अमेरिका और अपने अन्य सहयोगी देशों का समर्थन प्राप्त हो। इसी रणनीति के तहत इज़राइल ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने ऐसे सबूत और खुफिया जानकारियां प्रस्तुत करना शुरू किया, जिनसे यह साबित किया जा सके कि ईरान परमाणु हथियार बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। इज़राइल का तर्क था कि यदि ईरान परमाणु हथियार हासिल कर लेता है, तो इससे उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा और यहां तक कि उसके अस्तित्व के लिए भी गंभीर खतरा पैदा हो सकता है।
इसके बाद इज़राइल ने अली ख़ामेनेई की गतिविधियों, सुरक्षा व्यवस्था और संभावित ठिकानों से जुड़ी खुफिया जानकारी जुटाने पर विशेष ध्यान देना शुरू किया।
इस मिशन के लिए इज़राइल ने अपनी सैन्य खुफिया एजेंसियों की विशेष इकाइयों, जैसे यूनिट 8200 और यूनिट unit 9900, के साथ-साथ मोसाद के मानव खुफिया (Human Intelligence) नेटवर्क को सक्रिय किया। इनका उद्देश्य ख़ामेनेई की गतिविधियों और लोकेशन से जुड़ी अधिकतम सटीक जानकारी एकत्र करना था।
यूनिट unit 8200 को सिग्नल इंटेलिजेंस और साइबर निगरानी में विशेषज्ञ माना जाता है, जबकि यूनिट 9900 उपग्रह चित्रों और भू-स्थानिक खुफिया जानकारी के विश्लेषण के लिए जानी जाती है। वहीं मोसाद का मानव स्रोतों पर आधारित नेटवर्क दुनिया के सबसे प्रभावी खुफिया नेटवर्कों में गिना जाता है। इन सभी संसाधनों को एक साथ लगाकर इज़राइल ने लक्ष्य से जुड़ी यथासंभव सटीक और विश्वसनीय जानकारी हासिल करने की कोशिश की
इस मिशन के लिए सबसे पहले मोसाद ने ख़ामेनेई के सुरक्षा घेरे और उनके आसपास के नेटवर्क के बारे में अधिकतम जानकारी जुटाने की कोशिश शुरू की। माना जाता है कि इसके लिए मानव खुफिया (Human Intelligence) नेटवर्क का व्यापक इस्तेमाल किया गया।
बताया जाता है कि खुफिया एजेंसियों ने उन लोगों पर विशेष ध्यान दिया जो किसी न किसी रूप में नेतृत्व परिसर के संपर्क में आते थे। इनमें रखरखाव से जुड़े कर्मचारी, सेवा प्रदाता और अन्य सहायक स्टाफ शामिल हो सकते थे। साथ ही ऐसे स्थानीय लोगों से भी संपर्क स्थापित करने की कोशिश की गई जो ईरानी नेतृत्व से असंतुष्ट माने जाते थे।
खुफिया जानकारी जुटाने के लिए परिसर के आसपास की गतिविधियों पर लगातार नजर रखी जाती थी। आने-जाने वाली वस्तुओं, सुरक्षा व्यवस्थाओं में बदलाव, अधिकारियों की आवाजाही और अन्य संकेतों का विश्लेषण किया जाता था। लक्ष्य यह था कि नेतृत्व परिसर की कार्यप्रणाली, सुरक्षा ढांचे और वहां होने वाली गतिविधियों की अधिक से अधिक सटीक तस्वीर तैयार की जा सके।
इसके साथ-साथ तकनीकी निगरानी (Technical Surveillance) के मोर्चे पर भी व्यापक तैयारियां की गईं। बताया जाता है कि इज़राइली खुफिया एजेंसियों ने ईरानी नेतृत्व IRANIAN LEADERSHIP से जुड़े लोगों की संचार गतिविधियों और डिजिटल नेटवर्क पर नजर रखी गई. अली ख़ामेनेई से जुड़े सुरक्षा कर्मियों, ड्राइवरों, सहयोगियों और अन्य संपर्कों की गतिविधियों का अध्ययन किया गया ताकि महत्वपूर्ण सूचनाएं हासिल की जा सकें। इसी के साथ विभिन्न इलेक्ट्रॉनिक और संचार प्रणालियों से मिलने वाले संकेतों का भी विश्लेषण किया गया
तेहरान और संवेदनशील सरकारी परिसरों में लगे निगरानी तंत्र, कैमरों तथा अन्य डिजिटल नेटवर्कों से जुड़ी सूचनाओं को समझने और उन पर रखना शुरू किया । इसके अलावा शहर के यातायात पैटर्न, वीआईपी काफिलों की आवाजाही और सुरक्षा व्यवस्थाओं में होने वाले बदलावों का भी अध्ययन किया जाता था।
इस मिशन के लिए सबसे पहले मोसाद ने ख़ामेनेई के सुरक्षा घेरे और उनके आसपास के नेटवर्क के बारे में अधिकतम जानकारी जुटाने की कोशिश शुरू की। माना जाता है कि इसके लिए मानव खुफिया (Human Intelligence) नेटवर्क का व्यापक इस्तेमाल किया गया।
बताया जाता है कि खुफिया एजेंसियों ने उन लोगों पर विशेष ध्यान दिया जो किसी न किसी रूप में नेतृत्व परिसर के संपर्क में आते थे। इनमें रखरखाव से जुड़े कर्मचारी, सेवा प्रदाता और अन्य सहायक स्टाफ शामिल हो सकते थे। साथ ही ऐसे स्थानीय लोगों से भी संपर्क स्थापित करने की कोशिश की गई जो ईरानी नेतृत्व से असंतुष्ट माने जाते थे।
खुफिया जानकारी जुटाने के लिए परिसर के आसपास की गतिविधियों पर लगातार नजर रखी जाती थी। आने-जाने वाली वस्तुओं, सुरक्षा व्यवस्थाओं में बदलाव, अधिकारियों की आवाजाही और अन्य संकेतों का विश्लेषण किया जाता था। लक्ष्य यह था कि नेतृत्व परिसर की कार्यप्रणाली, सुरक्षा ढांचे और वहां होने वाली गतिविधियों की अधिक से अधिक सटीक तस्वीर तैयार की जा सके।
इसके साथ-साथ तकनीकी निगरानी (Technical Surveillance) के मोर्चे पर भी व्यापक तैयारियां की गईं। बताया जाता है कि इज़राइली खुफिया एजेंसियों ने ईरानी नेतृत्व IRANIAN LEADERSHIP से जुड़े लोगों की संचार गतिविधियों और डिजिटल नेटवर्क पर नजर रखी गई. अली ख़ामेनेई से जुड़े सुरक्षा कर्मियों, ड्राइवरों, सहयोगियों और अन्य संपर्कों की गतिविधियों का अध्ययन किया गया ताकि महत्वपूर्ण सूचनाएं हासिल की जा सकें। इसी के साथ विभिन्न इलेक्ट्रॉनिक और संचार प्रणालियों से मिलने वाले संकेतों का भी विश्लेषण किया गया
तेहरान और संवेदनशील सरकारी परिसरों में लगे निगरानी तंत्र, कैमरों तथा अन्य डिजिटल नेटवर्कों से जुड़ी सूचनाओं को समझने और उन पर रखना शुरू किया । इसके अलावा शहर के यातायात पैटर्न, वीआईपी काफिलों की आवाजाही और सुरक्षा व्यवस्थाओं में होने वाले बदलावों का भी अध्ययन किया जाता था।
एक पूर्व इज़राइली खुफिया अधिकारी ने दावा किया था कि तेहरान में लगे कई ट्रैफिक कैमरों को हैक TEHRAN TRAFFIC CAMERA HACK कर लिया गया था। रिपोर्टों के अनुसार, इन कैमरों से मिलने वाली फुटेज और डेटा का उपयोग ईरानी अधिकारियों तथा उनके सुरक्षा नेटवर्क की गतिविधियों का अध्ययन करने के लिए किया जाता था।
इन सभी प्रयासों का उद्देश्य ईरानी नेतृत्व और सुरक्षा प्रतिष्ठान की गतिविधियों की अधिक सटीक तस्वीर तैयार करना था, ताकि किसी भी संभावित कार्रवाई से पहले अधिकतम खुफिया जानकारी उपलब्ध हो सके। साथ ही, अली ख़ामेनेई से जुड़े लोगों के मोबाइल फ़ोनों को स्पाइवेयर, जैसे पेगासस से हैक करना स्टार्ट किया,
इसके अलावा इज़राइल और मोसाद MOSSAD ने वर्षों पहले से ही ईरान के भीतर गुप्त तैयारियां शुरू कर दी थीं। इस दौरान विस्फोटक ड्रोन, सटीक हथियार प्रणालियां और उनसे जुड़े उपकरणों को अलग-अलग तरीकों से ईरान के अंदर पहुंचाए गए.
इन विस्फोटक ड्रोन को इस तरह तैनात किया गया था कि किसी संभावित सैन्य अभियान की स्थिति में ईरान की वायु रक्षा प्रणाली (Air Defense System) को शुरुआती चरण में ही कमजोर किया जा सके। यदि इज़राइली और अमेरिकी लड़ाकू विमान ईरानी हवाई क्षेत्र में प्रवेश करें, तो पहले से मौजूद ड्रोन और अन्य गुप्त हथियार प्रणालियों के जरिए ईरान की वायु रक्षा प्रणाली में मौजूद रडार RADAR, मिसाइल बैटरियों और एयर डिफेंस नेटवर्क AIR DEFENCE SYSTEM पर हमले किए जा सके।
इसके अलावा जब ईरान अपने यहाँ रूसी-निर्मित Russian made वायु रक्षा सिस्टम AIR DEFENCE SYSTEM स्थापित कर रहा था, तब उनकी सप्लाई चेन के जरिए सिस्टम के कुछ हिस्सों में पहले से ही ऐसे मैलवेयर Malware डाले गए थे जो वर्षों तक निष्क्रिय अवस्था में रह सकते थे और आवश्यकता पड़ने पर सक्रिय किए जा सकते थे। इस तरह सप्लाई चेन के माध्यम से ISREAL 2024 में लेबनान और सीरिया में पेजर उपकरणों विस्फोटों को अंजाम दिया था.
इसके अलावा, इज़राइल ने अंतरिक्ष में मौजूद जासूसी उपग्रहों Spy Satellite की मदद से भी अली ख़ामेनेई की गतिविधियों और उनसे जुड़े महत्वपूर्ण परिसरों की गतिविधियों पर करीबी नजर रखनी शुरू कर दी थी। इसके लिए इज़राइल ने जासूसी उपग्रह ओफेक-13 (Ofeq-13) और ओफेक-16 (Ofeq-16) से नजर रखनी शुरू कर दी .ये उपग्रह नियमित रूप से संबंधित क्षेत्र के ऊपर से गुजरते हुए वहां होने वाली गतिविधियों की तस्वीरें और अन्य खुफिया जानकारी एकत्र करते थे। इन उपग्रहों की सहायता से इलाके में होने वाली छोटी से छोटी गतिविधियों, सुरक्षा व्यवस्थाओं में बदलाव और वाहनों की आवाजाही तक पर नजर रखी जा सकती थी। इसके बाद एकत्र की गई जानकारी का विश्लेषण कर उसे इज़राइल की खुफिया और सुरक्षा एजेंसियों तक पहुंचाया जाता था।
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इसके अलावा, अमेरिका AMERICAN की केएच-11 कीनन (KH-11 Kennen) जासूसी उपग्रह भी इस क्षेत्र की निगरानी में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे थे। बताया जाता है कि ये उपग्रह सैकड़ों किलोमीटर की ऊंचाई से अत्यंत उच्च-रिज़ॉल्यूशन वाली तस्वीरें लेने में सक्षम हैं। उपग्रहों द्वारा एकत्र की गई तस्वीरों से किसी परिसर की संरचना, उसकी सुरक्षा व्यवस्थाओं, छतों पर लगे संचार उपकरणों और आसपास की गतिविधियों का विस्तृत अध्ययन किया जा सकता है। उन्नत इमेज प्रोसेसिंग तकनीकों की मदद से वस्तुओं की लंबाई, चौड़ाई और उनकी अनुमानित ऊंचाई जैसी जानकारियां भी निकाली जा सकती हैं।
इसके अलावा अमेरिका की जासूसी उपग्रह AMERICAN SPY SETALLITE ओरियन सिग्नल इंटेलिजेंस सैटेलाइट (Orion Spy Satellite अंतरिक्ष से सिग्नल इंटेलिजेंस (SIGINT) एकत्र करने और रणनीतिक संचार पर नज़र रखने का कार्य करते हैं इनकी मदद से अमेरिका और इज़राइल ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई के आसपास होने वाले हर सिग्नल और संचार पर नज़र रख रहे थे.
अमेरिका और इज़राइल द्वारा एकत्र किए गए विभिन्न डेटा को ‘Project Maven’ एआई-आधारित सिस्टम में प्रोसेस किया कि अली खामेनेई को किन-किन स्थानों पर संभावित रूप से लक्ष्य बनाया जा सकता है.
इसी दौरान 7 अक्टूबर 2023 को हमास ने इज़राइल पर हमला किया, जो इज़राइल के लिए एक बड़ा ट्रिगर पॉइंट बन गया। इस घटना के बाद दुनिया के कई देशों की सहानुभूति इज़राइल के साथ देखी गई। इसके बाद इज़राइल ने इस हमले के लिए ईरान और उसकी कथित प्रॉक्सी ताकतों—जैसे हिज़्बुल्लाह और हमास—को जिम्मेदार ठहराया। इसके साथ ही इज़राइल ने इन प्रॉक्सी संगठनों के खिलाफ सैन्य कार्रवाई भी शुरू कर दी।
लेकिन उस समय इज़राइल ईरान पर सीधा हमला नहीं कर पा रहा था, क्योंकि अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन क्षेत्रीय युद्ध और सीधे ईरान पर हमले के पक्ष में नहीं थे.
इसके बाद अमेरिका में चुनाव हुए और डोनाल्ड ट्रंप राष्ट्रपति बने। ट्रंप DONALD TRUMP ईरान के प्रति सख्त नीति के समर्थक माने जाते थे। अपने पहले कार्यकाल में उन्होंने बराक ओबामा द्वारा 2015 में किए गए ईरान न्यूक्लियर डील (JCPOA) से अमेरिका को अलग कर लिया और उस समझौते को रद्द कर दिया था.
3 जून 2025 को इज़राइल ने ईरान के खिलाफ एक सैन्य अभियान शुरू किया, जिसे ‘ऑपरेशन राइजिंग लाइन’ Operation Rising Lion कहा गया। इस दौरान अमेरिका ने इज़राइल को समर्थन दिया और क्षेत्र में अपनी सैन्य उपस्थिति भी बढ़ाई। इसके बाद ईरान से जुड़े विभिन्न ठिकानों पर संयुक्त हवाई हमलों की कार्रवाई की गई।
उधर ईरान ने अपने यूरेनियम संवर्धन (URANIUM enrichment) स्तर को लगभग 60% तक बढ़ा लिया था, इसको लेकर इज़राइल की चिंता और अधिक बढ़ गई, क्योंकि अगर Ali Khamenei खमेनई और उनकी लीडरशिप LEADERSHIP को जल्दी से जल्दी खत्म नहीं किया तो इस न्यूक्लियर प्रोग्राम को रोकना लगभग इम्पॉसिबल हो जाएगा। क्योंकि हर दिन ईरान अपने न्यूक्लियर प्रोग्राम IRAN NUCLEAR PROGRAM में आगे बढ़ रहा था।
पीएम बेंजामिन नेतन्याहू इन्होंने डिफेंस मिनिस्टर, मोसाद चीफ, आईडीएफ इंटेलिजेंस हेड इनके साथ एक मीटिंग करके खमेनई को मारने का जो फाइनल प्लान बनाया और डेट थी 2026 के फर्स्ट क्वार्टर में ALI खमेनई को मार दिया जाएगा।
23 फरवरी 2026 को इज़राइल को एक महत्वपूर्ण खुफिया जानकारी प्राप्त हुई, जिस पर वह लंबे समय से काम कर रहा था। इस जानकारी के अनुसार, 28 फरवरी 2026 की रात अली खामेनेई अपने लगभग 40 शीर्ष अधिकारियों के साथ Pasteur Street Compound के बेथ-ए-रेवरी में एक उच्च स्तरीय बैठक करने वाले थे। यह इज़राइल के लिए एक महत्वपूर्ण मौका था, क्योंकि उस समय खामेनेई के साथ उनकी पूरी वरिष्ठ नेतृत्व टीम एक ही स्थान पर मौजूद होने वाली थी।
पहले प्राप्त खुफिया जानकारी में यह स्पष्ट नहीं था कि बैठक Pasteur Street Compound के ऊपरी क्षेत्र में होगी या भूमिगत बंकर में। हालांकि इज़राइली एजेंसियों का अनुमान था कि बैठक संभवतः बंकर में हो सकती है, क्योंकि खामेनेई की सुरक्षा सामान्यतः वहीं अधिक मजबूत मानी जाती थी।
23 फरवरी को यह जानकारी मिलने के बाद, 27 फरवरी 2026 को इज़राइल को दो और महत्वपूर्ण खुफिया सूचनाएँ प्राप्त हुईं। इन सूचनाओं के अनुसार, 28 फरवरी को होने वाली बैठक बंकर में नहीं, बल्कि परिसर के ऊपरी हिस्से में आयोजित की जानी थी। साथ ही यह भी बताया गया कि बैठक का समय रात से बदलकर सुबह कर दिया गया था। इस नई जानकारी के बाद स्थिति अधिक स्पष्ट हो गई। इज़राइल के लिए अली खामेनेई को निशाना बनाने का इससे बेहतर अवसर नहीं मिल सकता था.
ऑपरेशन रोअरिंग लायन- (Operation Roaring Lion) AND ऑपरेशन एपिक फ्यूरी" (Operation Epic Fury) की शुरुआत-
28 फरवरी सुबह 7 बजकर 30 मिनट पर इज़राइल के एयरबेस से F-35 और F-15 जैसे फाइटर जेट्स टेकऑफ करते हैं और तेहरान के Pasteur Street कंपाउंड’ की दिशा में बढ़ने लगते हैं।
इसी समय मध्य-पूर्व में मौजूद अमेरिकी क्षेत्रीय बेस से भी अमेरिकी फाइटर जेट्स टेकऑफ करते हैं करीब 7 बजकर 50 मिनट पर इज़राइली और अमेरिकी जेट्स ईरानी एयरस्पेस के करीब पहुँच जाते हैं। ईरान ने रूस निर्मित S-300 और अन्य एयर डिफेंस सिस्टम के जरिए पूरे तेहरान क्षेत्र की सुरक्षा व्यवस्था मजबूत कर रखी थी, जिससे बिना इसे निष्क्रिय किए अंदर प्रवेश करना बेहद जोखिमपूर्ण हो सकता था.
इसी बीच इज़राइल की साइबर वारफेयर यूनिट (Unit 8200) ने पहले से ईरानी डिफेंस नेटवर्क की सप्लाई चेन के माध्यम से कुछ मैलवेयर सिस्टम में डाल रखे थे, जो लंबे समय से निष्क्रिय अवस्था में थे। अब इन्हें सक्रिय किया जाता है, जिससे ईरान की कई रडार स्क्रीन अचानक बंद हो जाती हैं और कमांड सेंटर का फील्ड यूनिट्स से संपर्क टूट जाता है। परिणामस्वरूप ईरान का एयर डिफेंस नेटवर्क निष्क्रिय हो जाता है। इसी दौरान तेहरान में सूचना और कमांड नेटवर्क निष्क्रिय भी हो जाता है।
साथ ही, किसी भी संभावित खतरे को रोकने के लिए बैकअप के तौर पर अमेरिकी नौसेना ने खाड़ी क्षेत्र GULF REGION में इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर विमान (EA-18G Growler) तैनात कर रखे थे। जैसे ही अमेरिकी फाइटर जेट्स और इज़राइली फाइटर जेट्स लक्ष्य की ओर आगे बढ़ते है, ये विमान शक्तिशाली जैमिंग सिस्टम jamming system सक्रिय कर देते हैं, जिससे ईरानी एयरस्पेस में इलेक्ट्रोमैग्नेटिक हस्तक्षेप बढ़ जाता है और रडार RADAR व संचार प्रणाली लगभग ठप हो जाती है।
इन सभी परिस्थितियों के बाद इज़राइल तथा अमेरिका के जेट्स बिना बड़े प्रतिरोध के लक्ष्य क्षेत्र की ओर आगे बढ़ने लगते हैं। इसके बाद जहां बैठक चल रही थी, अमेरिकी फाइटर जेट्स और इज़राइली फाइटर जेट्स ने उसी स्थान को टारगेट किया एकदम पिन-पॉइंट लोकेशन पर 30 से अधिक मिसाइलें दागी गईं। पूरे क्षेत्र में तेज धमाकों की आवाज़ें सुनी गईं और आसपास के इलाकों में अफरा-तफरी का माहौल बन गया।
कुछ समय बाद डोनाल्ड ट्रंप और बेंजामिन नेतन्याहू ने एक संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में अली खामेनेई को समाप्त किए जाने से जुड़ी जानकारी साझा की।. इज़राइल ने "ऑपरेशन रोअरिंग लायन- (Operation Roaring Lion) नाम दिया, जबकि अमेरिका ने इसे "ऑपरेशन एपिक फ्यूरी" (Operation Epic Fury) नाम दिया गया.
सके बाद ईरान ने अपने सर्वोच्च नेतृत्व की मौत की पुष्टि की और इसे देश पर हुआ एक गंभीर हमला और बड़ा नुकसान बताया। ईरान की सरकार और सैन्य नेतृत्व ने इसे सीधे तौर पर आक्रामक कार्रवाई करार देते हुए कहा कि इसका परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहे । इसके साथ ही ईरान ने जवाबी कदम उठाने और क्षेत्रीय स्तर पर तनाव बढ़ने की चेतावनी भी दी।”
इसके बाद ईरान ने जवाबी कदम के तौर पर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ STRAIT OF HORMUZ को बंद कर दिया साथ ही खाड़ी क्षेत्र में मौजूद कुछ अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर भी हमलों और नुकसान की खबरें सामने आईं, जिससे क्षेत्रीय तनाव और अधिक बढ़ गया।





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